श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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दसवाँ प्रकरण कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते । *
- महाभारत, शांति. २४०. ७ यद्यपि यह सिद्धान्त अंतमें सच है, कि इस संसारमें जो कुछ है, वह परब्रह्मही है; परब्रह्मको छोड़कर अन्य कुछ नहीं है; तथापि मनुष्यकी इंद्रियोंको गोचर होनेवाली दृश्य सृष्टिके पदार्थोंका अध्यात्मशास्त्रकी चलनीसे जब हम संशोधन करने लगते हैं, तब उनके नित्य-अनित्यरूपी दो विभाग या समूह हो जाते हैं। एक तो उन पदार्थोंका नामरूपात्मक दृश्य है, जो इंद्रियोंको प्रत्यक्ष दीख पड़ता है; परंतु हमेशा बदलनेवाला होनेके कारण अनित्य है। और दूसरा परमात्म-तत्त्व है, जो नाम रूपोंसे आच्छादित होनेके कारण अदृश्य, परंतु नित्य है। यह सच है, कि रसायन शास्त्रमें जिस प्रकार सब पदार्थोंका पृथक्करण करके उनके घटक- द्रव्य अलग अलग निकाल लिये जाते हैं, उसी प्रकार ये दो विभाग आँखोंके सामने पृथक् पृथक् नहीं रखे जा सकते; परंतु ज्ञानदृष्टिसे उन दोनोंको अलग करके शास्त्रीय उपपादनके सुभीतेके लिये उनको क्रमशः 'ब्रह्म' और 'माया' तथा कभी कभी 'ब्रह्मसृष्टि' और 'मायासृष्टि' इस प्रकार नाम दिये जाते हैं। तथापि स्मरण रहे, कि ब्रह्म मूलसेही नित्य और सत्य है। इस कारण उसके साथ सृष्टि शब्द ऐसे अवसरपर अनुप्रासार्थ लगा रहता है; और 'ब्रह्मसृष्टि' शब्दसे यह मतलब नहीं है, कि ब्रह्मको किसीने उत्पन्न किया है। इन दो सृष्टियोंमेंसे दिक्काल आदि नाम-रूपोंसे अमर्यादित, अनादि, नित्य, अविनाशी, अमृत, स्वतंत्र और सारी दृश्य सृष्टिके लिये आधारभूत होकर उसके भीतर रहनेवाली ब्रह्म-सृष्टिमें ज्ञानचक्षुसे संचार करके आत्माके शुद्ध स्वरूप अथवा अपने परम साध्यका विचार पिछले प्रकरणमें किया गया। और सच पूछिये तो शुद्ध अध्यात्मशास्त्र वहीं समाप्त हो गया। परंतु, मनुष्यका आत्मा यद्यपि आदिमें ब्रह्म-सृष्टिका है, तथापि दृश्य सृष्टिकी अन्य वस्तुओंकी तरह वहभी नाम-रूपात्मक देहेंद्रियोंसे आच्छादित है; और ये देहेंद्रियाँ आदिक नाम-रूप विनाशी हैं। इसलिये प्रत्येक मनुष्यकी यह स्वाभाविक इच्छा होती है, कि इनसे मुक्त होकर अमृतत्व कैसे प्राप्त करूँ? और, इस इच्छाकी पूर्तिके लिये मनुष्यको व्यवहारमें कैसे चलना चाहिये ? - कर्मयोग- शास्त्रके इस विषयका विचार करनेके लिये, कर्मके कायदोंसे बँधी हुई अनित्य
- "कर्मसे प्राणी बाँधा जाता है; और विद्यासे उसका छुटकारा हो जाता है।"