श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जैसी श्रद्धा हो, उसे वैसी सिद्धि प्राप्त होती है (गीता १७. ३)। तात्पर्य यह है, कि उपासकके अधिकारभेदके अनुसार उपास्य अव्यक्त परमात्माके गुणभी उप- निषदोंमें भिन्न भिन्न कहे गये हैं। उपनिषदोंके इस प्रकरणको 'विद्या' कहते हैं। विद्या ईश्वरप्राप्तिका (उपासनारूप) मार्ग है; और यह मार्ग जिस प्रकरणमें बतलाया गया है, उसेभी 'विद्या'ही नाम अंतमें दिया जाता है। शांडिल्यविद्या (छां. ३. १४), पुरुषविद्या (छां. ३. १६, १७), पर्यंकविद्या (कौषी. १), प्राणोपासना (कौषी. २) इत्यादि अनेक प्रकारकी उपासनाओंका वर्णन उपनिषदोंमें किया गया है; और इस सबका विवेचन वेदान्तसूत्रोंके तृतीयाध्यायके तीसरे पादमें किया गया है। इस प्रकरणमें अव्यक्त परमात्माका सगुण वर्णन इस प्रकार है, कि वह मनोमय, प्राणशरीर, भारूप, सत्यसंकल्प, आकाशात्मा, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगंध और सर्वरस है (छां. ३. १४. २)। तैत्तिरीय उपनिषद्में तो अन्न, प्राण, मन, विज्ञान या आनंद
- इन रूपोंमेंभी परमात्माकी बढ़ती हुई उपासना बतलाई गई है (तै. २. १-५; ३. २-६)। बृहदारण्यकमें (बृ. २. १) गार्ग्य बालाकीने अजातशत्रुको पहले पहल आदित्य, चंद्र, विद्युत्, आकाश, वायु, अग्नि, जल या दिशाओंमें रहनेवाले पुरुषोंकी ब्रह्मरूपसे उपासना बतलाई है; परंतु आगे अजातशत्रुने उससे यह कहा, कि सच्चा ब्रह्म इनकेभी परे है; और अंतमें प्राणोपासनाहीको मुख्य ठहराया है। इतनेहीसे यह परंपरा कुछ पूरी नहीं हो जाती। उपर्युक्त सब ब्रह्मरूपोंको प्रतीक, अर्थात् इन सबको उपासनाके लिये कल्पित गौण ब्रह्मस्वरूप अथवा ब्रह्मनिदर्शक चिन्ह कहते हैं; और जब यही गौणरूप किसी मूर्तिके रूपमें नेत्रोंके सामने रखा जाता है, तब उसीको 'प्रतिमा' कहते हैं। परंतु स्मरण रहे, कि सब उपनिषदोंका सिद्धांत यही है, कि सच्चा ब्रह्मरूप इनसे भिन्न है (केन. १. २-८)। इस ब्रह्मके लक्षणका वर्णन करते समय कई स्थानोंमें तो "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तैत्ति. २. १) या "विज्ञानमानंदं ब्रह्म" (बृ. ३. ९. २८) कहा है। अर्थात् ब्रह्म सत्य (सत्), ज्ञान (चित्) और आनंदरूप है - अर्थात् सच्चिदानंदस्वरूप है - इस प्रकार सब गुणोंका तीनही गुणोंमें समावेश करके वर्णन किया गया है। और अन्य स्थानोंमें भगवद्गीताके समानही परस्परविरुद्ध गुणोंको एकत्र करके ब्रह्मका वर्णन इस प्रकार किया गया है, कि "ब्रह्म सत् भी नहीं और असत्भी नहीं" (ऋ. १०. १२९. १) अथवा "अणोरणीयान्- महतो महीयान्" अर्थात् अणुसेभी छोटा और बड़ेसेभी बड़ा है (कठ. २. २०) "तदेजति तन्नैजति तत् दूरे तद्वन्तिके" अर्थात् वह हिलता है और हिलताभी नहीं; वह दूर है और समीपभी है (ईश. ५; मुं. ३. १. ७); अथवा "सर्वेन्द्रियगुणाभासं होकरभी 'सर्वेन्द्रियविवर्जित' है (श्वेता. ३. १३)। मृत्युने नचिकेताको यह उपदेश किया है, कि अंतमें उपर्युक्त सब लक्षणोंको छोड़ दो और जो धर्म और अधर्मके, कृत और अकृतके, अथवा भूत और भव्यकेभी परे है, उसेही ब्रह्म जानो (कठ. २.१४)। इसी प्रकार महाभारतके नारायणीय धर्ममें ब्रह्मा रुद्रसे (मभा. शां. ३५१. ११),