श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
१५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पानीके परमाणुमें तीन गुण हैं, तेजके परमाणुमें दो गुण हैं और वायुके परमाणुमें एकही गुण है। इस प्रकार सब जगत् पहलेसेही सूक्ष्म और नित्य परमाणुओंमे भरा हुआ है। परमाणुओंके सिवा संसारका मूल कारण और कुछभी नहीं है। जब सूक्ष्म और नित्य परमाणुओंके परस्पर संयोगका 'आरंभ' होता है, तब सृष्टिके व्यक्त पदार्थ बनने लगते हैं। नैयायिकों द्वारा प्रतिपादित व्यक्त सृष्टिकी उत्पत्तिके संबंधकी इस कल्पनाको 'आरंभ-वाद' कहते हैं और कुछ नैयायिक इसके आगे कभी नहीं बढ़ते । एक नैयायिकके बारेमें कहा जाता है, कि मृत्युके समय जब उससे ईश्वरका नाम लेनेको कहा गया, तब वह “पीलवः ! पीलवः ! पीलवः ! ” - परमाणु ! परमाणु ! परमाणु ! - चिल्ला उठा । तथापि, कुछ दूसरे नैयायिक यह मानते हैं, कि परमाणुओंके संयोगका निमित्तकारण ईश्वर है ! इस प्रकार वे सृष्टिकी कारण-परंपराकी शृंखलाको पूर्ण कर लेते हैं। ऐसे नैयायिकोंको 'सेश्वर' कहते हैं। वेदान्तसूत्रके दूसरे अध्यायके दूसरे पादमें इस परमाणुवादका ( २. २. ११-१७ ) और इसके साथही साथ “ ईश्वर केवल निमित्तकारण है ” इस मतकाभी ( २. २. ३७-३९ ) खंडन किया गया है। उल्लिखित परमाणुवादका वर्णन पढ़कर अंग्रेजी पढ़े-लिखे पाठकोंको अर्वाचीन रसायनशास्त्रज्ञ डाल्टनके परमाणुवादका अवश्यही स्मरण होगा । परंतु पश्चिमी देशोंमें प्रसिद्ध सृष्टिशास्त्रज्ञ डार्विनके उत्क्रान्तिवादने जिस प्रकार डाल्टनके परमाणुवादकी जड़ही उखाड़ दी है, उसी प्रकार हमारे देशमेंभी प्राचीन समयमें सांख्य-मतने कणादके मतकी बुनियाद हिला डाली थी। कणाद और उसके अनुयायी यह नहीं बतला सकते, कि मूल परमाणुको गति कैसे मिली। इसके अतिरिक्त वे लोग इस बातकाभी यथोचित निर्णय नहीं कर सकते, कि वृक्ष, पशु, मनुष्य इत्यादि सचेतन प्राणियोंकी क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियाँ कैसे बनी; और अचेतनको सचेतनता कैसे प्राप्त हुई। यह निर्णय पश्चिमी देशोंमें उन्नीसवी सदीमें लामार्क और डार्विनने, तथा हमारे यहाँ प्राचीन समयमें कपिलमुनिने किया है। दोनों मतोंका यही तात्पर्य है, कि एकही मूलपदार्थके गुणोंका विकास हुआ; और फिर धीरे धीरे सब सृष्टिकी रचना होती गई। इस कारण पहले हिंदुस्थानमें, और अब सब पश्चिमी देशोंमेंभी, परमाणुवादपर विश्वास नहीं रहा है। अब तो आधुनिक पदार्थशास्त्रज्ञोंने यहभी सिद्ध कर दिखाया है, कि परमाणु आविभाज्य नहीं हैं। आजकल जैसे सृष्टिके अनेक पदार्थोंका पृथक्करण और परीक्षण करके अनेक सृष्टिशास्त्रोंके आधारपर परमाणुवाद या उत्क्रांतिवादको सिद्ध कर दे सकते हैं, वैसे प्राचीन समयमें नहीं कर सकते थे। सृष्टिके पदार्थोंपर नये नये और भिन्न भिन्न प्रयोग करना, अथवा अनेक प्रकारसे उनका पृथक्करण करके गुण-धर्म निश्चित करना, या सजीव सृष्टिके नये पुराने अनेक प्राणियोंके शारीरिक अवयवोंकी एकत्र तुलना करना इत्यादि आधिभौतिक शास्त्रोंकी अर्वाचीन युक्तियाँ
