भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 243

१९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बीजसे इस प्रकृतिमें त्रिगुणोंके द्वारा अनेक मूर्तियाँ उत्पन्न होती है। अन्य स्थानोंमें ऐसा वर्णन है, कि ब्रह्मदेवसे आरंभमें दक्षप्रभृति सात मानसपुत्र अथवा सात मनु उत्पन्न हुए; और उन्होंने आगे सब चर-अचर सृष्टिका निर्माण किया। (मभा. आ. ६५-६७; मभा. शां. २०. ७; मनु. १. ३४-६३); और इसीका गीतामेंभी एक- बार उल्लेख किया गया है (गीता. १०. ६)। परंतु वेदान्तग्रंथ यह प्रतिपादन करते हैं, कि इन सब भिन्न भिन्न वर्णनोंका, ब्रह्मदेवकोही प्रकृति मान लेनेसे, उपर्युक्त तात्त्विक सृष्ट्युत्पत्तिक्रमसे मेल हो जाता है; और यही न्याय अन्य स्थानोंमेंभी उप- योगी हो सकता है। उदाहरणार्थ, शैव अथवा पाशुपत दर्शनोंमे शिवको निमित्तकारण मानकर यह कहते हैं, कि उसीसे कार्यकारणादि पाँच पदार्थ उत्पन्न हुए। और नारा- यणीय या भागवतधर्ममें वासुदेवको प्रधान मानकर यह वर्णन किया है, कि पहले वासुदेवसे संकर्षण (जीव) उत्पन्न हुआ, संकर्षणसे प्रद्युम्न (मन), और प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध (अहंकार) उत्पन्न हुआ। परंतु वेदान्तशास्त्रके अनुसार जीव प्रत्येक समय नये सिरेसे उत्पन्न नहीं होता। वह नित्य और सनातन परमेश्वरका नित्य-अतएव अनादि-अंश है। इसलिये वेदान्तसूत्रके दूसरे अध्यायके दूसरे पाद (वे. सू. २. २. ४२-४५) में भागवतधर्ममें वर्णित जीवके उत्पत्तिविषयक उपर्युक्त मतका खंडन करके कहा है, कि वह वेदविरुद्ध अतएव त्याज्य है। गीता (गीता. १३. ४; १५.७) में वेदान्तसूत्रोंके इसी सिद्धान्तका अनुवाद किया गया है। इसी प्रकार सांख्यवादी प्रकृति और पुरुष दोनोंको स्वतंत्र तत्त्व मानते हैं; परंतु इस द्वैतको स्वीकार न कर वेदान्ति- योंने यह सिद्धान्त किया है, कि प्रकृति और पुरुष-दोनों तत्त्व एकही नित्य और निर्गुण परमात्माकी विभूतियाँ हैं। यही सिद्धान्त भगवद्गीताकोभी ग्राह्य है (गीता ९. १०)। परंतु इसका विस्तारपूर्वक विवेचन अगले प्रकरणमें किया जायगा। यहाँपर केवल इतनाही बतलाया है, कि भागवत या नारायणीय धर्ममें वर्णित वासु- देवभक्तिका और प्रवृत्तिप्रधान धर्मका तत्त्व यद्यपि भगवद्गीताको मान्य है, तथापि गीता भागवतधर्मकी इस कल्पनासे सहमत नहीं है, कि पहले वासुदेवसे संकर्षण या जीव उत्पन्न हुआ; और उससे आगे प्रद्युम्न (मन) तथा प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका (अहंकार) का प्रादुर्भाव हुआ। संकर्षण, प्रद्युम्न या अनिरुद्धका नाम तक गीतामें नहीं पाया जाता। पांचरात्रमें बतलाये हुए भागवतधर्ममें और गीता-प्रतिपादित भागवतधर्ममें यही महत्त्वका भेद है। इस बातका उल्लेख यहाँ जान-बूझकर किया गया है; क्योंकि केवल इतनेहीसे-कि "भगवद्गीतामें भागवतधर्म बतलाया गया है" -कोई यह न समझ लें, कि सृष्ट्युत्पत्ति-क्रम-विषयक अथवा जीव-परमेश्वर-स्वरूप- विषयक भागवत आदि भक्तिसंप्रदायके मतभी गीताको मान्य हैं। अब इस बातका विचार किया जायगा, कि सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृति और पुरुषकेभी परे सब व्यक्ता- व्यक्त तथा क्षराक्षर जगतके मूलमें कोई और तत्त्व है या नहीं। इसीको अध्यात्म या वेदान्त कहते हैं।