श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पंचतन्मात्रद्रव्योंसे क्रमशः स्थूल पंचमहाभूत ( जिन्हें 'विशेष' भी कहते हैं ) और स्थूल निरिंद्रिय पदार्थ बनने लगते हैं; तथा, यथासंभव इन पदार्थोंका संयोग ग्यारह सूक्ष्म इंद्रियोंके साथ हो जानेपर सेंद्रिय सृष्टि बन जाती है ! सांख्यमतानुसार प्रकृतिसे प्रादुर्भूत होनेवाले तत्त्वोंका क्रम, जिसका वर्णन अबतक किया गया है, निम्न लिखित वंशवृक्षसे अधिक स्पष्ट हो जायगा :- ब्रह्मांडका वंशवृक्ष पुरुष $\rightarrow$ (दोनों स्वयंभू और अनादि) $\leftarrow$ प्रकृति (अव्यक्त और सूक्ष्म) (निर्गुण; पर्यायशब्द :- ज्ञ द्रष्टा, इ. ) । (सत्त्व-रज-तमोगुणी; पर्यायशब्दः-प्रधान, अव्यक्त, माया, प्रसव-धर्मिणी आदि) | महान् अथवा बुद्धि ( व्यक्त और सूक्ष्म ) (पर्यायशब्द :- आसुरी, मति, ज्ञान ख्याति इ.) | अहंकार (व्यक्त और सूक्ष्म) (पर्यायशब्द :- अभिमान, तैजस आदि ) |
(सात्त्विक सृष्टि अर्थात् व्यक्त और सूक्ष्म इंद्रियाँ) (तामस अर्थात् निरिंद्रिय सृष्टि | | पाँच बुद्धीन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन, पंचतन्मात्राएँ (सूक्ष्म) विशेष या पंचमहाभूत (स्थूल) [दाहिनी ओर: ] अठारह तत्त्वोंका लिंगशरीर (सूक्ष्म) स्थूल पंचमहाभूत और पुरुषको मिलाकर कुल तत्त्वोंकी संख्या पचीस है। इनमेंसे महान् अथवा बुद्धिके बादके तेईस गुण मूलप्रकृतिके विकार हैं। किंतु उनमेंभी यह भेद है, कि सूक्ष्मतन्मात्राएँ और पाँच स्थूल महाभूत द्रव्यात्मक विकार हैं, और बुद्धि, अहंकार तथा इंद्रियाँ केवल शक्तियाँ या गुण हैं। ये तेईस तत्त्व व्यक्त हैं तो मूल प्रकृति अव्यक्त है। सांख्योंने इन तेईस तत्त्वोंमेंसे आकाशतत्त्वहीमें दिक् और काल- कोभी संमिलित कर दिया है। वे 'प्राण'को भिन्न तत्त्व नहीं मानते; किंतु जब जब इंद्रियोंके व्यापार आरंभ होने लगते हैं, तब उसीको वे प्राण कहते हैं (सां. का. २९)। परंतु वेदांतियोंको यह मत मान्य नहीं है। उन्होंने प्राणको स्वतंत्र तत्त्व माना है ( वे. सू. २. ४. ९ )। यह पहलेही बतलाया जा चुका है, कि वेदान्ती लोग प्रकृति पुरुषको स्वयंभू और स्वतंत्र नहीं मानते, जैसे कि सांख्यमतानुयायी मानते हैं; किंतु और उनका कथन है, कि ये दोनों ( प्रकृति और पुरुष ) एकही परमेश्वरकी दो विभूतियाँ हैं। सांख्य और वेदान्तके उक्त भेदोंको छोड़कर शेष सृष्ट्युत्पत्ति क्रम दोनों पक्षोंको ग्राह्य है। उदाहरणार्थ, महाभारतकी अनुगीतामें 'ब्रह्मवृक्ष' अथवा