श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र हुए हैं। (दा. १३. ३. १०-१५) परंतु पंचीकरणसे केवल जड़ पदार्थ अथवा जड़ शरीरही उत्पन्न होते हैं। ध्यान रहे, कि जब इस जड़ देहका संयोग प्रथम सूक्ष्म इंद्रियोंसे और फिर आत्मासे अर्थात् पुरुषसे होता है, तभी इस जड़ देहसे सचेतन प्राणी हो सकता है। यहाँ यहभी बतला देना चाहिये, कि उत्तर वेदान्त-ग्रंथोंमें वर्णित यह पंचीकरण प्राचीन उपनिषदोंमें नहीं है। छांदोग्योपनिषदमें पाँच तन्मात्राएँ या पाँच महाभूत नहीं माने गये हैं, किंतु कहा है, कि "तेज, आप (पानी) और अन्न (पृथ्वी)" इन्हीं तीन सूक्ष्म मूलतत्त्वोंके मिश्रणसे अर्थात् 'त्रिवृत्करण'से सब विविध सृष्टि बनी है। और, श्वेताश्वतरोपनिषद्में कहा है कि, "अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां स्वरूपाः" (श्वेता. ४. ५) अर्थात् लाल (तेजोरूप), सफ़ेद (जलरूप) और काले (पृथ्वीरूप) रंगोंकी (अर्थात् तीन तत्त्वोंकी) एक अजा (बकरी) से नामरूपात्मक प्रजा (सृष्टि) उत्पन्न हुई। छांदो- ग्योपनिषद्के छठे अध्यायमें श्वेतकेतु और उसके पिताका संवाद है। संवादके आरंभ- तत्त्वके अनुसार पश्चिमी आधिभौतिकशास्त्री यह मानते हैं, कि सृष्टिके आरंभमें उपस्थित एक छोटेसे सजीव सूक्ष्म गोल जंतुसे मनुष्यप्राणी उत्पन्न हुआ। इस कल्पनासे यह बात स्पष्ट है, कि सूक्ष्म गोल जंतुका स्थूल गोल जंतु बननेमें, स्थूल जंतुका पुनश्च छोटा छोटा कीड़ा होनेमें, छोटे कीड़ेके बाद उसका अन्य प्राणी होनेमें, प्रत्येक योनि अर्थात् जातिकी अनेक पीढ़ियाँ बीत गई होंगी। इससे एक आंग्ल जीवशास्त्रज्ञने गणितके द्वारा सिद्ध किया है, कि पानीमें रहनेवाली छोटी छोटी मछलियोंके गुण- धर्मोंका विकास होते होते उन्हींको अंतमें मनुष्यस्वरूप प्राप्त होनेमें, भिन्न भिन्न जाति- योंकी लगभग ५३ लाख ७५ हज़ार पीढ़ियाँ बीत चुकी हों; और संभव है, कि इन पीढ़ियोंकी संख्या कदाचित इसमे दस गुणाभी हो। ये हुई पानीमें रहनेवाले जल- चरोंसे लेकर मनुष्यतककी योनियाँ। अब यदि इनमेंही छोटे जलचरोंसे पहलेके सूक्ष्म जंतुओंका समावेश कर दिया जाय तो न मालूम और कितनी लाख पीढ़ियोंकी कल्पना करनी होगी। इससे मालूम हो जायगा, कि हमारे पुराणोंमें वर्णित चौरासी लाख योनियोंकी कल्पना की अपेक्षा आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंके पुराणोंमें वर्णित पीढ़ी- यांकी कल्पना कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। कल्पनासंबंधी यह न्यायकाल (समय) कोभी उपयुक्त हो सकता है। भूगर्भगतजीव-शास्त्रज्ञोंका कथन है, कि इस बातका स्थूल दृष्टिसे निश्चय नहीं किया जा सकता कि, सजीवसृष्टिके सूक्ष्म जंतु इस पृथ्वीपर कब उत्पन्न हुए। और सूक्ष्म जलचरोंकी उत्पत्ति तो कई करोड़ वर्षोंके पहले हुई है। इस विषयका विवेचन The Last Link by Ernst Haeckel, with notes, etc. by Dr. H. Gadow (1898) नामक पुस्तकमें किया गया है। डॉक्टर गेडोने इस पुस्तकमें जो दो-तीन उपयोगी परिशिष्ट जोड़ें हैं, उनसेही उपर्युक्त बातें ली गई हैं। हमारे पुराणोंमें चौरासी योनियोंकी गिनती इस प्रकार की गई है- ९ लाख जलचर, १० लाख पक्षी, ११ लाख कृमि, २० लाख पशु, ३० लाख स्थावर और ४ लाख मनुष्य (दासबोध २०. ६)।