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५३ कणाद या कपिलको मालूम नहीं थीं। उस समय उनकी दृष्टिके सामने जितनी सामग्री थी, उसीके आधारपर उन्होंने अपने अपने सिद्धान्त ढूंढ निकाले हैं। तथापि, यह आश्चर्यकी बात है, कि सृष्टिकी वृद्धि और उसकी घटनाके विषयमें सांख्य- शास्त्रकारोंके तात्त्विक सिद्धान्तमें और अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रकारोंके तात्त्विक सिद्धान्तमें, बहुत-सा भेद नहीं है। इसमें संदेह नहीं, कि सृष्टिशास्त्रके ज्ञानकी वृद्धिके कारण वर्तमान समयमें इस मतकी आधिभौतिक उपपत्तिका वर्णन अधिक नियमबद्ध प्रणालीसे किया जा सकता है; और आधिभौतिक ज्ञानकी वृद्धिके कारण हमें व्यवहारकी दृष्टिसेभी बहुत लाभ हुआ है। परंतु आधि- भौतिक शास्त्रकारभी "एकही अव्यक्त प्रकृतिसे अनेक प्रकारकी व्यक्त सृष्टि कैसे हुई" इस विषयमें कपिलकी अपेक्षा कुछ अधिक नहीं बतला सकते। इस बातको भली भांति समझा देनेके लियेही हमने आगे चल कर, बीचमें स्थान-स्थान- पर, कपिलके सिद्धान्तोंके साथ साथ, हेकेलके सिद्धान्तोंकाभी, तुलनाके लिये संक्षिप्त वर्णन किया है। हेकेलने अपने ग्रंथमें साफ साफ़ लिख दिया है, कि मैंने ये सिद्धान्त कुछ नये सिरेसे नहीं खोजे हैं; वरन्, डार्विन, स्पेन्सर इत्यादि पिछले आधिभौतिक पंडितोंके ग्रंथोंके आधारसेही मैं अपने सिद्धान्तोंका प्रतिपादन करता हूँ। तथापि पहले पहल उसीने इन सब सिद्धान्तोंको ठीक ठीक नियमानुसार लिख कर सरलतापूर्वक इनका एकत्र वर्णन "विश्वको पहेली"* नामक ग्रंथमें किया है। इस कारण, सुभीतेके लिये, हमने उसीही सब आधिभौतिक तत्त्वज्ञोंका मुखिया माना है; और उसीके मतोंका इस प्रकरणमें तथा अगले प्रकरणमें विशेष उल्लेख किया है। कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि यह उल्लेख बहुतही संक्षिप्त है; परंतु इससे अधिक इन सिद्धान्तोंका विवेचन इस ग्रंथमें नहीं किया जा सकता। जिन्हें इस विषयका विस्तृत वर्णन पढ़ना हो, उन्हें स्पेन्सर, डार्विन, हेकेल आदि पंडितोंके मूल ग्रंथोंका अवलोकन करना चाहिये। कपिलके सांख्यशास्त्रका विचार करनेके पहले यह कह देना उचित होगा, कि 'सांख्य' शब्दके दो भिन्न भिन्न अर्थ होते हैं। पहला अर्थ कपिलाचार्य द्वारा प्रतिपादित 'सांख्यशास्त्र' है। उसीका उल्लेख इस प्रकरणमें, तथा एक बार भगवद्- गीता (गीता १८. १३) मेंभी किया गया है। परंतु इस विशिष्ट अर्थके सिवा सब प्रकारके तत्त्वज्ञानकोभी सामान्यतः 'सांख्य'ही कहनेकी परिपाटी है; और इसी 'सांख्य' शब्दमें वेदान्तशास्त्रकाभी समावेश होता है। 'सांख्यनिष्ठा'। अथवा 'सांख्ययोग' शब्दोंमें 'सांख्य'का यही सामान्य अर्थ अभीष्ट है। इस निष्ठाके ज्ञानी पुरुषोंकोभी भगवद्गीतामें जहाँ (गीता २. ३९; ३. ३; ५. ४, ५; और १३. २४)
- The Riddle of the Universe, by Ernst Haeckel इस ग्रंथकी R. P. A. Cheap reprint आवृत्तिकाही हमने सर्वत्र उपयोग किया है।
