श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'सांख्य' कहा है, वहाँ सांख्यका अर्थ केवल कापिल सांख्यमार्गीही नहीं है; वरन् उसमें, आत्म-अनात्म-विचारसे सब कर्मोंका संन्यास करके ब्रह्मज्ञानहीमें निमग्न रहनेवाले वेदान्तियोंकाभी समावेश किया जाता है। शब्दशास्त्रज्ञोंका कथन है, कि 'सांख्य' शब्द 'संख्या' धातुसे बना है। इसलिये इसका पहला अर्थ 'गिननेवाला' है, और कापिलशास्त्रके मूल तत्त्व इनेगिने 'पचीस' ही हैं। इसलिये उन्हें 'गिननेवालेके' अर्थमें यह विशिष्ट 'सांख्य' नाम पहले दिया गया। अनंतर 'सांख्य' शब्दका अर्थ बहुत व्यापक हो गया; और उसमें सब प्रकारके तत्त्वज्ञानका समावेश होने लगा। यही कारण है, कि जब पहले पहल कापिल - भिक्षुओंको 'सांख्य' कहनेकी परिपाटी प्रचलित हो गई, तब वेदान्ती संन्यासियोंकोभी यही नाम दिया जाने लगा होगा। कुछभी हो; इस प्रकरणका, हमने जानबूझकर, यह लंबा-चौड़ा 'कापिलसांख्यशास्त्र' नाम इसलिये रखा है, कि सांख्य शब्दके उक्त अर्थभेदके कारण कुछ गड़बड़ी न हो। कापिलसांख्यशास्त्रमेंभी कणादके न्यायशास्त्रके समान सूत्र हैं। परंतु गौडपादाचार्य या शारीर-भाष्यकार श्री शंकराचार्यने इन सूत्रोंका आधार अपने ग्रंथोंमें नहीं लिया है। इसलिये बहुतेरे विद्वान् समझते हैं, कि ये सूत्र कदाचित् प्राचीन न हों। ईश्वरकृष्णकी 'सांख्यकारिका' उक्त सूत्रोंसे प्राचीन मानी जाती है; और उसपर श्री शंकराचार्यके दादागुरु गौडपादने भाष्य लिखा है। शांकर-भाष्यमेंभी इसी कारिकाके कुछ अवतरण लिये हैं। सन ५७० ईसवीसे पहले इस ग्रंथका जो अनुवाद चीनी भाषामें हुआ था, वह इस समय उपलब्ध है।* ईश्वरकृष्णने अपनी 'कारिका'के अंतमें कहा है, कि 'षष्टितंत्र' नामक साठ प्रकरणोंके एक प्राचीन और विस्तृत ग्रंथका भावार्थ (कुछ प्रकरणोंको छोड़) सत्तर आर्या-पद्योंमें इस ग्रंथमें दिया गया है। यह षष्टितंत्र ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है। इसीलिये उन कारिकाओंके आधारपरही कापिल- सांख्यशास्त्रके मूल सिद्धान्तोंका विवेचन हमने यहाँ किया है। महाभारतमें सांख्य- * अब बौद्ध ग्रंथोंसे ईश्वरकृष्णका बहुत कुछ हाल जाना जा सकता है। बौद्ध पंडित वसुबंधुका गुरु ईश्वरकृष्णका समकालीन प्रतिपक्षी था। वसुबंधुका जो जीवन चरित, परमार्थने (सन ई. ४९९-५६९ में) चीनी भाषामें लिखा था, वह अब प्रकाशित हुआ है। इसमे डॉक्टर टककमूने यह अनुमान किया है, कि ईश्वरकृष्णका समय सन ४५० ई. के लगभग है। Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain & Ireland, 1905, pp. 33-53. परंतु डॉक्टर विन्सेंट स्मिथकी राय है कि, स्वयं वमुबंधुका समयही चौथी सदीमें (लगभग २८०-३६०) होना चाहिये। क्योंकि उसके ग्रंथोंका अनुवाद सन ४०४ ईसवीमें चीनी भाषामें हुआ है। वमुबंधुका समय इस प्रकार जब पीछे हट जाता है, तब उसी प्रकार ईश्वरकृष्णका समयभी करीब २०० वर्ष पीछे हटाना पड़ता है; अर्थात् सन २६० ईसवीके लगभग ईश्वरकृष्णका समय आ पहुँचता है। Vincent Smith's Early History of India, 3rd. Ed., P. 328.