श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५३ कणाद या कपिलको मालूम नहीं थीं। उस समय उनकी दृष्टिके सामने जितनी सामग्री थी, उसीके आधारपर उन्होंने अपने अपने सिद्धान्त ढूंढ निकाले हैं। तथापि, यह आश्चर्यकी बात है, कि सृष्टिकी वृद्धि और उसकी घटनाके विषयमें सांख्य- शास्त्रकारोंके तात्त्विक सिद्धान्तमें और अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रकारोंके तात्त्विक सिद्धान्तमें, बहुत-सा भेद नहीं है। इसमें संदेह नहीं, कि सृष्टिशास्त्रके ज्ञानकी वृद्धिके कारण वर्तमान समयमें इस मतकी आधिभौतिक उपपत्तिका वर्णन अधिक नियमबद्ध प्रणालीसे किया जा सकता है; और आधिभौतिक ज्ञानकी वृद्धिके कारण हमें व्यवहारकी दृष्टिसेभी बहुत लाभ हुआ है। परंतु आधि- भौतिक शास्त्रकारभी "एकही अव्यक्त प्रकृतिसे अनेक प्रकारकी व्यक्त सृष्टि कैसे हुई" इस विषयमें कपिलकी अपेक्षा कुछ अधिक नहीं बतला सकते। इस बातको भली भांति समझा देनेके लियेही हमने आगे चल कर, बीचमें स्थान-स्थान- पर, कपिलके सिद्धान्तोंके साथ साथ, हेकेलके सिद्धान्तोंकाभी, तुलनाके लिये संक्षिप्त वर्णन किया है। हेकेलने अपने ग्रंथमें साफ साफ़ लिख दिया है, कि मैंने ये सिद्धान्त कुछ नये सिरेसे नहीं खोजे हैं; वरन्, डार्विन, स्पेन्सर इत्यादि पिछले आधिभौतिक पंडितोंके ग्रंथोंके आधारसेही मैं अपने सिद्धान्तोंका प्रतिपादन करता हूँ। तथापि पहले पहल उसीने इन सब सिद्धान्तोंको ठीक ठीक नियमानुसार लिख कर सरलतापूर्वक इनका एकत्र वर्णन "विश्वको पहेली"* नामक ग्रंथमें किया है। इस कारण, सुभीतेके लिये, हमने उसीही सब आधिभौतिक तत्त्वज्ञोंका मुखिया माना है; और उसीके मतोंका इस प्रकरणमें तथा अगले प्रकरणमें विशेष उल्लेख किया है। कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि यह उल्लेख बहुतही संक्षिप्त है; परंतु इससे अधिक इन सिद्धान्तोंका विवेचन इस ग्रंथमें नहीं किया जा सकता। जिन्हें इस विषयका विस्तृत वर्णन पढ़ना हो, उन्हें स्पेन्सर, डार्विन, हेकेल आदि पंडितोंके मूल ग्रंथोंका अवलोकन करना चाहिये। कपिलके सांख्यशास्त्रका विचार करनेके पहले यह कह देना उचित होगा, कि 'सांख्य' शब्दके दो भिन्न भिन्न अर्थ होते हैं। पहला अर्थ कपिलाचार्य द्वारा प्रतिपादित 'सांख्यशास्त्र' है। उसीका उल्लेख इस प्रकरणमें, तथा एक बार भगवद्- गीता (गीता १८. १३) मेंभी किया गया है। परंतु इस विशिष्ट अर्थके सिवा सब प्रकारके तत्त्वज्ञानकोभी सामान्यतः 'सांख्य'ही कहनेकी परिपाटी है; और इसी 'सांख्य' शब्दमें वेदान्तशास्त्रकाभी समावेश होता है। 'सांख्यनिष्ठा'। अथवा 'सांख्ययोग' शब्दोंमें 'सांख्य'का यही सामान्य अर्थ अभीष्ट है। इस निष्ठाके ज्ञानी पुरुषोंकोभी भगवद्गीतामें जहाँ (गीता २. ३९; ३. ३; ५. ४, ५; और १३. २४)
- The Riddle of the Universe, by Ernst Haeckel इस ग्रंथकी R. P. A. Cheap reprint आवृत्तिकाही हमने सर्वत्र उपयोग किया है।