१५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'सांख्य' कहा है, वहाँ सांख्यका अर्थ केवल कापिल सांख्यमार्गीही नहीं है; वरन् उसमें, आत्म-अनात्म-विचारसे सब कर्मोंका संन्यास करके ब्रह्मज्ञानहीमें निमग्न रहनेवाले वेदान्तियोंकाभी समावेश किया जाता है। शब्दशास्त्रज्ञोंका कथन है, कि 'सांख्य' शब्द 'संख्या' धातुसे बना है। इसलिये इसका पहला अर्थ 'गिननेवाला' है, और कापिलशास्त्रके मूल तत्त्व इनेगिने 'पचीस' ही हैं। इसलिये उन्हें 'गिननेवालेके' अर्थमें यह विशिष्ट 'सांख्य' नाम पहले दिया गया। अनंतर 'सांख्य' शब्दका अर्थ बहुत व्यापक हो गया; और उसमें सब प्रकारके तत्त्वज्ञानका समावेश होने लगा। यही कारण है, कि जब पहले पहल कापिल - भिक्षुओंको 'सांख्य' कहनेकी परिपाटी प्रचलित हो गई, तब वेदान्ती संन्यासियोंकोभी यही नाम दिया जाने लगा होगा। कुछभी हो; इस प्रकरणका, हमने जानबूझकर, यह लंबा-चौड़ा 'कापिलसांख्यशास्त्र' नाम इसलिये रखा है, कि सांख्य शब्दके उक्त अर्थभेदके कारण कुछ गड़बड़ी न हो। कापिलसांख्यशास्त्रमेंभी कणादके न्यायशास्त्रके समान सूत्र हैं। परंतु गौडपादाचार्य या शारीर-भाष्यकार श्री शंकराचार्यने इन सूत्रोंका आधार अपने ग्रंथोंमें नहीं लिया है। इसलिये बहुतेरे विद्वान् समझते हैं, कि ये सूत्र कदाचित् प्राचीन न हों। ईश्वरकृष्णकी 'सांख्यकारिका' उक्त सूत्रोंसे प्राचीन मानी जाती है; और उसपर श्री शंकराचार्यके दादागुरु गौडपादने भाष्य लिखा है। शांकर-भाष्यमेंभी इसी कारिकाके कुछ अवतरण लिये हैं। सन ५७० ईसवीसे पहले इस ग्रंथका जो अनुवाद चीनी भाषामें हुआ था, वह इस समय उपलब्ध है।* ईश्वरकृष्णने अपनी 'कारिका'के अंतमें कहा है, कि 'षष्टितंत्र' नामक साठ प्रकरणोंके एक प्राचीन और विस्तृत ग्रंथका भावार्थ (कुछ प्रकरणोंको छोड़) सत्तर आर्या-पद्योंमें इस ग्रंथमें दिया गया है। यह षष्टितंत्र ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है। इसीलिये उन कारिकाओंके आधारपरही कापिल- सांख्यशास्त्रके मूल सिद्धान्तोंका विवेचन हमने यहाँ किया है। महाभारतमें सांख्य- * अब बौद्ध ग्रंथोंसे ईश्वरकृष्णका बहुत कुछ हाल जाना जा सकता है। बौद्ध पंडित वसुबंधुका गुरु ईश्वरकृष्णका समकालीन प्रतिपक्षी था। वसुबंधुका जो जीवन चरित, परमार्थने (सन ई. ४९९-५६९ में) चीनी भाषामें लिखा था, वह अब प्रकाशित हुआ है। इसमे डॉक्टर टककमूने यह अनुमान किया है, कि ईश्वरकृष्णका समय सन ४५० ई. के लगभग है। Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain & Ireland, 1905, pp. 33-53. परंतु डॉक्टर विन्सेंट स्मिथकी राय है कि, स्वयं वमुबंधुका समयही चौथी सदीमें (लगभग २८०-३६०) होना चाहिये। क्योंकि उसके ग्रंथोंका अनुवाद सन ४०४ ईसवीमें चीनी भाषामें हुआ है। वमुबंधुका समय इस प्रकार जब पीछे हट जाता है, तब उसी प्रकार ईश्वरकृष्णका समयभी करीब २०० वर्ष पीछे हटाना पड़ता है; अर्थात् सन २६० ईसवीके लगभग ईश्वरकृष्णका समय आ पहुँचता है। Vincent Smith's Early History of India, 3rd. Ed., P. 328.
