श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सच्चा स्वरूप सर्वव्यापी, अव्यक्त और नित्य है और उसे सिद्धपुरुषही पहचानते हैं" (मभा. शां. ३३९. ४४, ४८) । इससे कहना पड़ता है, कि गीतामें वर्णित भगवानका अर्जुनको दिखलाया हुआ विश्वरूपभी मायिक था ! सारांश, उपर्युक्त वचनोंसे इस विषयमें कुछ भी संदेह नहीं रह जाता, कि गीताका यही सिद्धान्त होना चाहिये, कि यद्यपि केवल उपासनाके लिये व्यक्त स्वरूपकी प्रशंसा गीतामें भगवान्ने की है; तथापि परमेश्वरका श्रेष्ठ स्वरूप अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचरही है; और अव्यक्तसे व्यक्त होनाही उसकी माया है। और इस मायासे पार होकर जब तक मनुष्यको मायाके परे परमात्माके, शुद्ध तथा अव्यक्त रूपका ज्ञान न हो, तबतक उसे मोक्ष नहीं मिल सकता। अब इसका अधिक विचार आगे करेंगे, कि माया क्या वस्तु है। ऊपर दिये गये वचनोंसे इतनी बात स्पष्ट है, कि यह मायावाद श्रीशंकराचार्यने नये सिरेसे नहीं उपस्थित किया है; किंतु उनके पहलेही भगवद्गीता, महाभारत और भागवतधर्ममेंभी वह ग्राह्य माना गया था। श्वेताश्वतरोपनिषद्मेंभी सृष्टिकी उत्पत्ति इस प्रकार कही गई है - "मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" (श्वेता. ४. १०) - अर्थात् मायाही (सांख्योंकी) प्रकृति है और परमेश्वर उस मायाका अधिपति है, और वही अपनी मायासे विश्व निर्माण करता है। अब इतनी बात यद्यपि स्पष्ट हो चुकी, कि परमेश्वरका श्रेष्ठ स्वरूप व्यक्त नहीं, अव्यक्त है, तथापि यहाँ थोड़ा-सा विचार होनाभी आवश्यक है, कि परमात्माका यह श्रेष्ठ अव्यक्त स्वरूप सगुण है या निर्गुण। जब कि सगुण-अव्यक्तका हमारे सामने यह एक उदाहरण है, कि सांख्यशास्त्रकी प्रकृति अव्यक्त (अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर) होनेपरभी सगुण अर्थात् सत्त्व-रज-तम-गुणमय है; तब कुछ लोग यह कहते हैं, कि परमेश्वरका अव्यक्त और श्रेष्ठ रूपभी उसी प्रकार सगुण माना जावे। अपनी मायाहीसे क्यों न हो; परंतु जब कि वही अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त सृष्टि निर्माण करता है (गीता ९. ८); और सब लोगोंके हृदयमें रहकर उनसे उनके सारे व्यापार करवाता है (गीता १८. ६१), जब की वह सब यज्ञोंका भोक्ता और प्रभु है (गीता ९. २४); जब कि प्राणियोंके सुखदुःख आदि सब 'भाव' उसीसे उत्पन्न होते हैं, (गीता १०. ५) और जब कि प्राणियोंके हृदयमें श्रद्धा उत्पन्न करनेवालाभी वही है; एवं "लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्" (गीता ७. २२) - प्राणियोंकी वासनाका फल देनेवालाभी वही है; तब तो यही बात सिद्ध होती है, कि वह अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर भलेही हो; तथापि वह दया, कर्तृत्व आदि गुणोंसे युक्त अर्थात् 'सगुण' अवश्यही होना चाहिये। परंतु इसके विरुद्ध भगवान् ऐसाभी कहते हैं, कि "न मां कर्माणि लिम्पन्ति" - मुझे कर्मोंका अर्थात् गुणोंकाभी कभी स्पर्श नहीं होता (गीता ४. १४), प्रकृतिके गुणोंसे मोहित होकर मूर्ख लोग आत्माहीको कर्ता मानते हैं (गीता ३. २७, १४. १९) अथवा, यह अव्यक्त और अकर्ता परमेश्वरही प्राणियोंके हृदयमें जीवरूपसे निवास करता है (गीता १३. ३१),