भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 301

२५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न दधे। यो अस्याध्यक्षःपरमे व्योमन् सो अंग वेद यदि वा न वेद ॥७॥ ७. (सत्का) यह विसर्ग अर्थात् फैलाव जहाँसे हुआ अथवा निर्मित किया गया या नहीं किया गया-उसे परम आकाशमें रहनेवाला इस सृष्टिका जो अध्यक्ष (हिरण्यगर्भ) है, वही जानता होगा; या न भी जानता हो ! (कौन कह सके ?) सारे वेदान्तशास्त्रका रहस्य यही है, कि नेत्रोंको या सामान्यतः सब इंद्रियोंको गोचर होनेवाले विकारी और विनाशी नामरूपात्मक अनेक दृश्योंके फंदेमें फँस न रह कर ज्ञानदृष्टिसे यह जानना चाहिये, कि इस दृश्यके परे कोई न कोई एक और अमृत तत्त्व है। इस मक्खनके गोलेकोही पानेके लिये उक्त सूक्तके ऋषिकी बुद्धि एकदम दौड़ पड़ी है, इससे यह स्पष्ट दीख पड़ता है, कि उसका अंतर्ज्ञान कितना तीव्र था। मूलारंभमें अर्थात् सृष्टिके सारे पदार्थोंके उत्पन्न होनेके पहले जो कुछ था, वह सत् था या असत्; मृत्यु था या अमर; आकाश था या जल; प्रकाश था या अंधकार ? - ऐसे अनेक प्रश्न करनेवालोंके साथ वादविवाद न करते हुए, उक्त ऋषि सबके आगे दौड़ कर यह कहता है, कि सत् और असत्, मर्त्य और अमर, अंधकार और प्रकाश, आच्छादन करनेवाला और आच्छादित, सुख देनेवाला और उसका अनुभव करनेवाला द्वैतकी यह परस्परसापेक्ष भाषा दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके अनंतरकी है; अतएव सृष्टिके इन द्वंद्वोंके उत्पन्न होनेके पूर्व अर्थात् जब "एक और दूसरा" यह भेदही न था, तब कौन किसे आच्छादित करता ? इसलिये आरंभहीमें इस सूक्तका ऋषि निर्भय होकर यह कहता है, कि मूलारंभके एकरूप द्रव्यको सत् या असत्, आकाश या जल, प्रकाश या अंधकार, अमृत या मृत्यु, इत्यादि कोईभी परस्पर-सापेक्ष नाम देना उचित नहीं। जो कुछ था, वह इन सब पदार्थोंसे विलक्षण था और वह अकेलाही चारों ओर अपनी अपरंपार शक्तिसे स्फूर्तिमान् था। उसके साथ या उसे आच्छादित करनेवाला अन्य कुछभी न था। दूसरी ऋचामें 'आनीत्' क्रियापदके 'अन्' धातुका अर्थ है श्वासोच्छ्वास लेना या स्फुरण होना; और 'प्राण' शब्दभी उसी धातुसे बना है। परंतु जो न सत् है और न असत्, उसके विषयमें कौन कह सकता है, कि वह सजीव प्राणियोंके समान श्वासोच्छ्वास लेता था ? और श्वासोच्छ्वासके लिये वहाँ वायुही कहाँ है ? अतएव उसका यही अर्थ किया है (ऋ. १०. २७. १, ४)। पंचदशीमें (चित्र. १२९, १३०) तुच्छ शब्दका उपयोग मायाके लिये किया गया है (नृसिं. उत्त. ९)। अर्थात् 'आभु'का अर्थ पोलापन न होकर 'परब्रह्म' ही होता है। ("सर्वं आः इदम्" -यहाँ आः (अ + अस्) अस् धातुका भूतकाल है; और इसका अर्थ 'आसीत्' होता है।