श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहीमें श्वेतकेतुके पिताने उससे स्पष्ट कह दिया है, कि "अरे, इस जगत्के आरंभमें 'एकमेवाद्वितीय सत्' के अतिरिक्त - अर्थात् जहाँ तहाँ रूप सब एक जगह और नित्य परब्रह्मके अतिरिक्त और कुछभी नहीं था। जो असत् (अर्थात्-हैही नहीं) उससे सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है? अतएव, आदिमें सर्वत्र सत्ही व्याप्त था। इसके बाद उसे अनेक अर्थात् विविध रूप होनेकी इच्छा हुई। और उससे क्रमशः सूक्ष्म तेज (अग्नि), आप (पानी) और अन्न (पृथ्वी) की उत्पत्ति हुई। पश्चात् इन तीन तत्त्वोंमेंही जीवरूपसे परब्रह्मका प्रवेश होनेपर उनके त्रिवृत्करणसे जगतकी अनेक नामरूपात्मक वस्तुएँ निर्मित हुईं। स्थूल अग्नि, सूर्य या विद्युल्लताकी ज्योतिमें, जो लाल (लोहित) रंग है, वह सूक्ष्म तेजोरूपी मूलतत्त्वका परिणाम है, जो सफ़ेद (शुक्ल) रंग है, वह सूक्ष्म आप-तत्त्वका परिणाम है; और जो काला (कृष्ण) रंग है, वह सूक्ष्म पृथ्वी-तत्त्वका परिणाम है। इसी प्रकार मनुष्य जिस अन्नका सेवन करता है, उसमेंभी सूक्ष्म तेज, सूक्ष्म आप और सूक्ष्म अन्न (पृथ्वी) येही तीन तत्त्व होते हैं। जैसे दहीको मथनेसे मक्खन ऊपर आ जाता है, वैसे ही उक्त तीन सूक्ष्म तत्त्वोंसे बना हुआ अन्न जब पेटमें जाता है, तब उसमेंसे तेज-तत्त्वके कारण मनुष्यके शरीरमें स्थूल, मध्यम और सूक्ष्म परिणाम - जिन्हें क्रमशः अस्थि, मज्जा, और वाणी कहते हैं - उत्पन्न हुआ करते हैं। इसी प्रकार आप अर्थात् जलतत्त्वसे मूत्र, रक्त और प्राण; तथा अन्न अर्थात् पृथ्वी-तत्त्वसे पुरीष, माँस और मन ये तीन द्रव्य निर्मित होते हैं, (छां. ६. २-६। छांदोग्योपनिषदकी यही पद्धति वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २. ४. २०) भी कही गई है, कि मूल महाभूतोंकी संख्या पाँच नहीं, केवल तीनही है; और उनके त्रिवृत्करणसे सब दृश्य पदार्थोंकी उत्पत्तिभी मालूम की जा सकती है। परंतु बादरायणाचार्य तो पंचीकरणका नाम तक नहीं लेते। तथापि तैत्तिरीय (२. १), प्रश्न (४. ८), बृहदारण्यक (४. ४. ५) आदि अन्य उप- निषदोंमें, और विशेषतः श्वेताश्वतर (२. १२), वेदान्तसूत्र (२२. ३. १-१४) तथा गीता (७. ४; १३. ५) मेंभी तीनके बदले पाँच महाभूतोंका वर्णन है। गर्भोपनिषदके आरंभहीमें कहा है, कि मनुष्य देह 'पंचात्मक' है; और महाभारत तथा पुराणोंमें तो पंचीकरणका वर्णन स्पष्ट तया किया गया है (महा. शां. १८४- १८६)। इससे यही सिद्ध होता है, कि यद्यपि त्रिवृत्करण प्राचीन है, तथापि जड़ महाभूतोंकी संख्या तीनके बदले पाँच मानी जाने लगी, तब त्रिवृत्करणके उदा- हरणहीसे पंचीकरणकी कल्पनाका प्रादुर्भाव हुआ; और त्रिवृत्करण पीछे रह गया। एवं अंतमें पंचीकरणकी कल्पना सब वेदान्तियोंको ग्राह्य हो गई। आगे चल कर इसी पंचीकरण शब्दके अर्थमें यह बातभी शामिल हो गई, कि मनुष्यका शरीर केवल पंचमहाभूतोंसे ही नहीं बना है; किंतु उन पंचमहाभूतोंमेंसे हर एक पाँच प्रकारसे शरीरमें विभाजितभी हो गया है। उदाहरणार्थ, त्वक्, माँस, अस्थि, मज्जा और स्नायु ये पाँच विभाग अन्नमय पृथ्वीतत्त्वके हैं,. इत्यादि (महा. शां. १८४.