भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 226

अर्थात् "प्राणियोंके आत्माको जब सुननेकी भावना हुई, तब कान उत्पन्न हुआ; रूप पहचाननेकी इच्छासे आँख; सूंघनेकी इच्छासे नाक उत्पन्न हुई।" परंतु सांख्योंका यह कथन है, कि यद्यपि त्वचाका प्रादुर्भाव पहले होता हो, तथापि मूल प्रकृतिमेंही यदि भिन्न भिन्न इंद्रियोंके उत्पन्न होनेकी शक्तिका न हो, तो सजीव सृष्टिके अत्यंत छोटे कीड़ोंकी त्वचापर सूर्यप्रकाशका चाहे जितना आघात या संयोग होता रहे, तोभी उन्हें आँखें - और वेभी शरीरके एक विशिष्ट भागहीमें - कैसे प्राप्त हो सकती है ? डार्विनका सिद्धान्त सिर्फ यह आशय प्रकट करता है, कि दो प्राणियों - एक चक्षुवाला और दूसरा चक्षुरहितके - निर्मित होनेपर, इस जड़ सृष्टिके कलहमें चक्षुवाला अधिक समयतक टिक सकता है; और दूसरा शीघ्रही नष्ट हो जाता है। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक सृष्टिशास्त्रज्ञ इस बातका मूल कारण नहीं बतला सकते, कि नेत्र आदि भिन्न भिन्न इंद्रियोंकी उत्पत्ति पहले हुईही क्यों। सांख्योंका मत यह है, कि ये सब इंद्रियाँ किसी एकही मूल इंद्रियसे क्रमशः उत्पन्न नहीं हुईं, किंतु जब अहंकारके कारण प्रकृतिमें विविधरूपता उत्पन्न होने लगती है, तब पहले उस अहंकारसे पाँच सूक्ष्म कर्मेंद्रियाँ, पाँच सूक्ष्म ज्ञानेंद्रियाँ और मन, इन सबको मिलाकर ग्यारह भिन्न भिन्न गुण (शक्ति) सबके सब एकसाथ (युगपत्) स्वतंत्र होकर मूलप्रकृतिमेंही उत्पन्न होते हैं; और फिर इसके बाद स्थूल सेंद्रिय सृष्टि उत्पन्न हुआ करती है। इन ग्यारह इंद्रियोंमेंसे मनके बारेमें पहलेही छठे प्रकरणमें बतला दिया गया है, कि वह ज्ञानेंद्रियोंके साथ संकल्पविकल्पात्मक होता है; अर्थात् ज्ञानेंद्रियोंसे ग्रहण किये गये संस्कारोंकी व्यवस्था करके वह उन्हें बुद्धिके सामने निर्णयार्थ उपस्थित करता है; और कर्मेंद्रियोंके साथ वह व्याकरणात्मक होता है; अर्थात् उसे बुद्धिके निर्णयको कर्मेंद्रियोंके द्वारा अमलमें लाना पड़ता है। इस प्रकार वह उभयविध, अर्थात् इंद्रियभेदके अनुसार भिन्न भिन्न प्रकारके काम करनेवाला होता है। उपनिषदोंमें इंद्रियोंकोही 'प्राण' कहा है; और सांख्योंके मतानुसार उपनिषत्कारोँकाभी यही मत है, कि ये प्राण पंचमहाभूतात्मक नहीं हैं; किंतु परमात्मासे पृथक् उत्पन्न हुए हैं (मुंड. २. १. ३) इन प्राणोंकी - अर्थात् इंद्रियोंकी - संख्या उपनिषदोंमें कहीं दस, ग्यारह, बारह और कहीं तेरह बतलाई गई है। परंतु वेदान्तसूत्रोंके आधारसे श्रीशंकराचार्यने निश्चित किया है, कि उपनिषदोंके सब वाक्योंकी एकरूपता करनेपर इंद्रियोंकी संख्या ग्यारहही सिद्ध होती है (वे. सू. शां. २. ४. ५. ६)। और गीतामें तो इस बातका स्पष्ट उल्लेख किया गया है, कि "इंद्रियाणि दशकं च" (गीता १३. ५)

  • अर्थात् इंद्रियाँ 'दस और एक' अर्थात् ग्यारह हैं। अब इस विषयपर सांख्य और वेदान्त दोनोंमें कोई मतभेद नहीं रहा। सांख्योंके निश्चित किये हुए मतका सारांश यह है - सात्त्विक अहंकारसे सेंद्रिय सृष्टिकी मूलभूत ग्यारह इंद्रियशक्तियाँ (गुण) उत्पन्न होती हैं; और तामस अहंकारसे निरिंद्रिय सृष्टिके मूलभूत पाँच तन्मात्रद्रव्य निर्मित होते हैं। इसके बाद