श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २२९ ज्ञान नहीं है । ” तब पिताने नदी, समुद्र, पानी और नमक प्रभृति अनेक दृष्टान्त देकर समझाया, कि बाह्यसृष्टिके मूलमें जो द्रव्य है, वह ( तत् ) और तू ( त्वम् ) अर्थात् तेरी देहका आत्मा दोनों एकही हैं - ‘तत्त्वमसि’; एवं ज्योंही तूने अपने आत्माको पहचाना, त्योंही तुझे आपही मालूम हो जावेगा, कि समस्त जगत्के मूलमें क्या है । इस प्रकार पिताने श्वेतकेतुको भिन्न भिन्न नौ दृष्टान्तोंसे उपदेश किया है; और प्रतिबार ‘तत्त्वमसि’- वही तू है - इस सूत्रकी पुनरावृत्ति की है (छां. ६. ८-१६) । यह ‘तत्त्वमसि’ अद्वैत वेदान्तके महावाक्योंमें मुख्य वाक्य है । इस प्रकार निर्णय हो गया, कि ब्रह्म आत्मस्वरूपी है। परंतु आत्मा चिद्रूपी है, इसलिये संभव है, कि कुछ लोग ब्रह्मकोभी चिद्रूपी समझें । अतएव यहाँ ब्रह्मके और उसके साथही साथ आत्माके सच्चे स्वरूपका और थोड़ा-सा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है। आत्माके सान्निध्यसे जड़ात्मक बुद्धिमें उत्पन्न होनेवाले धर्मको चित् अर्थात् ज्ञान कहते हैं। परंतु जब कि बुद्धिके इस धर्मको आत्मापर लादना उचित नहीं है, तब तात्त्विक दृष्टिसे आत्माके मूलस्वरूपकोभी निर्गुण और अज्ञेयही मानना चाहिये । अतएव कई-एकौंका मत है, कि यदि ब्रह्म आत्मस्वरूपी है, तो इन दोनोंको या इनमेंसे किसीभी एकको चिद्रूपी कहना कुछ अंशोंमें गौणही है। यह आक्षेप अकेले चिद्रूपीपरही नहीं है। किंतु यह आप-ही-आप सिद्ध होता है, कि परब्रह्मके लिये ‘सत्’ विशेषणका प्रयोग करना उचित नहीं है। क्योंकि सत् और असत्, ये दोनों धर्म परस्पर-विरुद्ध और सदैव परस्पर-सापेक्ष हैं। अर्थात् भिन्न भिन्न दो वस्तुओंका निर्देश करनेके लिये कहे जाते हैं। जिसने कभी उजाला न देखा हो, वह अँधेरेकी कल्पना नहीं कर सकता। यही नहीं; किंतु ‘उजाला’ और ‘अँधेरा’ इन शब्दोंकी यह जोड़ीही उसको सूझ न पड़ेगी। सत् और असत् शब्दोंकी जोड़ी (द्वंद्व) के लिये यही न्याय उपयोगी है। जब हम देखते हैं, कि कुछ वस्तुओंका नाश होता है, तब सब वस्तुओंके असत् ( नाश होनेवाली ) और सत् ( नाश न होनेवाली ) ये दो भेद करने लगते हैं; अथवा सत् और असत् शब्द सूझ पड़नेके लिये मनुष्यकी दृष्टिके आगे दो प्रकारके विरुद्ध धर्मोंकी आवश्यकता होती है। अच्छा; यदि आरंभमें एकही वस्तु थी, तो द्वैतके उत्पन्न होने पर दो वस्तुओंके उद्देशसे जिन सापेक्ष सत् और असत् शब्दोंका प्रचार हुआ है, उनका प्रयोग इस मूल वस्तुके लिये कैसे किया जावेगा ? क्योंकि, यदि इसे सत् कहते हैं, तो शंका होती है, कि क्या उस समय उसकी जोड़का कुछ असत्भी था ? यही कारण है, जो ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें ( ऋ. १०. १२९ ) परब्रह्मको कोईभी विशेषण न दे कर सृष्टिके मूल तत्त्वका वर्णन उस प्रकार किया है, कि “जगतके आरंभमें न तो सत् था; और न असतभी था। जो कुछ था वह एकही था।” इन सत् और असत् शब्दोंकी जोड़ियाँ ( अथवा द्वंद्व ) तो पीछेसे निकली हैं; और गीतामें ( गीता ७. २८; २. ४५ ) कहा है, कि सत् और असत्, शीत और उष्ण आदि द्वंद्वोंसे जिसकी बुद्धि मुक्त हो