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५५ मतका निर्णय कई अध्यायोंमें किया गया है। परंतु उनमें वेदान्त-मतोंकाभी मिश्रण हो गया है; इसलिये कपिलके शुद्ध सांख्य-मतको जाननेके लिये दूसरे ग्रंथोंकोभी देखनेकी आवश्यकता होती है। इस कामके लिये उक्त सांख्यकारिकाकी अपेक्षा कोईभी अधिक प्राचीन ग्रंथ इस समय उपलब्ध नहीं है। भगवानने भगवद्गीतामें कहा है, कि "सिद्धानां कपिलो मुनिः" (गीता १०.२६) - सिद्धोंमेंसे कपिलमुनि मैं हूँ; - इससे कपिलकी योग्यता भली भाँति सिद्ध होती है। तथापि यह बात मालूम नहीं, कि कपिल ऋषि कहाँ और कब हुए। शांतिपर्व (मभा. शां. ३४०.६७) में एक जगह लिखा है, कि सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सन, सनत्सुजात, सनातन और कपिल ये सातों ब्रह्मदेवके मानसपुत्र हैं और इन्हें जन्महीसे ज्ञान हो गया था। दूसरे स्थान (मभा. शां. २१८) में कपिलके शिष्य आसुरि और उसके चेले पंचशिखने जनकको सांख्यशास्त्रका जो उपदेश दिया था उसका उल्लेख है। इसी प्रकार शांतिपर्व (मभा. शां. ३०१.१०८, १०९) में भीष्मने कहा है, कि सांख्योंने सृष्टि-रचना इत्यादिके बारेमें एक बार जो ज्ञान प्रचलित कर दिया है, वही "पुराण, इतिहास, अर्थशास्त्र" आदि सबमें पाया जाता है। वही क्यों; यहाँतक कहा गया है, कि "ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन्" - अर्थात् इस जगतका सब ज्ञान सांख्योंसेही प्राप्त हुआ है (मभा. शां. ३०१.१०९)। यदि इस बातपर ध्यान दिया जाय, कि वर्तमान समयमें पश्चिमी ग्रंथकार उत्क्रांतिवादका उपयोग सब जगह कैसे किया करते हैं; तो यह बात आश्चर्यजनक नहीं मालूम होती, कि इस देशके निवासियोंनेभी उत्क्रांतिवादकी बराबरीके संख्याशास्त्रका सर्वत्र कुछ अंशमें स्वीकार किया है। 'गुरुत्वाकर्षण' सृष्टिरचनाके 'उत्क्रांतितत्त्व'* या 'ब्रह्मात्मैक्य'के समान उदात्त विचार सैकड़ों बरसोंके बादही किसी महात्माके ध्यानमें आया करते हैं। इसलिये यह बात सामान्यतः सभी देशोंके ग्रंथोंमें पाई जाती है, कि जिस समय जो सामान्य सिद्धान्त या व्यापक तत्त्व समाजमें प्रचलित रहता है, उसके आधारपरही किसी ग्रंथके विषयका प्रतिपादन किया जाता है। आजकल कापिलसांख्यशास्त्रका अभ्यास प्रायः लुप्त हो गया है, इसीलिये यह प्रस्तावना करनी पड़ी। अब हम यह देखेंगे, कि इस शास्त्रके मुख्य सिद्धान्त कौन-से हैं। सांख्यशास्त्रका पहला सिद्धान्त यह है, कि इस संसारमें कोईभी नई वस्तु उत्पन्न नहीं होती। क्योंकि, शून्यसे - अर्थात् जो पहले थाही नहीं उससे -
