श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पानीके परमाणुमें तीन गुण हैं, तेजके परमाणुमें दो गुण हैं और वायुके परमाणुमें एकही गुण है। इस प्रकार सब जगत् पहलेसेही सूक्ष्म और नित्य परमाणुओंमे भरा हुआ है। परमाणुओंके सिवा संसारका मूल कारण और कुछभी नहीं है। जब सूक्ष्म और नित्य परमाणुओंके परस्पर संयोगका 'आरंभ' होता है, तब सृष्टिके व्यक्त पदार्थ बनने लगते हैं। नैयायिकों द्वारा प्रतिपादित व्यक्त सृष्टिकी उत्पत्तिके संबंधकी इस कल्पनाको 'आरंभ-वाद' कहते हैं और कुछ नैयायिक इसके आगे कभी नहीं बढ़ते । एक नैयायिकके बारेमें कहा जाता है, कि मृत्युके समय जब उससे ईश्वरका नाम लेनेको कहा गया, तब वह “पीलवः ! पीलवः ! पीलवः ! ” - परमाणु ! परमाणु ! परमाणु ! - चिल्ला उठा । तथापि, कुछ दूसरे नैयायिक यह मानते हैं, कि परमाणुओंके संयोगका निमित्तकारण ईश्वर है ! इस प्रकार वे सृष्टिकी कारण-परंपराकी शृंखलाको पूर्ण कर लेते हैं। ऐसे नैयायिकोंको 'सेश्वर' कहते हैं। वेदान्तसूत्रके दूसरे अध्यायके दूसरे पादमें इस परमाणुवादका ( २. २. ११-१७ ) और इसके साथही साथ “ ईश्वर केवल निमित्तकारण है ” इस मतकाभी ( २. २. ३७-३९ ) खंडन किया गया है। उल्लिखित परमाणुवादका वर्णन पढ़कर अंग्रेजी पढ़े-लिखे पाठकोंको अर्वाचीन रसायनशास्त्रज्ञ डाल्टनके परमाणुवादका अवश्यही स्मरण होगा । परंतु पश्चिमी देशोंमें प्रसिद्ध सृष्टिशास्त्रज्ञ डार्विनके उत्क्रान्तिवादने जिस प्रकार डाल्टनके परमाणुवादकी जड़ही उखाड़ दी है, उसी प्रकार हमारे देशमेंभी प्राचीन समयमें सांख्य-मतने कणादके मतकी बुनियाद हिला डाली थी। कणाद और उसके अनुयायी यह नहीं बतला सकते, कि मूल परमाणुको गति कैसे मिली। इसके अतिरिक्त वे लोग इस बातकाभी यथोचित निर्णय नहीं कर सकते, कि वृक्ष, पशु, मनुष्य इत्यादि सचेतन प्राणियोंकी क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियाँ कैसे बनी; और अचेतनको सचेतनता कैसे प्राप्त हुई। यह निर्णय पश्चिमी देशोंमें उन्नीसवी सदीमें लामार्क और डार्विनने, तथा हमारे यहाँ प्राचीन समयमें कपिलमुनिने किया है। दोनों मतोंका यही तात्पर्य है, कि एकही मूलपदार्थके गुणोंका विकास हुआ; और फिर धीरे धीरे सब सृष्टिकी रचना होती गई। इस कारण पहले हिंदुस्थानमें, और अब सब पश्चिमी देशोंमेंभी, परमाणुवादपर विश्वास नहीं रहा है। अब तो आधुनिक पदार्थशास्त्रज्ञोंने यहभी सिद्ध कर दिखाया है, कि परमाणु आविभाज्य नहीं हैं। आजकल जैसे सृष्टिके अनेक पदार्थोंका पृथक्करण और परीक्षण करके अनेक सृष्टिशास्त्रोंके आधारपर परमाणुवाद या उत्क्रांतिवादको सिद्ध कर दे सकते हैं, वैसे प्राचीन समयमें नहीं कर सकते थे। सृष्टिके पदार्थोंपर नये नये और भिन्न भिन्न प्रयोग करना, अथवा अनेक प्रकारसे उनका पृथक्करण करके गुण-धर्म निश्चित करना, या सजीव सृष्टिके नये पुराने अनेक प्राणियोंके शारीरिक अवयवोंकी एकत्र तुलना करना इत्यादि आधिभौतिक शास्त्रोंकी अर्वाचीन युक्तियाँ