भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

२२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र दूसरेके जोड़के एकीकरण करनेवाले ये तत्व दो स्थानोंपर भलेही हों; परंतु वे परस्पर भिन्न भिन्न नहीं रह सकते। अतएव यह आपही सिद्ध होता है, कि इनमेंसे आत्माका जो रूप होगा, वही रूप ब्रह्मकाभी होना चहिये।* सारांश, किसीभी रीतिसे विचार क्यों न किया जाय; सिद्ध यही होगा कि, बाह्य सृष्टिके नाम और रूपोंसे आच्छादित ब्रह्मतत्त्व, नामरूपात्मक प्रकृतिके समान जड़ तो हैही नहीं, किंतु वासनात्मक ब्रह्म, मनोमय ब्रह्म, ज्ञानमय ब्रह्म, प्राणब्रह्म अथवा ॐकाररूपी शब्दब्रह्म

  • ये ब्रह्मके रूपभी निम्न श्रेणीके हैं; और ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप इनसे परे है; एवं इनसे अधिक योग्यताका अर्थात् शुद्ध आत्मस्वरूपी है। और इस विषयके संबंधमें गीतामें अनेक स्थानोंपर जो उल्लेख हैं, उनसे स्पष्ट होता है, कि गीताका सिद्धान्तभी यही है (गीता २.२०; ७.५; ८.४; १३.३१; १५.७, ८)। फिरभी यह न समझ लेना चाहिये, कि ब्रह्म और आत्माके एकस्वरूप रहनेके सिद्धान्तको हमारे ऋषियोंने केवल ऐसी युक्ति-प्रयुक्तियोंसेही पहले खोजा था। इसका कारण इसी प्रकरणके आरंभमें बतला चुके हैं, कि अध्यात्मशास्त्रमें बुद्धिमात्रकी सहायतासे कोईभी एकही अनुमान निश्चित नहीं किया जाता है, उसे सदैव आत्मप्रतीतिका सहारा चाहिये। इसके अतिरिक्त सर्वदा देखा जाता है, कि आधिभौतिक शास्त्रोंमेंभी अनुभव पहले होता है; और उसकी उपपत्ति या तो पीछेसे मालूम हो जाती है, या ढूँढ ली जाती है। इसी न्यायसे उक्त ब्रह्मात्मैक्यकी बुद्धिगम्य उपपत्तिके निकलनेके सैकड़ों वर्ष पहले प्राचीन ऋषियोंने प्रथम यह निर्णय कर दिया था, कि "नेह नानाऽस्ति किंचन" (बृ. ४.४.१९; कठ. ४.११) - इस सृष्टिमें दीख पड़नेवाली अनेकता सच नहीं है। उसके मूलमें चारों ओर एकही अमृत, अव्यय और नित्य तत्त्व है (गीता १८.२०)। और फिर उन्होंने अपनी अंतर्दृष्टिसे यह सिद्धान्त ढूँढ निकाला, कि बाह्यसृष्टिके नामरूपसे आच्छादित अविनाशी तत्त्व और हमारे शरीरका वह आत्मतत्त्व - कि जो बुद्धिसे परे है - ये दोनों एकही अर्थात् अमर और अव्यय हैं; अथवा जो तत्त्व ब्रह्मांडमें है, वही पिंडमें यानी मनुष्यकी देहमें वास करता है। एवं बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीको, गार्गी-वारुणि प्रभृतिको और जनकको (बृ. ३.५-८; ४.२-४) बतलाया है कि पूरे वेदान्तका यही रहस्य है। इसी उपनिषद्में पहले कहा गया गया है, कि जिसने जान लिया, कि "अहं ब्रह्मास्मि" - मैंही परब्रह्म हूँ - उसने सब कुछ जान लिया (बृ. १.४. १०); और छांदोग्य उपनिषदके छठे अध्यायमें श्वेतकेतुको उसके पिताने अद्वैत वेदान्तका यही तत्त्व अनेक रीतियोंसे समझा दिया है। जब अध्यायके आरंभमें श्वेत- केतुने अपने पितासे पूछा, कि "जिस प्रकार मिट्टीके एक लौंदेका भेद जान लेनेसे मिट्टीके नामरूपात्मक सभी विकार जाने जाते हैं, उसी प्रकार जिस एकही वस्तुका ज्ञान हो जानेसे सब कुछ समझमें आ जावें; वही एक वस्तु मुझे बतलाइये, मुझे उसका
  • Green's Prolegomena to Ethics, § PP. 26-36.