भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 229

१८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र या विकार" है। और इसके बाद महान् तत्त्वसे अहंकार निकला है; अतएव 'महान्' अहंकारकी प्रकृति अथवा मूल है। इस प्रकार महान् अथवा बुद्धि एक ओरसे अहंकारकी प्रकृति या मूल है और दूसरी ओरसे वह मूलप्रकृतिकी विकृति अथवा विकार है। इसीलिये सांख्योंने उसे 'प्रकृति-विकृति' नामक वर्गमें रखा; और इसी न्यायके अनुसार अहंकार तथा पंचतन्मात्राओंका समावेशभी 'प्रकृति-विकृति' वर्गहीमें किया जाता है। जो तत्त्व अथवा गुण स्वयं दूसरेसे उत्पन्न (विकृति) हो, और आगे वही स्वयं अन्य तत्त्वोंका मूलभूत (प्रकृति) हो जावे, उसे 'प्रकृति-विकृति' कहते हैं। इस वर्गके ये सात तत्त्व हैं :- महान् अहंकार और पंचतन्मात्राएं। (३) परंतु पाँच ज्ञानेंद्रियां, पाँच कर्मेंद्रियाँ, मन और स्थूल पंचमहाभूत, इन सोलह तत्त्वोंसे बादमें और अन्य तत्त्वोंकी उत्पत्ति नहीं हुई। किंतु ये स्वयं दूसरे तत्त्वोंसे प्रादुर्भूत हुए हैं। अतएव इन सोलह तत्त्वोंको 'प्रकृति-विकृति' न कह कर केवल 'विकृति' अथवा विकार कहते हैं। (४) 'पुरुष' न प्रकृति है; और न विकृति। वह स्वतंत्र और उदासीन द्रष्टा है। ईश्वरकृष्णने इस प्रकार वर्गीकरण करके फिर उसका स्पष्टी- करण यों किया है :- मूलप्रकृतिरविकृतिः महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ अर्थात् "यह मूलप्रकृति अविकृति है - अर्थात् किसीकाभी विकार नहीं है; महदादि सात (अर्थात् महत्, अहंकार और पंचतन्मात्राएं) तत्त्व प्रकृति-विकृति हैं; और मनसहित ग्यारह इंद्रियाँ तथा स्थूल पंचमहाभूत मिलकर सोलह तत्त्वोंको केवल विकृति अथवा विकार कहते हैं। पुरुष न प्रकृति है न विकृति" (सां. का. ३)। आगे इन्हीं पचीस तत्त्वोंके और तीन भेद किये गये हैं - अव्यक्त, व्यक्त और ज्ञ। इनमेंसे केवल एक मूलप्रकृतिही अव्यक्त है; प्रकृतिसे उत्पन्न हुए तेईस तत्त्व व्यक्त हैं, और पुरुष 'ज्ञ' है। ये हुए सांख्योंके वर्गीकरणके भेद। पुराण, स्मृति, महाभारत आदि वैदिकमार्गीय ग्रंथोंमें प्रायः इन्हीं पचीस तत्त्वोंका उल्लेख पाया जाता है (मैत्र्यु. ६. १०; मनु. १. १४. १५)। परंतु, उपनिषदोंमें वर्णन किया गया है, कि ये सब तत्त्व परब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं और वहां इनका विशेष विवेचन या वर्गीकरणभी नहीं किया गया है। उपनिषदोंके बाद जो ग्रंथ हुए हैं, उनमें इनका वर्गीकरण किया हुआ दीख पड़ता है; परंतु वह उपर्युक्त सांख्योंके वर्गीकरणसे भिन्न है। कुल तत्त्व पचीस हैं। इनमेंसे सोलह तत्त्व तो सांख्यमतके अनुसारभी विकार अर्थात् दूसरे तत्त्वोंसे उत्पन्न हुए हैं। इस कारण उन्हें प्रकृतिमें अथवा मूलभूत पदार्थोंके वर्गमें संमिलित नहीं कर सकते। अब ये नौ तत्त्व शेष रहे - १ पुरुष, २ प्रकृति, ३-९ महत्, अहंकार, और पाँच तन्मात्राएं। इनमेंसे पुरुष और प्रकृतिको छोड़ शेष सात तत्त्वोंको सांख्योंने प्रकृति-विकृति कहा है। परंतु वेदान्तशास्त्रमें प्रकृतिको स्वतंत्र न मानकर यह सिद्धान्त निश्चित किया है, कि पुरुष और प्रकृति दोनों एकही परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं।