भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 246

अध्यात्म १९९ 'द्रष्टा पुरुष' और 'दृश्य सृष्टि' में भेद बतलाते हैं, उसी न्यायका उपयोग करते हुए और आगे क्यों न चलें ? दृश्य सृष्टिकी कोई कितनीही सूक्ष्मतासे परीक्षा करें; और यह जान लें, कि जिन नेत्रोंसे हम पदार्थोंको देखते परखते हैं, उनके मज्जातंतुओंमें अमुक अमुक गुण-धर्म हैं। तथापि इन सब बातोंको जाननेवाला (या 'द्रष्टा') भिन्नही रह जाता है, क्या उस 'द्रष्टा'के विषयमें - जो 'दृश्य सृष्टि' से भिन्न है - विचार करनेके लिये कोई साधन या उपाय नहीं है ? और यह जाननेके लियेभी कोई मार्ग है या नहीं, कि इस सृष्टिका सच्चा स्वरूप जैसा हम अपनी इंद्रियोंसे देखते हैं वैसाही है; या उससे भिन्न है ? सांख्यवादी कहते हैं, कि इन प्रश्नोंका निर्णय होना असंभव है। अतएव यह मान लेना पड़ता है, कि प्रकृति और पुरुष, दोनों तत्त्व मूलहीमें स्वतंत्र और भिन्न हैं। और यदि केवल आधिभौतिक शास्त्रोंकी प्रणालीसे विचार कर देखें, तो सांख्यवादियोंका यह मत अनुचित नहीं कहा जा सकता। कारण यह है, कि सृष्टिके अन्य पदार्थोंको जैसे हम अपनी इंद्रियोंसे देखभाल करके उनके गुणधर्मोंका विचार करते हैं, वैसे यह 'द्रष्टा पुरुष' या देखनेवाला - अर्थात् जिसे वेदान्तमें 'आत्मा' कहा है, वह - द्रष्टाकी ( अर्थात् अपनीही ) इंद्रियोंको भिन्न रूपमें कभी गोचर हो नहीं सकता। और जिस पदार्थका इस प्रकार इंद्रियगोचर होना असंभव है, यानी जो वस्तु इंद्रियातीत है उसकी परीक्षा मानवी इंद्रियोंसे कैसे हो सकती है? उस आत्माका वर्णन भगवान्ने गीतामें (गीता २. २३ ) इस प्रकार किया है :- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ अर्थात्, आत्मा ऐसा कोई पदार्थ नहीं कि यदि हम सृष्टिके अन्य पदार्थोंके समान उस- पर तेजाब आदि द्रव पदार्थ डालें तो वह द्रवरूप हो जाय, अथवा प्रयोगशालाके पैने शस्त्रोंसे काट-छांटकर उसका आंतरिक स्वरूप देख लें, या आगपर धर देनेसे उसका धुआँ हो जाय, अथवा हवामें रखनेसे वह सूख जाय ! सारांश, सृष्टिके पदार्थोंकी परीक्षा करनेके आधिभौतिक शास्त्रवेत्ताओंने जितने कुछ उपाय ढूंढ़े हैं, वे सब यहाँ निष्फल हो जाते हैं तो फिर आत्माका परीक्षण होगाभी तो कैसे ? प्रश्न है तो बिकट, पर विचार करनेसे कुछ कठिनाई दीख नहीं पड़ती। भला, सांख्यवादियोंनेभी 'पुरुष'- को निर्गुण और स्वतंत्र कैसे जाना ? केवल अपने अंतःकरणके अनुभवसेही जाना है न ? फिर उसी रीतिका उपयोग प्रकृति और पुरुषके सच्चे स्वरूपका निर्णय करनेके लिये क्यों न किया जावें ? आधिभौतिकशास्त्र और अध्यात्मशास्त्रमें जो बड़ा भारी भेद है, वह यही है। आधिभौतिकशास्त्रोंके विषय इंद्रियगोचर होते हैं; और अध्यात्म- शास्त्रका विषय इंद्रियातीत अर्थात् केवल स्वसंवेद्य है; यानी अपने आपही जानने योग्य है। कोई यह कहें, कि यदि 'आत्मा' स्वसंवेद्य है, तो प्रत्येक मनुष्यको उसके विषयमें जैसा ज्ञान होवे, वैसा होने दो; अध्यात्मशास्त्रकी आवश्यकताही क्या है ? हाँ; यदि प्रत्येक मनुष्यका मन या अंतःकरण समान रूपसे शुद्ध हो, तो फिर यह