श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 228, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें'ब्रह्मवन'का जो दो बार वर्णन किया गया है ( मभा. अश्व. ३५. २०-२३ और ४७ १२-१५ ) वह सांख्यतत्त्वोंके अनुसारही है :- अव्यक्तबीजप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान् । महाहंकारविटपः इंद्रियान्तरकोटरः ॥ महाभूतविशाखश्च विशेषप्रतिशाखवान् । सदापर्णः सदापुष्पः शुभाशुभफलोदयः । आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः । एवं छित्त्वा च भित्त्वा च तत्त्वज्ञानासिना बुधः ॥ हित्वा संगमयान् पाशान् मृत्युजन्मजरोदयान् । निर्ममो निरहंकारो मुच्यते नात्र संशयः ॥ अर्थात् “ अव्यक्त (प्रकृति) जिसका बीज है, बुद्धि (महान्) जिसका तना या पिड़ है, अहंकार जिसका प्रधान पल्लव है, मन और दस इंद्रियाँ जिसकी अंतर्गत खोख- लियाँ या खोड़दे हैं, ( सूक्ष्म ) महाभूत ( पंचतन्मात्राएँ ) जिसकी बड़ी बड़ी शाखाएँ हैं, और विशेष अर्थात् स्थूल महाभूत जिसकी छोटी छोटी टहनियाँ हैं, इसी प्रकार सदा पत्र, पुष्प और शुभाशुभ फल धारण करनेवाला, समस्त प्राणिमात्रके लिये आधारभूत, यह सनातन बृहद् ब्रह्मवृक्ष है। ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह इसे ज्ञानरूपी तलवारसे काट कर टूक टूक कर डाले; जन्म, जरा और मृत्यु उत्पन्न करनेवाले संगमय पाशोंको नष्ट करे और ममत्वबुद्धि तथा अहंकारका त्याग कर दे; तब वह निःसंशय मुक्त होता है।” संक्षेपमें, यही ब्रह्मवृक्ष प्रकृति अथवा मायाका 'खेल' 'जाला' या 'पसार' है। अत्यंत प्राचीन कालहीसे - ऋग्वेदकालहीसे - इसे 'वृक्ष' कहनेकी रीति पड़ गई है; और उपनिषदोंमेंभी इसको 'सनातन अश्वत्थ- वृक्ष' कहा है ( कठ. ६. १) । परंतु वेदोंमें इसका सिर्फ यही वर्णन किया गया है, कि इस वृक्षका मूल ( परब्रह्म ) ऊपर है; और शाखाएँ ( दृश्य-सृष्टिका फैलाव ) नीचे हैं। इस वैदिक वर्णनको और सांख्योंके तत्त्वोंको मिलाकर गीतामें अश्वत्थ वृक्षका वर्णन किया गया है। इसका स्पष्टीकरण हमने गीताके (गीता १५. १-२) श्लोकोंकी अपनी टीकामें कर दिया है। ऊपर ( वृक्षरूपसे ) बतलाये गये पचीस तत्त्वोंका वर्गीकरण सांख्य और वेदान्ती भिन्न भिन्न रीतिसे किया करते हैं। अतएव यहाँपर उस वर्गीकरणके विषयमें कुछ लिखना चाहिये। सांख्योंका यह कथन है, कि इन पचीस तत्त्वोंके चार वर्ग होते हैं-अर्थात् मूल प्रकृति प्रकृति-विकृति, विकृति और न-प्रकृति न-विकृति (१) प्रकृति- तत्त्व किसी दूसरेसे उत्पन्न नहीं हुआ है; अतएव उसे 'मूल प्रकृति' कहते हैं। मूल प्रकृतिसे आगे बढ़नेपर जब हम दूसरी सीढ़ीपर आते हैं, तब 'महान्' तत्त्वका पता लगता है। यह महान् तत्त्व प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ है; इसलिये वह “प्रकृतिकी विकृति