श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किया है, कि देहेंद्रियों और बाह्य सृष्टिके निशिदिन बदलनेवाले अर्थात् मिथ्या दृश्योंके मूलमें दोनोंही ओर कोई नित्य अर्थात् सत्य द्रव्य छिपा हुआ है। इसके आगे अब प्रश्न होता है, कि दोनों ओर जो ये नित्य तत्त्व हैं, वे अलग अलग हैं या एकरूपी हैं ? परंतु इसका विचार फिर करेंगे। पहले इस मतकी अर्वाचीनताके संबंधमें मौके- बेमौके जो आक्षेप हुआ करता है, उसीका थोड़ा-सा विचार करते हैं। कई लोग कहते हैं, कि बौद्धोंका विज्ञानवाद यदि वेदान्तशास्त्रको संमत नहीं है, तो श्रीशंकराचार्यके मायावादकाभी प्राचीन उपनिषदोंमें वर्णन नहीं है; इसलिये उसेभी वेदान्तशास्त्रका मूलभाग नहीं मान सकते। श्रीशंकराचार्यका मत - कि जिसे मायावाद कहते हैं - यह है, कि बाह्यसृष्टिका आँखोंसे दीख पड़नेवाला नामरूपात्मक स्वरूप मिथ्या है। उसके मूलमें जो अव्यय और नित्यद्रव्य है, वही सत्य है। परंतु उपनिषदोंका मन लगाकर अध्ययन करनेसे कोईभी सहजही जान जावेगा, कि यह आक्षेप निराधार है। यह पहलेही बतला चुके हैं, कि 'सत्य' शब्दका उपयोग साधारण व्यवहारमें आँखोंसे प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाली वस्तुके लिये किया जाता है। अतः 'सत्य' शब्दके इसी प्रचलित अर्थको लेकर उपनिषदोंमें कुछ स्थानोंपर आँखोंसे दीख पड़ने- वाले नामरूपात्मक बाह्य पदार्थोंको 'सत्य' और उन नामरूपोंसे आच्छादित द्रव्यको 'अमृत' नाम दिया गया है। उदाहरण लीजिये। बृहदारण्यक उपनिषद्में (बृ. १. ६. ३) "तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नं" - वह अमृत सत्यसे आच्छादित है - कह कर तुरंत अमृत और सत्य शब्दोंकी यह व्याख्या की है, कि "प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः" अर्थात् प्राण अमृत है; और नामरूप सत्य है। एवं इस नाम- रूप सत्यसे प्राण ढँका हुआ है। यहाँ प्राणका अर्थ प्राणस्वरूपी परब्रह्म है। इससे प्रकट है, कि आगेके उपनिषदोंमें जिन्हें 'मिथ्या' और 'सत्य' कहा है, पहले उन्हींके नाम क्रमसे 'सत्य' और 'अमृत' थे। अनेक स्थानोंपर इसी अमृतको 'सत्यस्य सत्यं'
- आँखोंसे दीख पड़नेवाले सत्यके भीतरका अंतिम सत्य (बृ. २. ३. ६) -- कहा है। किंतु उक्त आक्षेप इतनेहीसे सिद्ध नहीं हो जाता, कि उपनिषदोंमें कुछ स्थानोंपर आँखोंसे दीख पड़नेवाली सृष्टिकोही सत्य कहा है। क्योंकि बृहदारण्यकमेंही अंतमें यह सिद्धान्त किया है, कि आत्मरूप परब्रह्मको छोड़, और सब 'आर्तम्' अर्थात् विनाश- वान् है (बृ. ३. ७. २३)। जब पहले पहल जगत्के मूलतत्त्वकी खोज होने लगी, तब शोधक लोग आँखोंसे दीख पड़नेवाले जगत्को पहले सत्य मानकर ढूँढ़ने लगे, कि उसके पेटमें और कौन-सा सूक्ष्म सत्य छिपा हुआ है। किंतु फिर ज्ञात हुआ, कि जिस दृश्य सृष्टिके रूपको हम सत्य मानते हैं, वह तो असलमें विनाशवान् है; और उसके भीतर कोई अविनाशी या अमृत तत्त्व मौजूद है। दोनोंके बीचके इस भेदको जैसे जैसे अधिक व्यक्त करनेकी आवश्यकता होने लगी, वैसे वैसे 'सत्य' और 'अमृत' शब्दोंके स्थानमें 'अविद्या' और 'विद्या', एवं अंतमें 'माया और सत्य' अथवा 'मिथ्या और सत्य' इन पारिभाषिक शब्दोंका प्रचार होता गया। क्योंकि 'सत्य'का धात्वर्थ 'सदैव