भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 251

२०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अर्थ 'दाड़िमके फलके समान एक' जानना चाहिये । जब जीवके स्वरूपके विषयमें यह मतांतर उपस्थित हो गया, तब भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाकार अपने अपने मतके अनुसार उपनिषदों और गीताके शब्दोंकीभी खींचातानी करने लगे जिससे गीताका यथार्थ स्वरूप - उसमें प्रतिपादित सच्चा कर्मयोग विषय - तो एक ओर रह गया, और अनेक सांप्रदायिक टीकाकारोंके मतसे गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय यही हो गया, कि गीताप्रतिपादित वेदान्त द्वैतमतका है या अद्वैतमतका ! अस्तु, इसके बारेमें अधिक विचार करनेके पहले यह देखना चाहिये, कि जगत् ( प्रकृति ), जीव ( आत्मा अथवा पुरुष ), और परब्रह्मके ( परमात्मा अथवा पुरुषोत्तम ) परस्परसंबंधके विषयमें स्वयं भगवान् श्रीकृष्णही गीतामें क्या कहते हैं। आगेके विवेचनसे पाठकोंको विदित होगा कि इस विषयमें गीता और उपनिषदोंका एकही मत है, और गीतामें कहे गये सब विचार उपनिषदोंमें पहलेही आ चुके हैं। प्रकृति और पुरुषकेभी परे जो पुरुषोत्तम, परपुरुष, परमात्मा या परब्रह्म है, उसका वर्णन करते समय भगवद्गीतामें पहले उसके दो स्वरूप बतलाये गये हैं, यथा, व्यक्त और अव्यक्त ( आँखोंसे दिखनेवाला और आँखोंसे न दिखनेवाला ) । अब इसमें संदेह नहीं, कि व्यक्त स्वरूप अर्थात् इंद्रियगोचर रूप सगुणही होना चाहिये । अब शेष रहा अव्यक्त रूप । यह सच है, कि यह अव्यक्त रूप इंद्रियोंको अगोचर है। और अव्यक्त रूप यद्यपि इंद्रयोंको अगोचर है, तोभी इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकता, कि वह निर्गुणही हो । क्योंकि, यद्यपि वह हमारी आँखोंसे न दीख पड़े, तोभी उसमें सब प्रकारके गुण सूक्ष्म रूपसे रह सकते हैं। इसलिये अव्यक्तकेभी तीन भेद किये हैं, जैसे सगुण, सगुणनिर्गुण और निर्गुण । यहाँ 'गुण' शब्दमें उन सब गुणोंका समावेश किया गया है, कि जिनका ज्ञान मनुष्यको केवल उसकी बाह्येंद्रियोंसे नहीं होता, किंतु मनसेभी होता है। परमेश्वरके मूर्तिमान् अवतार भगवान् श्रीकृष्ण स्वयंसाक्षात् अर्जुनके सामने खड़े होकर उपदेश कर रहे थे । इसलिये गीतामें जगह- जगहपर अपने व्यक्तिस्वरूपको लक्ष करके उन्होंने अपने विषयमें प्रथम पुरुषका निर्देश इस प्रकार किया है - जैसे, "प्रकृति मेरा स्वरूप है" (गीता ९. ८), "जीव मेरा अंश है" ( गीता १५. ७ ), "सब भूतोंका अंतर्यामी आत्मा मैं हूँ" ( गीता १०. २० ), "संसारमें जितनी श्रीमान् या विभूतिमान् मूर्तियां हैं, वे सब मेरे अंशमे उत्पन्न हुई है" ( गीता १०. ४१ ), "मुझमें मन लगा कर मेरा भक्त हो" ( गीता. ९. ३४ ), "तो तू मुझीमें मिल जायगा," "तू मेरा प्रिय भक्त है, इसलिये मैं तुझे यह प्रतिज्ञापूर्वक बतलाता हूँ" (गीता १८. ६५)। और जब अपने विश्वरूपदर्शनसे अर्जुनको यह प्रत्यक्ष अनुभव करा दिया, कि सारी चराचर सृष्टि मेरे व्यक्त रूपमेंही साक्षात् भरी हुई है, तब भगवानने उसको यही उपदेश किया है, कि अव्यक्त रूपसे व्यक्त रूपकी उपासना करना अधिक सहज है । " इसलिये तू मुझमेंही अपना भक्तिभाव रख" (गीता १२. ८), "मैँही ब्रह्मका, अव्यक्त मोक्षका,