भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 956 में से

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पृष्ठ 272

अध्यात्म २२५ रहनेवाला' है। इस कारण नित्य बदलनेवाले और नाशवान् नामरूपको सत्य कहन उत्तरोत्तर औरभी अनुचित जँचने लगा। परंतु इस रीतिमे 'माया अथवा मिथ्या' शब्दोंका प्रचार पीछे भलेही हुआ हो; तोभी ये विचार बहुत पुराने जमानेसे चले आ रहे हैं, कि जगत्की वस्तुओंका वह दृश्य, जो नज़रसे दीख पड़ता है, विनाशी और असत्य है। एवं उसका आधारभूत 'तात्त्विक द्रव्य' ही सत् या सत्य है। प्रत्यक्ष ऋग्वेदमेंभी कहा है कि "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ. १. १६४. ४६. और १०. ११४. ५) - मूलमें जो एक और नित्य (सत्) है, उसीको विप्र (ज्ञाता) भिन्न भिन्न नाम देते हैं- अर्थात् एकही सत्य वस्तु नामरूपसे भिन्न भिन्न दीख पड़ती है। 'एक रूपके अनेक रूप दिखलाने 'के अर्थमें, 'माया' शब्द ऋग्वेदमेंभी प्रयुक्त है; और वहाँ यह वर्णन है, कि "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूपः ईयते" - इंद्र अपनी मायासे अनेक रूप धारण करता है (ऋ. ६. ४७. १८) । तैत्तिरीय संहिता (तै. सं. ३. १. ११) में एक स्थानपर 'माया' शब्दका इसी अर्थमें प्रयोग किया गया है; और श्वेताश्वतर उपनिषदमें इस 'माया' शब्दका नामरूपके लिये उपयोग हुआ है; जो हो, नामरूपके लिये 'माया' शब्दका प्रयोग किये जानेकी रीति प्रथम श्वेताश्वतर उपनिषदके समयमें भलेही चल निकली हो; पर इतना तो निर्विवाद है, कि नामरूपोंके अनित्य अथवा असत्य होनेकी कल्पना इससे पहलेकी है। 'माया' शब्दका विपरीत अर्थ करके श्रीशंकराचार्यने यह कल्पना नये सिरेसे नहीं चला दी है। नामरूपात्मक सृष्टिके स्वरूपको श्रीशंकरा- चार्यके समान बेधड़क 'मिथ्या' कह देनेकी जो हिम्मत न कर सकें; अथवा जैसे गीतामें भगवानने उसी अर्थमें 'माया' शब्दका उपयोग किया है; वैसा करनेसे जो हिचकते हों; वे चाहें तो खुशीसे बृहदारण्यक उपनिषद्‌के 'सत्य' और 'अमृत' शब्दोंका उपयोग करें। कुछभी क्यों न कहा जावे; पर इस सिद्धान्तमें जराभी चोट नहीं लगती, कि नामरूप 'विनाशवान्' हैं; और जो तत्त्व उनसे आच्छादित है, वह 'अमृत' या 'अविनाशी' है। एवं यह भेद प्राचीन वैदिक कालसे चला आ रहा है। हमारे आत्माको नामरूपात्मक बाह्य सृष्टिके सारे पदार्थोंका ज्ञान होनेके लिये 'कुछ-न-कुछ' एक ऐसा नित्य मूल द्रव्य होना चाहिये, कि जो आत्माका आधार- भूत हो; और उसीके मेलका हो। एवं बाह्य सृष्टिके नाना पदार्थोंकी जड़में वर्तमान रहता हो; नहीं तो यह ज्ञानही न होगा। किंतु इतना निश्चय कर देनेसे अध्यात्म- शास्त्रका काम समाप्त नहीं हो जाता। बाह्य सृष्टिके मूलमें रहनेवाले इस नित्य द्रव्यको वेदान्ती लोग 'ब्रह्म' कहते हैं; और अब हो सके तो ब्रह्मके स्वरूपका निर्णय करनाभी आवश्यक है। सारे नामरूपात्मक पदार्थोंके मूलमें वर्तमान यह नित्य तत्त्व है अव्यक्त। इसलिये प्रकटही है, कि इसका स्वरूप नामरूपात्मक पदार्थोंके समान व्यक्त और स्थूल (जड़) नहीं रह सकता। परंतु यदि व्यक्त और स्थूल पदार्थोंको छोड़ दें, तो मन, स्मृति, वासना, प्राण और ज्ञान प्रभृति बहुतसे ऐसे अव्यक्त पदार्थ हैं; कि जो स्थूल नहीं हैं; । एवं यह असंभव नहीं, कि परब्रह्म इनमेंसे किसीभी एक गी. र. १५

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