श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २५५ कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥ ४. इसके मनका जो रेत अर्थात् बीज प्रथमतः निकला, वही आरंभमें काम ( अर्थात् सृष्टि निर्माण करनेकी प्रवृत्ति या शक्ति ) हुआ । ज्ञाताओने अंतःकरणमें विचार करके बुद्धिसे निश्चित किया, कि ( यही ) असत्में अर्थात् मूल परब्रह्ममें सत्का का यानी विनाशी दृश्यसृष्टिका ( पहला ) संबंध है । तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषां अधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् । रेतोधा आसन् महिमान आसन् स्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥५॥ ५. ( यह ) रश्मि या किरण या धागा इनमें आड़ा फैल गया; और यदि कहें, कि यह नीचे था, तो यह ऊपरभी था। ( इनमेंसे कुछ ) रेतोधा अर्थात् बीजप्रद हुए; और ( बढ़कर ) बड़ेभी हुए । उन्हींकी स्वशक्ति इस ओर रही; और प्रयति अर्थात् प्रभाव उस ओर ( व्याप्त ) रहा । को अद्धा वेद क इह प्र वोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः । अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेना- थ को वेद यत आबभूव ॥६॥ ६. ( सत्का ) यह विसर्ग यानी पसारा किससे या कहाँसे आया ? यह ( इससे अधिक ) प्र यानी विस्तारपूर्वक यहाँ कौन कहेगा ? इसे कौन निश्चया- त्मक जानता है ? देवभी इस ( सत् सृष्टिके ) विसर्गके पश्चात् हुए हैं। फिर वह जहांसे ( उत्पन्न ) हुई, उसे कौन जानेगा ? कुछभी न था; तब उसके विपरीत इसी सूक्तमें यह कहा जाना संभव नहीं, कि मूलारंभमें अंधकार या पानी था । अच्छा; यदि वैसा अर्थ करेंगे; तो तीसरे चरणके यत् शब्दको निरर्थक मानना होगा । अतएव तीसरे चरणके 'यत्'का चौथे चरणके 'तत्'से संबंध लगाकर, ( जैसा कि हमने ऊपर किया है ) अर्थ करना आवश्यक है। “ मूलारंभमें पानी वगैरह पदार्थ थे " ऐसा कहनेवालोंको उत्तर देनेके लिये इस सूक्तमें यह ऋचा आई है। और इसमें ऋषिका उद्देश्य यह बतलानेका है, कि तुम्हारे कथनानुसार मूलमें तम, पानी इत्यादि पदार्थ न थे; किंतु एक ब्रह्मकाही आगे यह सब विस्तार हुआ है। 'तुच्छ' और 'आभु' ये शब्द एक दूसरेके प्रतियोगी हैं। अतएव तुच्छ के विपरीत 'आभु' शब्दका अर्थ बड़ा या समर्थ होता है; और ऋग्वेदमें जहाँ अन्य दो स्थानोंमें इस शब्दका प्रयोग हुआ है, वहाँ सायणाचार्यनेभी