श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वकी रचना और संहार १८५ अर्थात् पहले परमात्मासे (मूलजड़ प्रकृतिसे नहीं; जैसा कि सांख्यवादियोंका कथन है) आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे पानी और फिर पानीसे पृथ्वी उत्पन्न हुई है। तैत्तिरीयोपनिषद्में यह नहीं बतलाया गया, कि इस क्रमका कारण क्या है। परंतु प्रतीत होता है, कि उत्तर-वेदान्तग्रंथोंमें पंचमहाभूतोंके उत्पत्तिक्रमके कारणोंका विचार सांख्यशास्त्रोक्त गुणपरिणामके तत्त्वपरही किया गया है। इन उत्तर-वेदान्तियोंका यह कथन है, कि "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" इस न्यायसे पहले एकही गुणका पदार्थ उत्पन्न हुआ। उससे दो गुणोंके और फिर तीन गुणोंके पदार्थ उत्पन्न हुए - इसी प्रकार वृद्धि होती गई। पंचमहाभूतोंमेंसे आकाशका केवल शब्दही एक गुण मुख्य है, इसलिये पहले आकाश उत्पन्न हुआ। इसके बाद वायुकी उत्पत्ति हुई, क्योंकि उसमें शब्द और स्पर्श दो गुण है। जब वायु जोरसे चलती है, तब उसकी आवाज सुन पड़ती है; और हमारी स्पर्शेंद्रियकोभी उसका ज्ञान होता है। वायुके बाद अग्निकी उत्पत्ति होती है। क्योंकि शब्द और स्पर्शके अतिरिक्त उसमें तीसरा गुण रूप है। इन तीनों गुणोंके साथही साथ पानीमें चौथा गुण रुचि या रस होता है। इसलिये उसका प्रादुर्भाव अग्निसेही होना चाहिये। और अंतमें, इन चारों गुणोंकी अपेक्षा पृथ्वीमें 'गंध' नामक विशेष गुण होनेसे यह सिद्धान्त किया गया है, कि पानीसे बादमें पृथ्वी उत्पन्न हुई है। यास्काचार्यका यही सिद्धान्त है (निरुक्त १४.४)। तैत्तिरीयोपनिषद्में आगे चल कर कहा गया है, कि उक्त क्रमसे स्थूल पंचमहाभूतोंकी उत्पत्ति हो चुकनेपर फिर - "पृथिव्या ओषधयः। ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः।" पृथ्वीसे वनस्पति, वन- स्पतिसे अन्न और अन्नसे पुरुष उत्पन्न हुआ (तै. २.१)। यह सृष्टि पंचमहा- भूतोंके मिश्रणसे बनती है, इसलिये इस मिश्रणक्रियाको वेदान्तग्रंथोंमें 'पंचीकरण' कहते हैं। पंचीकरणका अर्थ "पंचमहाभूतोंमेंसे प्रत्येकका न्यूनाधिक भाग ले कर उन सबके मिश्रणसे किसी नये पदार्थका बनना" है। अतः यह पंचीकरण, स्वभा- वतः अनेक प्रकारका सकता है। श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने अपने 'दासबोध'के नौवें तथा ग्यारहवें दशकमें जो वर्णन किया है, वहभी इसी बातको सिद्ध करता है। देखिये : "काला और सफ़ेद मिलानेसे नीला बनता है, और काला और पीला मिलानेसे हरा बनता है" (दा. ९.६.४०)। पृथ्वीमें अनंत कोटि बीजोंकी जातियां होती हैं। पृथ्वी और पानीका मेल होनेपर उन बीजोंसे अंकुर निकलते हैं। अनेक प्रकारकी बेलें होती हैं, पत्र-पुष्प होते हैं, और अनेक प्रकारके स्वादिष्ट फल होते हैं।... अण्डज, जरायुज, स्वेदज, उद्भिज, सबका बीज पृथ्वी और पानी है। यही सृष्टिरचनाका अद्भुत चमत्कार है। इस प्रकार चार खानियां, चार वाणियां, चौरासी लाख* जीवयोनियां, तीन लोक, पिंड, ब्रह्मांड सब निर्मित
- यह बात स्पष्ट है, कि चौरासी लाख योनियोंकी कल्पना पौराणिक है, और वह अंदाज़से की गई है। तथापि, वह निरी निराधारभी नहीं है। उत्क्रांति-