भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

२६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इसकी उपपत्ति, सांख्यशास्त्रकी तरह बुद्धिके अनेक 'भाव' मानकर नहीं लगाते; किंतु इस विषयमें उनका यह सिद्धान्त है, कि यह सब कर्मविपाकका अथवा कर्मके फलोंका परिणाम है। गीतामें, वेदान्तसूत्रोंमें और उपनिषदोंमें स्पष्ट कहा है, कि यह कर्म लिंग-शरीरके आश्रयसे अर्थात् आधारसे रहा करता है; और जब आत्मा स्थूल देह छोड़कर जाने लगता है, तब यह कर्मभी लिंग-शरीरद्वारा उसके साथ जाकर उसको बार बार भिन्न भिन्न जन्म लेनेके लिये बाध्य करता है। इसलिये नाम-रूपात्मक जन्ममरणके चक्करसे मुक्त होकर नित्य परब्रह्म-रूपी होनेमें अथवा मोक्षकी प्राप्तिमें पिंडके आत्माको जो अड़चन हुआ करती है, उसका विचार करते समय लिंग-शरीर और कर्म इन दोनोंकाभी विचार करना पड़ता है। इनमेंसे लिंग-शरीरका सांख्य और वेदान्त, दोनों दृष्टियोंसे पहलेही विचार किया जा चुका है। इसलिये यहाँ फिर उसकी चर्चा नहीं की जाती। इस प्रकरणमें सिर्फ इसी बातका विवेचन किया गया है, कि जिस कर्मके कारण आत्माको ब्रह्मज्ञान न होते हुए अनेक जन्मोंके चक्करमें पड़ना होता है, उस कर्मका स्वरूप क्या है ? और उससे छूट कर आत्माको अमृतत्व प्राप्त होनेके लिये मनुष्यको इस संसारमें कैसे चलना चाहिये ? सृष्टिके आरंभकालमें मूल अव्यक्त और निर्गुण परब्रह्म जिस देशकाल आदि नाम-रूपात्मक सगुण शक्तिसे व्यक्त अर्थात् दृश्य सृष्टिरूप हुआ-सा दीख पड़ता है, उसीको वेदान्तशास्त्रमें 'माया' कहते हैं (गीता ७. २४, २५); और उसीमें कर्मकाभी समावेश होता है (बृ. १. ६. १)। इतनाही नहीं तो यहभी कहा जा सकता है, कि 'माया' और 'कर्म' दोनों समानार्थक हैं। क्योंकि पहले कुछ-न-कुछ कर्म अर्थात् व्यापार हुए बिना अव्यक्तका व्यक्त होना अथवा निर्गुणका सगुण होना संभव नहीं। इसीलिये पहले यह कह कर, कि मैं अपनी मायासे प्रकृतिमें उत्पन्न होता हूँ (गीता ४. ६); फिर आगे आठवें अध्यायमें गीतामेंही कर्मका यह लक्षण दिया है, कि "अक्षर परब्रह्मसे पंचमहाभूतादि विविध सृष्टि निर्माण होनेकी जो क्रिया है, वही कर्म है" (गीता ८. ३)। कर्म कहते हैं व्यापार अथवा क्रियाको -फिर वह मनुष्यकृत हो, सृष्टिके अन्य पदार्थोंकी क्रिया हो अथवा मूल सृष्टिके उत्पन्न होनेकीही हो - इतना व्यापक अर्थ इस जगह विवक्षित है। परंतु कर्म कोई हो; उसका परिणाम सदैव केवल इतनाही होता है, कि एक प्रकारका नामरूप बदल कर उसकी जगह दूसरा नामरूप उत्पन्न किया जाय। क्योंकि इन नामरूपोंसे आच्छादित मूल द्रव्य कभी नहीं बदलता - वह सदा एक-साही रहता है। उदा- हरणार्थ, बुननेकी क्रियासे 'सूत' यह नाम बदलकर उसी द्रव्यको 'वस्त्र' नाम मिल जाता है; और कुम्हारके व्यापारसे 'मिट्टी' नामके स्थानमें 'घट' नाम प्राप्त हो जाता है। इसलिये मायाकी व्याख्या देते समय कर्मको न लेकर नाम और रूपकोही कई बार माया कहा है। तथापि कर्मका जब स्वतंत्र विचार करना पड़ता है, तब यह कहना पड़ता है, कि कर्मस्वरूप और मायास्वरूप एकही हैं। इसलिये आरंभहीमें