भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 350

चाहे तो कर्म करूँगा, नहीं तो न करूँगा । यदि कर्म करनाही उत्तम पक्ष हो, तो मुझे उसका कारण समझाइये; तभी मैं आपके कथनानुसार आचरण करूँगा । अर्जुनका यह प्रश्न कुछ अपूर्व नहीं है । योगवासिष्ठमें ( यो. वा. ५. ५६. ६ ) श्रीरामचन्द्रने वसिष्ठसे और गणेशगीता ( ग. गी. ४. १ ) में वरेण्य राजाने गणेशजीसे यही प्रश्न किया है । केवल हमारेही यहाँ नहीं, वरन् यूरोपमें- जहाँ तत्त्वज्ञानके विचार पहले पहल शुरू हुए थे, उस ग्रीस देशमेंभी - प्राचीन कालमे यह प्रश्न उपस्थित हुआ था - यह बात अरिस्टाटलके ग्रंथसे प्रकट होती है । इस प्रसिद्ध यूनानी ज्ञानी पुरुषने अपने नीतिशास्त्रसंबंधी ग्रंथके अंत ( १०. ७, ८ ) में यही प्रश्न उपस्थित किया है और प्रथम अपना यह मत प्रकट किया है, कि संसारके या राजनैतिक मामलोंमें जीवन बितानेकी अपेक्षा ज्ञानी पुरुषको शांतिमे तत्त्वके विचारमें जीवन बितानाही सच्चा और पूर्ण आनंददायक है । तोभी उसके अनंतर लिखे, अपने राजधर्मसंबंधी ग्रंथ ( ७. २, ३ ) में अरिस्टाटलही लिखता है, कि “ कुछ ज्ञानी पुरुष तत्त्व-विचारमें, तो कुछ राजनैतिक कार्योंमें निमग्न दीख पड़ते है; और यदि पूछा जाय कि इन दोनों मार्गोंमेंसे कौन-सा बहुत अच्छा है, तो यही कहना पड़ेगा, कि प्रत्येक मार्ग अंशतः सच्चा है । तथापि, कर्मकी अपेक्षा अकर्मको अच्छा कहना भूल है । * क्योंकि, यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि आनंदभी तो एक कर्मही है; और सच्ची श्रेयःप्राप्तिभी अनेक अंशोंमें ज्ञानयुक्त तथा नीतियुक्त कर्मोंमेंही है - दो स्थानोंपर अरिस्टाटलके भिन्न भिन्न मतोंको देखकर, गीताके इस स्पष्ट कथनका महत्त्व पाठकोंके ध्यानमें आ जावेगा, कि “कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः” ( गीता ३. ८ ) - अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है । गत शताब्द्दीका प्रसिद्ध फ्रेंच पंडित आगस्टस् कोंट अपने आधिभौतिक तत्त्वज्ञानमें कहता है - “ यह कहना भ्रांतिमूलक है, कि तत्त्वविचारहीमें निमग्न रह कर जीवन बिताना श्रेयस्कर है । और जो तत्त्वज्ञ पुरुष इस ढंगके आयुष्य क्रमको अंगीकार करता है और अपने हाथसे होने योग्य लोगोंका कल्याण करना छोड़ देता है, उसके विषयमे यही कहना चाहिये, कि वह अपने प्राप्त साधनोंका दुरुपयोग करता है । ” इसके विपरीत जर्मन तत्त्ववेत्ता शोपेनहरने कहा है, कि संसारके समस्त व्यवहार - यहाँतक कि जीवित रहनाभी - दुःखमय है; इसलिये तत्त्वज्ञान प्राप्तकर इन सब कर्मोंका, जितनी जल्दी हो सके, नाश करनाही इस संसारमे मनुष्यका सच्चा कर्तव्य है । कोंट सन १८५७ में और शोपेनहर सन १८६० में संसारसे विदा हुए । शोपेनहरका पंथ जर्मनीमें हार्टमेनने जारी रखा है । कहना नहीं होगा, कि स्पेन्सर और मिल प्रभृति अंग्रेज तत्त्वशास्त्रज्ञोंके मत कोंटके जैसे हैं ।

  • “ And it is equally a mistake to place inactivity above action, for happiness is activity, and the actions of the just and wise are the realization of much that is noble. ” ( Aristotle's politics, trans. by Jowett, Vol. I, p. 212. The Italics are ours. ) गी. र. २०