भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 956 में से

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अध्यात्म २०५ शाश्वत धर्मका और अनंत सुखका मूल स्थान हूँ” (गीता १४. २७)। इससे विदित होगा, कि गीतामें आदिसे अंततक अधिकांशमें भगवानके व्यक्त स्वरूप- काही वर्णन किया गया है। इतनेहीसे केवल भक्तिके अभिमानी बहुतेरे पंडितों और टीकाकारोंने यह मत प्रकट किया है, कि गीतामें परमात्माका व्यक्त रूपही अंतिम साध्य माना गया है। परंतु उनका यह मत सच नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उक्त वर्णनके साथही भगवानने स्पष्ट रूपसे कह दिया है, कि मेरा व्यक्त स्वरूप मायिक है, और उसके परेका जो अव्यक्त रूप - अर्थात् जो इंद्रियोंको अगोचर-है, वही मेरा सच्चा स्वरूप है। उदाहरणार्थ, भगवानने, सातवें अध्यायमें (गीता ७. २४) कहा है, कि :- अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ “यद्यपि मैं अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर हूँ, तोभी मूर्ख लोग मुझे व्यक्त समझते हैं, और व्यक्तसेभी परेके मेरे श्रेष्ठ तथा अव्यक्त रूपको नहीं पहचानते।” और इसके अगले श्लोकमें भगवान् कहते हैं, कि “मैं अपनी योगमायासे आच्छादित हूँ, इसलिये मूर्ख लोग मुझे नहीं पहचानते” (गीता ७. २५)। फिर चौथे अध्यायमें उन्होंने अपने व्यक्त रूपकी उत्पत्ति इस प्रकार बतलाई है, “मैं यद्यपि जन्मरहित और अव्यय हूँ, तथापि अपनीही प्रकृतिमें अधिष्ठित होकर मैं अपनी मायासे (स्वात्ममाया मे) जन्म लिया करता हूँ - अर्थात् व्यक्त होता रहता हूँ” (गीता ४. ६)। वे आगे सातवें अध्यायमें कहते हैं, “यह त्रिगुणात्मक प्रकृति मेरी दैवी माया है। इस मायाको जो पार कर जाते हैं, वे मुझमें समा जाते हैं, और इस मायासे जिनका ज्ञान नष्ट हो जाता है, वे मूढ नराधम मुझमें नहीं समा जा सकते।” (गीता ७. १४, १५)। अंतमें अठारहवें (गीता १८. ६१) अध्यायमें भगवानने उपदेश किया है, कि “हे अर्जुन ! सब प्राणियोंके हृदयमें जीवरूप परमात्माहीका निवास है; और वह अपनी मायासे यंत्रकी भांति सब प्राणियोंको घुमाता है।” भगवान्‌ने अर्जुनको जो विश्वरूप दिखाया है, वही नारदकोभी दिखलाया था। इसका वर्णन महाभारतके शांतिपर्वान्तर्गत नारायणीय प्रकरणमें (मभा. शां. ३३९) है; और हम पहलेही प्रकरणमें बतला चुके हैं, कि नारायणीय अर्थात् भागवतधर्मही गीतामें प्रतिपादित किया गया है। नारदको हजारों नेत्रों, रंगों, तथा अन्य गुणोंका विश्वरूप दिखलाकर भगवान्‌ने कहा :- माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद । सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि ॥ “तुम मेरा जो रूप देख रहे हो, वह मेरी उत्पन्न की हुई माया है। इससे तुम यह न समझो, कि मैं, सर्वभूतोंके गुणोंसे युक्त हूँ।” और यह फिरभी कहा है, कि “मेरा

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