श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 244, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ प्रकरण अध्यात्म परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात् सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ * — गीता ८.२० पिछले दो प्रकरणोंका सारांश यही है, कि क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचारमें जिसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं, उसीको सांख्यशास्त्रमें पुरुष कहते हैं। सब क्षर-अक्षर या चर-अचर सृष्टिके संहार और उत्पत्तिका विचार करनेपर सांख्यशास्त्रके अनुसार अंतमें केवल प्रकृति और पुरुष यही दो स्वतंत्र तथा अनादि मूलतत्त्व रह जाते हैं; और पुरुषको अपने क्लेशोंकी निवृत्ति कर लेने तथा मोक्षानंद प्राप्त कर लेनेके लिये प्रकृतिसे अपना भिन्नत्व अर्थात् कैवल्य जानकर त्रिगुणातीत होना चाहिये । प्रकृति और पुरुषका संयोग होनेपर प्रकृति अपना बाजार पुरुषके सामने किस प्रकार लगाया करती है, इस विषयका क्रम अर्वाचीन सृष्टिशास्त्रवेत्ताओंने सांख्यशास्त्रसे कुछ निराला बतलाया है; और संभव है, कि आधिभौतिक शास्त्रोंकी ज्यों ज्यों उन्नति होगी, त्यों त्यों इस क्रममें औरभी सुधार होते जावेंगे ।। जोभी हो; इस मूलसिद्धान्तमें कभी कोई फ़र्क नहीं पड़ सकता, कि केवल एक अव्यक्त प्रकृतिसेही सारे व्यक्त पदार्थ गुणोत्कर्षके अनुसार क्रमक्रमसे निर्मित होते गये हैं। परंतु वेदान्तकेसरी इस विषयको अपना नही समझता — यह अन्य शास्त्रोंका विषय है; इसलिये वह इस विषयपर वादविवादभी नहीं करता । वह इन सब शास्त्रोंसे आगे बढ़कर यह बतलानेके लिये प्रवृत्त हुआ है, कि पिंड-ब्रह्मांडकी जड़में कौनसा श्रेष्ठ तत्त्व है; और मनुष्य उस श्रेष्ठ तत्त्वमें कैसे मिला जा सकता है – अर्थात् तद्रूप कैसे हो सकता है । वेदान्तकेसरी अपने इस विषयप्रदेशमें किसी और शास्त्रकी गर्जना नहीं होने देता । सिंहके आगे गीदड़की भाँति वेदान्तके सामने सारे शास्त्र चुप हो जाते हैं। अतएव किसी पुराने सुभाषित- कारने वेदान्तका यथार्थ वर्णन यों किया है :– तावत् गर्जन्ति शास्त्राणि जम्बुका विपिने यथा । न गर्जति महाशक्तिः यावद्वेदान्तकेसरी ॥ सांख्यशास्त्रका कथन है, कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका विचार करनेपर निष्पन्न होनेवाला
- “ जो दूसरा अव्यक्त पदार्थ उस ( सांख्य ) अव्यक्तसेभी श्रेष्ठ तथा सनातन है; और सब प्राणियोंका नाश हो जानेपरभी जिसका नाश नहीं होता, वही अंतिम गति है।”