श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सूक्त अनुवाद नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं १. तब अर्थात् मूलारंभमें असत् नहीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् । था और सत्भी नहीं था ! अंतरिक्ष नहीं किमावरीवः कुह कस्य शर्म- था और उसके परेका आकाशभी न था । न्छम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥१॥ ( ऐसी अवस्थामें ) किसने ( किसपर ) आवरण डाला ? कहाँ ? किसके सुखके लिये ? अगाध और गहन जल ( भी ) कहाँ था ? * न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि २. तब मृत्यु अर्थात् मृत्युग्रस्त नाश- न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः । वान् दृश्य सृष्टि न थी, अतएव ( दूसरा ) आनीदवातं स्वधया तदेकम् । अमृत अर्थात् अविनाशी नित्य पदार्थ तस्माद्धान्यन्न परः किंचनास ॥२॥ ( यह भेद ) भी न था । ( इसी प्रकार ) रात्रि और दिनका भेद समझनेके लिये कोई साधन ( = प्रकेत ) न था। ( जो कुछ था ) वह अकेला एकही अपनी शक्ति ( स्वधा ) से वायुके बिना श्वोसोच्छ्वास लेता अर्थात् स्फूर्तिमान् होता रहा । इसके अतिरिक्त या इसके परे और कुछ भी न था। तम आसीत्तमसा गूढमग्रे- ३. जो ( यत् ) ऐसा कहा जाता है, प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् । कि अंधकार था, आरंभमें यह सब अंध- तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासीत् कारसे व्याप्त ( और ) भेदाभेदरहित तपसस्तन्महिनाऽजायतैकम् ॥३॥ जल था ( या ) आभु अर्थात् सर्वव्यापी ब्रह्म ( पहलेही ) तुच्छसे अर्थात् झूठी मायासे आच्छादित था, वह ( तत् ) मूलमें एक ( ब्रह्मही ) तपकी महिमासे ( आगे रूपांतरसे ) प्रकट हुआ था। †
- ऋचा पहली – चौथे चरणमें 'आसीत् किम्' यह अन्वय करके हमने उक्त अर्थ दिया है; और उसका भावार्थ है, 'पानी तब नहीं था' ( तै. ब्रा. २. २. ९) । † ऋचा तीसरी – कुछ लोग इसके प्रथम तीन चरणोंको स्वतंत्र मानकर उनका ऐसा विधानात्मक अर्थ करते हैं, कि सृष्टिके आरंभमें "अंधकार, अंधकारसे व्याप्त पानी, या तुच्छसे आच्छादित आभु ( पोलापन ) था।" परंतु हमारे मतसे यह भूल है। क्योंकि पहली दो ऋचाओंमें जब कि ऐसी स्पष्ट उक्ति है, कि मूलारंभमें