श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वकी रचना और संहार १८३ इस सिद्धान्तको मान लेनेसे, सांख्योंके 'मूल-प्रकृति' और 'प्रकृति-विकृति' भेदोंके लिये स्थानही नहीं रह जाता । क्योंकि प्रकृतिभी परमेश्वरसे उत्पन्न होनेके कारण मूल नहीं कही जा सकती; किंतु वह प्रकृति-विकृतिकेही वर्गमें शामिल हो जाती है । अत- एव सृष्ट्युत्पत्तिका वर्णन करते समय वेदान्ती कहा करते हैं; कि एक परमेश्वरहीसे एक ओर जीव निर्माण हुआ; दूसरी ओर ( महदादि सात प्रकृति-विकृतिसहित ) अष्टधा अर्थात् आठ प्रकारकी प्रकृति निर्मित हुई (मभा. शां. ३०६. २९ और ३१०. १०) । अर्थात् , वेदान्तियोंके मतसे पचीस तत्त्वोंमेंसे सोलह तत्त्वोंको छोड़ शेष नौ तत्त्वोंके केवल दोही वर्ग किये जाते हैं - एक 'जीव' और 'दूसरा' ' अष्टधा प्रकृति' । भगवद्गीतामें वेदान्तियोंका यह वर्गीकरण स्वीकृत किया गया है । परंतु इसमेंभी अंतमें थोड़ासा फ़र्क हो गया है । सांख्यवादी जिसे पुरुष कहते हैं, उसेही गीतामें जीव कहा है; और यह बतलाया है, कि वह (जीव) ईश्वरकी 'परा प्रकृति' अर्थात् श्रेष्ठ स्वरूप है; और सांख्यवादी जिसे मूलप्रकृति कहते हैं, उसेही गीतामें परमेश्वरका 'अपर' अर्थात् कनिष्ठ स्वरूप कहा गया है (गीता ७. ४-५) इस प्रकार पहले दो बड़े वर्ग कर लेनेपर उनमेंसे दूसरे वर्गके अर्थात् कनिष्ठ स्वरूपके जब औरभी भेद या प्रकार बतलाने पड़ते हैं, तब इस कनिष्ठ स्वरूपके अतिरिक्त उससे उपजे हुए शेष तत्त्वों कोभी बतलाना आवश्यक होता है । क्यों कि यह कनिष्ठ स्वरूप (अर्थात् सांख्योंकी मूलप्रकृति) स्वयं अपनाही एक प्रकार या भेद हो नहीं सकता । उदाहरणार्थ, जब यह बतलाना पड़ता है, कि बापके लड़के कितने हैं; तब उन लड़कोंमेंही बापकी गणना नहीं की जा सकती । अतएव परमेश्वरके कनिष्ठ स्वरूपके अन्य भेदोंको बतलाते समय कहना पड़ता है, कि वेदान्तियोंकी अष्टधा प्रकृतिमेंसे मूलप्रकृतिको छोड़ शेष सात तत्त्वही ( अर्थात् महान्, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ ) उस मूलप्रकृतिके भेद या प्रकार हैं । परंतु ऐसा करनेसे कहना पड़ेगा, कि परमेश्वरका कनिष्ठ स्वरूप ( अर्थात् मूल प्रकृति ) सात प्रकारका है; और ऊपर कह आये हैं, कि वेदान्ती तो प्रकृति अष्टधा अर्थात् आठ प्रकारकी मानते हैं । अब इस स्थानपर यह विरोध दीख पड़ता है, कि जिस प्रकृतिको वेदान्ती अष्टधा या आठ प्रकारकी कहें, उसीको गीता सप्तधा या सात प्रकारकी कहे । परंतु गीताकारको अभीष्ट था, कि उक्त विरोध तो दूर हो जावे; और ' अष्टधा प्रकृति 'का वर्णन बना रहे । इसीलिये महान्, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ इन सातोंमेंही आठवें मनतत्त्वको संमिलित करके गीतामें वर्णन किया गया है, कि परमेश्वरका कनिष्ठ स्वरूप अर्थात् मूल प्रकृति अष्टधा है । ( गीता ७.५ ) इनमेंसे केवल मनहीमें दस इंद्रियों और पंचतन्मात्राओंमें पंचमहाभूतोंका समावेश किया गया है । अब यह प्रतीत हो जायगा, कि गीतामें किया गया वर्गीकरण सांख्यों और वेदान्तियोंके वर्गीकरणसे यद्यपि कुछ भिन्न है, तथापि इससे कुल तत्त्वोंकी संख्यामें कुछ न्यूनाधिकता नहीं हो जाती । सब जगह तत्त्व पचीसही