भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

अध्यात्म २०७ और इसीलिये यद्यपि वह प्राणियोंके कर्तृत्व और कर्मसे वस्तुतः अलिप्त है, तथापि अज्ञानमें फँसे हुए लोग मोहित हो जाया करते हैं (गीता ५. १४, १५)। इस प्रकार अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर परमेश्वरके रूप - सगुण और निर्गुण - दोकेही तरह नहीं हैं किंतु इसके अतिरिक्त कही कही इन दोनोंको एकत्र मिलाकरभी अव्यक्त परमेश्वरका वर्णन किया गया है। उदाहरणार्थ, “भूतभृत् न च भूतस्थो” (गीता ९. ५) “मैं भूतोंका आधार होकरभी उनमें नहीं हूँ,” इस तरह नौवें और तेरहवें अध्यायमें “परब्रह्म न तो सत् है और न असत्” (गीता १३. १२), “सर्वेद्रियवान् होनेका जिसमें भास हो परंतु जो सर्वेद्रियरहित है, और निर्गुण हो कर गुणोंका उपभोग करनेवाला है” (गीता १३. १४), “दूर है और समीपभी है” (गीता १३. १५), “अविभक्त है और विभक्तभी दीख पड़ता है” (गीता १३. १६) - इस प्रकार परमेश्वरके स्वरूपका सगुण-निर्गुण-मिश्रित अर्थात् परस्पर- विरोधी वर्णनभी किया गया है। तथापि आरंभमें दूसरेही अध्यायमें कहा गया है, कि “यह आत्मा अव्यक्त, अचित्य और अविकार्य है” (गीता २. २५), और फिर तेरहवें अध्यायमें - “यह परमात्मा अनादि, निर्गुण और अव्यक्त है; इसलिये शरीरमें रहकरभी न तो यह कुछ करता है और न किसीमें लिप्त होता है” (गीता १३. ३१) - इस प्रकार परमात्माके शुद्ध, निर्गुण, निरवयव, निर्विकार, अचिंत्य अनादि और अव्यक्त रूपकी श्रेष्ठताका वर्णन गीतामें किया गया है। भगवद्गीताकी भाँति उपनिषदोंमेंभी अव्यक्त परमात्माका स्वरूप तीन प्रकारका पाया जाता है - अर्थात् कभी कभी उभयविध यानी सगुण-निर्गुण-मिश्रित और कभी सगुण, निर्गुण। इस बातकी कोई आवश्यकता नहीं, कि उपासनाके लिये सदा प्रत्यक्ष मूर्तिही नेत्रोंके सामने रहे। ऐसे स्वरूपकीभी उपासना हो सकती है, कि जो निराकार अर्थात् चक्षु आदि ज्ञानेंद्रियोंको गोचर भलेही न हो; तोभी मनको गोचर हुए बिना उसकी उपासना होना संभव नहीं है। उपासना कहते हैं, चिंतन, मनन, या ध्यानको और यदि चिंतित वस्तुका कोई रूप न हो, तो न सही; परंतु जब तक उसका अन्य कोईभी गुण मनको मालूम न हो जाय, तब तक मन चिंतन करेगाही किसका ? अतएव उपनिषदोंमें जहाँ जहाँ अव्यक्त अर्थात् नेत्रोंमें न दिखाई देनेवाले परमात्माकी उपासना (चिंतन, मनन, ध्यान) बतलाई गई है वहाँ वहाँ अव्यक्त परमेश्वर सगुणही कल्पित किया गया है। परमात्मामें कल्पित गुण उपासकके अधिकारानुसार न्यूनाधिक व्यापक या सात्त्विक होते हैं; और जिसकी जैसी निष्ठा हो, उसको वैसाही फलभी मिलता है। छांदोग्योपनिषद्में (छां. ३. १४. १) कहा है, कि “पुरुष ऋतुमय है। जिसका जैसा ऋतु (निश्चय) हो, उसे मृत्युके पश्चात् वैसाही फलभी मिलता है।” और भगवद्गीताभी कहती है, कि “देवताओंकी भक्ति करनेवाले देवताओंमें और पितरोंकी भक्ति करनेवाले पित- रोंमें जा मिलते हैं” (गीता ९. २५), अथवा “यो यच्छ्रद्धः स एव सः” - जिसकी