श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परंतु इन सबके आगे बढ़कर, हालहीके जमानेके आधिभौतिक जर्मन पंडित नित्शेने, अपने ग्रंथोंमें, कर्म छोड़नेवालोंपर ऐसे तीव्र कटाक्ष किये हैं, कि वह कर्मसंन्यास- पक्षवालोंके लिये 'मूर्ख-शिरोमणि' शब्दसे अधिक सौम्य शब्दका उपयोग करही नहीं सका है।* यूरोपमें अरिस्टाटलसे लेकर अबतक जिस प्रकार इस संबंधमें दो पक्ष हैं, उसी प्रकार भारतीय वैदिक धर्ममेंभी प्राचीन कालसे लेकर अबतक इस संबंधके दो संप्रदाय एकसे चले आ रहे हैं (मभा. शां. ३४९. ७)। इनमेंसे एकको संन्यास-मार्ग, सांख्य-निष्ठा या केवल सांख्य अथवा - ज्ञानमेंही नित्य निमग्न रहनेके कारण - ज्ञान-निष्ठाभी कहते हैं; और दूसरेको कर्मयोग, अथवा संक्षेपमें केवल योग या कर्म-निष्ठा कहते हैं। हम तीसरे प्रकरणमेंही कह चुके हैं, कि यहाँ 'सांख्य' और 'योग' शब्दोंसे तात्पर्य क्रमशः कापिल-सांख्य और पातंजल योगसे नहीं है; परंतु 'संन्यास' शब्दभी कुछ संदिग्ध है, इसलिये उसके अर्थका कुछ अधिक विवरण करना यहाँ आवश्यक है। 'संन्यास' शब्दका सिर्फ 'विवाह न करना' और यदि किया हो, तो "बाल-बच्चोंको छोड़ भगवे कपडे रंग लेना' अथवा 'केवल चौथे आश्रमका ग्रहण करना" इतनाही अर्थ यहाँ विवक्षित नहीं है। क्योंकि विवाह न करन परभी भीष्मपितामह मरते दमतक राज्यकार्योंके उद्योगमें लगे रहे; और श्रीमत् शंकराचार्यने ब्रह्मचर्यसे एकदम चौथा आश्रम ग्रहण कर, या महाराष्ट्र देशमें -श्रीसमर्थ रामदासने मृत्यूपर्यंत ब्रह्मचारी-गोस्वामी-रहकर, ज्ञानप्रचार करके संसारके उद्धारार्थ कर्म किये हैं। यहाँ पर मुख्य प्रश्न यही है, कि ज्ञानोत्तर संसारके व्यवहार केवल कर्तव्य समझकर लोक-कल्याणके लिये किये जावें अथवा मिथ्या समझ कर एकदम छोड़ दिये जावें ? इन व्यवहारों या कर्मोंको करनेवाला कर्मयोगी कहलाता है, फिर चाहे वह ब्याहा हो या क्वाँरा, भगवे कपड़े पहने या सफ़ेद । हाँ, यहभी कहा जा सकता है, कि ऐसे काम करनेके लिये विवाह न करना, भगवे कपड़े * कर्मयोग और कर्मत्याग (सांख्य या संन्यास), इन्हीं दो मार्गोंको सलीने अपने Pessimism नामक ग्रंथमें क्रमसे Optimism और Pessimism नाम दिये हैं; पर हमारी रायमें ये नाम ठीक नहीं हैं। Pessimism शब्दका अर्थ "उदास, निराशावादी या रोती सूरत" होता है। परंतु संसारको अनित्य समझ कर उसे छोड़ देनेवाले (संन्यासी) आनंदी रहते हैं और वे लोग संसारको आनंदसेही छोड़ते हैं; इसलिये हमारी रायमें, उनको Pessimist कहना ठीक नहीं हैं। इसके बदले कर्मयोगको Energism और सांख्य या संन्यास मार्गको Quietism कहना अधिक प्रशस्त होगा। वैदिक धर्मके अनुसार दोनों मार्गोंमें ब्रह्मज्ञान एकही-सा है, इसलिये दोनोंका आनंद और शांतिभी एकही-सी है। हम ऐसा भेद नहीं करते, कि एक मार्ग आनंदमय है और दूसरा दुःखमय है, अथवा एक आशावादी है, और दूसरा निराशावादी।