श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वकी रचना और संहार १९३ भेद इन भावोंकी समुच्चयताकेही परिणाम हैं (सां. का. ४३-५५) । इन सब भावोंमें सात्त्विक गुणका उत्कर्ष कारण होनेसे जब मनुष्यको ज्ञान और वैराग्यकी प्राप्ति होती है, और उसके कारण प्रकृति और पुरुषकी भिन्नता समझमें आने लगती है, तब पुरुष अपने मूलस्वरूप अर्थात् कैवल्यपदको पहुँच जाता है; और तबतक लिंगशरीर छूट जाता है। एव मनुष्यके दुःखोंका पूर्णतया निवारण हो जाता है। परंतु प्रकृति और पुरुषकी भिन्नताका ज्ञान न होते हुए, यदि केवल सात्त्विक गुणहीका उत्कर्ष हो, तो लिंगशरीर देवयोनिमें अर्थात् स्वर्गमें जन्म लेता है; रजोगुणकी प्रबलता हो, तो मनुष्ययोनिमें अर्थात् पृथ्वीपर पैदा होता है; और तमोगुणकी अधिकता हो जानेसे उसे तिर्यग्योनिमें प्रवेश करना पड़ता है (गीता १४. १८) “गुणा गुणेषु जायन्ते” इस तत्त्वकेही आधारपर सांख्यशास्त्रमें वर्णन किया गया है, कि मानवयोनिमें जन्म होनेके बाद रेत-बिंदुमें क्रमानुसार कलल, बुद्बुद, मांस, पेशी और भिन्न भिन्न स्थूल इंद्रियाँ कैसे बनती जाती हैं। (सां. का. ४३; मभा. शां. ३२०) गर्भोपनिषदका वर्णन प्रायः सांख्यशास्त्रके उक्त वर्णनके समानही है। उपर्युक्त विवेचनसे यह बात मालूम हो जायगी. कि सांख्यशास्त्रमें 'भाव' शब्दका जो पारिभाषिक अर्थ बतलाया गया है, वह यद्यपि वेदान्त-ग्रंथोंमें विवक्षित नहीं है, तथापि भगवद्गीतामें (गीता १०. ४, ५; ७. १२) “बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः” इत्यादि गुणोंको (इसके आगेके श्लोकमें) जो 'भाव' नाम दिया है, वह प्रायः सांख्यशास्त्रकी परिभाषाको सोचकरही दिया गया होगा । इस प्रकार सांख्यशास्त्रके मूल अव्यक्त प्रकृतिसे अथवा वेदान्तके अनुसार मूल सद्ब्रह्मी परब्रह्ममे सृष्टिके सब सजीव और निर्जीव व्यक्त पदार्थ क्रमशः उत्पन्न हुए । और जब सृष्टिके संहारका समय आ पहुँचता है, तब सृष्टिरचनाका जो गुणपरिणामक्रम ऊपर बतलाया गया है, ठीक इसके विरुद्ध क्रमसे सब व्यक्त पदार्थ अव्यक्त प्रकृतिमें अथवा मूल ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। यह सिद्धान्त सांख्य और वेदान्त दोनों शास्त्रोंको मान्य है (वे. सू २. ३. १४; मभा. शां. २३२) । उदाहर- णार्थ, पंचमहाभूतोंमेंसे पृथ्वीका लय पानीमे, पानीका अग्निमें, अग्निका वायुमें, वायुका आकाशमें, आकाशका तन्मात्राओंमें, तन्मात्राओंका अहंकारमें, अहंकारका बुद्धिमें, और बुद्धि या महान् का लय प्रकृतिमें हो जाता है; तथा वेदान्तके अनुसार प्रकृतिका लय मूल ब्रह्ममें हो जाता है। सांख्यकारिकामें किमीभी स्थानपर यह नही बतलाया गया है, कि सृष्टिकी उत्पत्ति या रचना हो जानेपर उसका लय या संहार होनेतक बीचमें कितना समय बीत जाता है। तथापि, ऐसा प्रतीत होता है कि मनु- संहिता (१. ६६-७३), भगवद्गीता (८. १७) तथा महाभारत (शा. २३१) में णित कालगणना सांख्योंकोभी मान्य है। हमारा उत्तरायण देवताओंका दिन है व गी. र. १३