श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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पक्ष तर्कदृष्टिसे इस स्थानपर संभव होते हैं। और इनमेंसे जो पक्ष श्रेष्ठ सिद्ध होगा, उसीकी ओर ध्यान दे कर पहलेसे (अर्थात् साधनावस्थासेही) बर्ताव करना सुविधाजनक होगा, इसलिये उक्त दोनों पक्षोंके तारतम्यका विचार किये बिना कर्म और अकर्मका कोईभी आध्यात्मिक विवेचन पूरा नहीं हो सकता। अर्जुनसे सिर्फ़ यह कह देनेसे काम नहीं चल सकता था, कि पूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जानेपर कर्मोंका करना और न करना एक-सा है (गीता ३. १८); क्योंकि समस्त व्यव- हारोंमें कर्मकी अपेक्षा बुद्धिकी श्रेष्ठता होनेके कारण, ज्ञानसे जिसकी बुद्धि समस्त भूतोंमें सम हो गई है, उसे आगे किसीभी कर्मके शुभाशुभत्वका लेप नहीं लगता (गीता ४. २०, २१)। भगवानका तो उसे यही निश्चित उपदेश था कि – युद्धही कर – युध्यस्व ! (गीता २. १८); और इस खरे तथा स्पष्ट उपदेशके समर्थनमें ज्ञान हो जानेपर “लड़ाई करे तो अच्छा, न करे तोभी अच्छा;” ऐसी संदिग्ध उप- पत्तिकी अपेक्षा और दूसरे कुछ सबल कारणोंका बतलाना आवश्यक था। और तो क्या, गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति यह बतलानेके लियेही हुई है, कि किसी कर्मका भयंकर परिणाम दृष्टिके सामने देखते रहनेपरभी बुद्धिमान् पुरुष उसेही क्यों करे। गीताकी यही तो विशेषता है। यदि यह सत्य है, कि कर्मसे जंतु बँधता है और ज्ञानसे मुक्त होता है, तो ज्ञानी पुरुषको कर्म करनाही क्यों चाहिये ? कर्म-क्षयका अर्थ कर्मोंका छोड़ना नहीं है; केवल फलाशा छोड़ देनेसेही कर्मका क्षय हो जाता है, सब कर्मोंको छोड़ देना शक्य नहीं है; इत्यादि सिद्धान्त यद्यपि सत्य हों, तथापि इससे भली भाँति यह सिद्ध नहीं होता, कि जितने कर्म छूट सकें, उतनेभी क्यों न छोड़े जायें। और न्यायसे देखने परभी, यही अर्थ निष्पन्न होता है; क्योंकि गीतामेंही कहा है, कि चारों ओर पानीही पानी हो जाने पर जिस प्रकार फिर कोई उसके लिये कुएँकी खोज नहीं करता, उसी प्रकार कर्मोंसे सिद्ध होनेवाली ज्ञानप्राप्ति हो चुकनेपर ज्ञानी पुरुषको कर्मकी कुछभी अपेक्षा नहीं रहती (गीता २. ४६)। इसीलिये तीसरे अध्यायके आरंभमें अर्जुनने श्रीकृष्णसे प्रथम यही पूछा है, कि आपके मतमें यदि कर्मकी अपेक्षा निष्काम अथवा साम्यबुद्धि श्रेष्ठ है, तो स्थितप्रज्ञके समान मैंभी अपनी बुद्धिको शुद्ध किये लेता हूँ – बस, तब फिरभी लड़ाईके इस घोर कर्ममें मुझे क्यों फँसाते हो ? (गीता ३. १) इस प्रश्नकाभी उत्तर देते हुए भगवान् ने “कर्म किसीकेभी छूट नहीं सकते” इत्यादि कारण बतला कर, चौथे अध्यायमें कर्मका समर्थन किया है। परन्तु सांख्य (संन्यास) और कर्मयोग, दोनोंही मार्ग यदि शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं, तो यही कहना पड़ेगा, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर, इनमेंसे जिसे जो मार्ग अच्छा लगे, उसे वह स्वीकार कर ले। ऐसी दशामें, पाँचवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने फिर प्रार्थना की, कि गोलमाल करके दोनों मार्ग मुझे न बतलाइये; निश्चयपूर्वक मुझे एकही बात बतलाइये, कि इन दोनोंमेंसे अधिक श्रेष्ठ कौन है (गीता ५. १)। यदि ज्ञानोत्तर कर्म करना या न करना एकही सा है, तो फिर मैं अपनी इच्छासे जो