भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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१९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

और हमारा दक्षिणायन उनकी रात है। क्योंकि, स्मृतिग्रंथोंमें और ज्योतिषशास्त्रकी संहिता (सूर्यसिद्धान्त १. ३३; १२. ३५, ६७) मेंभी यही वर्णन है, कि देवता मेरुपर्वतपर अर्थात् उत्तरध्रुवमें रहते हैं। अर्थात् दो अयनोंका हमारा एक वर्ष देवताओंके एक दिन-रातके बराबर है; और हमारे ३६० वर्ष देवताओंके ३६० दिन-रातें अथवा एक वर्षके बराबर हैं। कृत, त्रेता, द्वापर कलि, हमारे चार युग हैं। युगोंकी कालगणना इस प्रकार है- कृतयुगमें चार हज़ार वर्ष, त्रेतायुगमें तीन हज़ार, द्वापरमें दोन हज़ार और कलिमें एक हज़ार वर्ष। परंतु एक युग समाप्त होतेही दूसरा युग एकदम आरंभ नहीं हो जाता। बीचमें, दो युगोंके संधिकालमें कुछ वर्ष बीत जाते हैं। इस प्रकार कृतयुगके आदि और अंतमें, प्रत्येक ओर चार सौ वर्षका, त्रेतायुगके आगे और पीछे प्रत्येक ओर तीन सौ वर्षका, द्वापरके पहले और बाद प्रत्येक ओर दो सौ वर्षका, और कलियुगके पूर्व तथा अनंतर प्रत्येक ओर सौ वर्षका संधिकाल होता है। सब मिलाकर चारों युगोंका आदि-अंत-सहित संधिकाल दो हज़ार वर्षका होता है। ये दो हज़ार वर्ष पहले बतलाये हुए सांख्यमतानुसार चारों युगोंके दस हज़ार वर्ष मिलाकर कुल बारह हज़ार वर्ष होते हैं। ये बारह हज़ार वर्ष मनुष्योंके है या देवताओंके ? यदि मनुष्योंके माने जायें, तो कलियुगका आरंभ हुए पाँच हज़ारसे अधिक वर्ष बीत चुकनेके कारण यह कहना पड़ेगा, कि हज़ार मानवी वर्षोंका कलियुग पूरा हो चुका है। और उसके बाद फिरसे आनेवाला कृतयुगभी समाप्त हो गया; और हमने अब त्रेतायुगमें प्रवेश किया है ! यह विरोध मिटानेके लिये पुराणोंमें निश्चित किया है, कि ये बारह हज़ार वर्ष देवताओंके हैं। देवताओंके बारह हज़ार वर्ष, मनुष्योंके ३६० × १२ ००० = ४३२०,००० (पैंतालीस लाख बीस हज़ार) वर्ष होते हैं; वर्तमान पंचांगोंका युगपरिमाण इसी पद्धतिसे निश्चित किया जाता है। देवताओंके बारह हज़ार वर्ष मिलकर मनुष्योंका एक महायुग या देवताओंका युग होता है। देवताओंके इकहत्तर युगोंको मन्वंतर कहते हैं; और ऐसे मन्वंतर चौदह हैं। परंतु पहले मन्वंतरके आरंभ तथा अंतमें, और आगे चलकर प्रत्येक मन्वंतरके आखिरमें दोनों ओर कृतयुगकी बराबरीका एक एक ऐसे १५ संधिकाल जाते हैं। ये पंद्रह संधिकाल और चौदह मन्वन्तर मिलकर देवताओंके एक हज़ार युग अथवा ब्रह्मदेवका एक दिन होता है (सूर्यसिद्धान्त १. १९-२०); और मनुस्मृति तथा महाभारतमें लिखा है, कि ऐसेही हज़ार युग मिलकर ब्रह्मदेवकी रात होती है (मनु. १. ६९-७३ और ७९; मभा. शां. २३१. १८-३१ और यास्कका निरुक्त १४. ९)। इस गणनाके अनुसार ब्रह्मदेवका एक दिन मनुष्योंके चार अब्ज बत्तीस करोड़ वर्षके बराबर होता है; और इसीका नाम है कल्प। *

  • ज्योतिःशास्त्रके आधारपर युगादि गणनाका विचार स्वर्गीय शंकर बाळकृष्ण दीक्षितने अपने 'भारतीय ज्योतिःशास्त्र' नामक (मराठी) ग्रंथमें किया है, पृ. १०३-१०५; १९३ इत्यादि देखो।