श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वकी रचना और संहार १९५ भगवद्गीता ( १. १८ ) और ( ९. ७ ) में कहा है, कि जब ब्रह्मदेवके इस दिन अर्थात् कल्पका आरंभ होता है तब :- अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ “अव्यक्तसे सृष्टिके सब व्यक्त पदार्थ उत्पन्न होने लगते हैं; और जब ब्रह्मदेवकी रात्रि आरंभ होती है, तब वे सब व्यक्त पदार्थ पुनश्च अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं।” स्मृतिग्रंथ और महाभारतमेंभी यही बतलाया है। इसके अतिरिक्त पुराणादिकोंमें अन्य प्रलयोंकाभी वर्णन है; परंतु इन प्रलयोंमें सूर्य-चंद्र आदि सारी सृष्टिका नाश नहीं हो जाता; इसलिये ब्रह्मांडकी उत्पत्ति और संहारका विवेचन करते समय इनका विचार नहीं किया जाता। कल्प ब्रह्मदेवका एक दिन अथवा रात्रि है; और ऐसे ३६० दिन तथा ३६० रात्रियाँ मिलकर ब्रह्मदेवका एक वर्ष होता है। इसीसे पुराणादिकों (विष्णुपुराण १. ३) में यह वर्णन पाया जाता है, कि ब्रह्मदेवकी आयु उनके सौ वर्षकी है। उसमेंसे आधी बीत गई। शेष आयुके अर्थात् इक्यावनवें वर्षके पहले दिनका अथवा श्वेतवाराह नामक कल्पका अब आरंभ हुआ है; और इस कल्पके चौदह मन्वन्तरोंमेंसे छः मन्वन्तर बीत चुके हैं, तथा सातवें (अर्थात् वैवस्वत) मन्वन्तरके ७१ महायुगोंमेंसे २७ महायुग पूरे हो गये हैं। एवं अब २८वें महायुगके कलियुगका प्रथम चरण अर्थात् चतुर्थ भाग जारी है। संवत् १९५६ (शक १८२१) में इस कलियुगके ठीक ५००० वर्ष बीत चुके थे। इस प्रकार गणित करनेसे मालूम होगा, कि इस कलियुगका प्रलय होनेके लिये संवत् १९५६में मनुष्यके ४ लाख २७ हजार वर्ष शेष थे; फिर वर्तमान मन्वन्तरके अंतमें अथवा वर्तमान कल्पके अंतमें होनेवाले महाप्रलयकी बातही क्या ! मानवी चार अब्ज बत्तीस करोड वर्षका जो ब्रह्मदेवका दिन इस समय जारी है, उसका पूरा मध्याह्नभी नही हुआ। अर्थात् सात मन्वंतरभी अबतक नहीं बीते हैं। सृष्टिकी रचना और संहारका जो अबतक विवेचन किया गया, वह वेदान्तके और परब्रह्मको छोड़ देनेसे सांख्यशास्त्रके - तत्त्वज्ञानके आधारपर किया गया है। इसलिये सृष्टिके उत्पत्तिक्रमकी इसी परंपराको हमारे शास्त्रकार सदैव प्रमाण मानते हैं; और यही क्रम भगवद्गीतामेंभी दिया हुआ है। इस प्रकरणके आरंभहीमें बतला दिया गया है, कि सृष्ट्युत्पत्तिक्रमके बारेमें कुछ भिन्न भिन्न विचार पाये जाते हैं। जैसे श्रुतिस्मृतिपुराणोंमें कही कहीं कहा है, कि प्रथम ब्रह्मदेव या हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुआ; अथवा पहले पानी उत्पन्न हुआ और उसमें परमेश्वरके बीजसे एक सुवर्णमय अंडा निर्मित हुआ। परंतु इन सब विचारोंको गौण तथा उपलक्षणात्मक समझकर जब उनकी उपपत्ति बतलानेका समय आता है तब यही कहा जाता है, कि हिरण्यगर्भ अथवा ब्रह्मदेवही प्रकृति है। भगवद्गीता (गीता १४. ३) में त्रिगुणात्मक प्रकृतिहीको ब्रह्म कहा है - “मम योनिर्महत् ब्रह्म।” और भगवानने यहभी कहा है, कि हमारे