भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

१९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'द्रष्टा' अर्थात् पुरुष या आत्मा, और क्षर-अक्षर-सृष्टिका विचार करनेपर निष्पन्न होनेवाली सत्त्व-रज-तम-गुणमयी अव्यक्त प्रकृति, ये दोनों स्वतंत्र हैं; और इस प्रकार जगत्के मूलतत्त्वको द्विधा मानना आवश्यक है। परंतु वेदान्त इसके आगे जा कर यों कहता है, कि सांख्योंके 'पुरुष' निर्गुण भलेही; तोभी वे असंख्य हैं। इसलिये यह मान लेना उचित नहीं, कि इन असंख्य पुरुषोंका लाभ जिस बातमें हो, उसे जानकर प्रत्येक पुरुषके साथ तदनुसार बर्ताव करनेकी सामर्थ्य प्रकृतिमें है। ऐसा माननेकी अपेक्षा सात्त्विक तर्कशास्त्रकी दृष्टिसे तो यही अधिक युक्तिसंगत होगा, कि जो एकीकरणकी ज्ञानक्रिया “अविभक्तं विभक्तेषु"के अनुसार नीचेसे ऊपर तककी श्रेणियोंमें दीख पड़ती है; ओर जिसकी सहायतासेही सृष्टिके अनेक व्यक्त पदार्थोंका एक अव्यक्त प्रकृतिमें समावेश किया जाता है उसी एकीकरणकी ज्ञान-क्रियाका अंत- तक निरपवाद उपयोग किया जावेः और प्रकृति तथा असंख्य पुरुषोंका एकही परमतत्त्वमें अविभक्तरूपसे समावेश किया जावेः। (गीता १८. २०-२२)। भिन्नता होना अहंकारका परिणाम है; और पुरुष यदि निर्गुण है, तो असंख्य पुरुषोंके अलग अलग रहनेका गुण उसमें रह नहीं सकता। अथवा यह कहना पड़ता है, कि वस्तुतः पुरुष असंख्य नहीं है और केवल प्रकृतिकी अहंकाररूपी उपाधिसे उनमें अनेकता दीख पड़ती है। दूसरा एक प्रश्न यह उठता है, कि स्वतंत्र पुरुषका स्वतंत्र पुरुषके साथ जो संयोग हुआ है, वह सत्य है या मिथ्या ? यदि सत्य मानें, तो वह संयोग कभीभी छूट नहीं सकता। अतएव सांख्यमतानुसार आत्माको मुक्ति कभी प्राप्त नहीं हो सकती। और यदि मिथ्या माने, तो यह सिद्धान्तही निर्मूल या निराधार हो जाता है कि पुरुषके संयोगसे प्रकृति अपना बाजार उसके आगे लगाया करती है। और यह दृष्टान्तभी ठीक नहीं, कि जिस प्रकार गाय अपने बछड़ेके लिये दूध देती है, उसी प्रकार पुरुषके लाभके लिये प्रकृति सदा कार्यरतपर रहती है। क्योंकि, बछड़ा गायके पेटसेही पैदा होता है, इसलिये उसपर पुत्रवात्सल्यके प्रेमका उदाहरण जैसे संगठित होता है, वैसे प्रकृति और पुरुषके विषयमें नहीं कहा जा सकता (वे. सू. शां. भा. २. २. ३)। सांख्यमतके अनुसार प्रकृति और पुरुष - दोनों तत्त्व मूलतः अत्यंत भिन्न हैं- एक जड़ है, दूसरा सचेतन। अच्छा; जब ये दोनों पदार्थ सृष्टिके उत्पत्तिकालसेही एक दूसरेसे अत्यंत भिन्न और स्वतंत्र हैं, तो फिर एककी प्रवृत्ति दूसरेके फायदेहीके लिये क्यों होनी चाहिये ? यह तो कोई समाधानकारक उत्तर नहीं कि उनका स्वभावही वैसा है। स्वभावही मानना हो, तो फिर उनमेंसे हेकेलका जड़ाद्वैतवाद क्यों बुरा है? हेकेलकाभी सिद्धान्त यही है न, कि मूलप्रकृतिके गुणोंकी वृद्धि होते होते उसी प्रकृतिमें अपने आपको देखनेकी और अपने विषयमें विचार करनेकी चैतन्यशक्ति उत्पन्न हो जाती है - अर्थात् यह प्रकृतिका स्वभावही है। परंतु इस मतका स्वीकार न कर सांख्यशास्त्रने यह भेद किया है, कि 'द्रष्टा' अलग है; और दृश्यसृष्टि अलग है। अब यह प्रश्न उपस्थित होता है, कि सांख्यवादी जिस न्यायका अवलंबन कर