- Evolution Theory के अर्थमें 'उत्क्रांति-तत्त्व' का उपयोग आजकल किया जाता है, इसलिये हमनेभी यहाँ उसी शब्दका प्रयोग किया है। परंतु संस्कृतमें 'उत्क्रांति' शब्द का अर्थ मृत्यु है। इस कारण 'उत्क्रांति'के बदले गुणविकास, गुणोत्कर्ष, या गुणपरिणाम आदि सांख्यवादियोंके शब्दोंका उपयोग करना हमारी समझमें अधिक योग्य होगा।
१५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शून्यको छोड़ और कुछभी प्राप्त हो नहीं सकता । इसलिये यह बात सदा ध्यानमें रखनी चाहिये, कि उत्पन्न वस्तुमें - अर्थात् कार्यमें - जो गुण दीख पड़ते हैं, वे गुण जिससे यह वस्तु उत्पन्न हुई है, उसमें ( अर्थात् कारणमें ) सूक्ष्म रीतिसे तो अवश्य होनेही चाहिये ( सां. का. ९)। बौद्ध और काणाद यह मानते हैं, कि पदार्थका नाश हो कर उससे दूसरा नया पदार्थ बनता है। उदाहरणार्थ, बीजका नाश होनेके बाद उससे अंकुर और अंकुरका नाश होनेके बाद उससे पेड़ होता है। परंतु सांख्य- शास्त्रियों और वेदान्तियोंको यह मत पसंद नहीं है। वे कहते हैं, कि वृक्षके बीजमें जो 'द्रव्य' हैं उनका नाश नहीं होता; किंतु वेही द्रव्य जमीनसे और वायुसे दूसरे द्रव्योंको खींच लिया करते हैं; और इसी कारणसे बीजको अंकुरका नया स्वरूप या अवस्था प्राप्त हो जाती है (वे. सू. शां. भा. २. १. १८)। इसी प्रकार जब लकड़ी जलती है, तब उसकेही राख या धुआँ आदि रूपांतर हो जाते हैं। लकड़ीके मूल 'द्रव्यों'का नाश हो कर धुआँ नामक कोई नया पदार्थ उत्पन्न नहीं होता। छांदोग्योपनिषद् (छां. ६. २. १) में कहा है, "कथमसतः सज्जायेत" - जो है ही नहीं - उससे जो है - वह कैसे प्राप्त हो सकता है? जगतके मूल कारणके लिये 'असत्' शब्दका उपयोग कभी कभी उपनिषदोंमें किया गया है, (छां. ३. १९. १; तै. २. ७. १); परंतु यहाँ 'असत्'का अर्थ 'अभाव नहीं' नहीं है; किंतु वेदान्तसूत्रों (वे. सू. २. १. १६, १७) में यह निश्चय किया गया है, कि 'असत्' शब्दसे केवल नामरूपात्मक व्यक्त स्वरूप या अवस्थाका अभावही विवक्षित है। दूधसेही दही बनता है, पानीसे नहीं; तिलसेही तेल निकलता है, बालूसे नहीं; इत्यादि प्रत्यक्ष देखे हुए अनुभवोंसेभी यही सिद्धान्त प्रकट होता है। यदि हम यह मान लें, कि 'कारण' में जो गुण नहीं हैं, वे 'कार्य'में स्वतंत्र रीतिसे उत्पन्न होते हैं; तो फिर हम इसका कारण नहीं बतला सकते, कि पानीसे दही क्यों नहीं बनता ? सारांश यह है, कि जो मूलमें हैही नहीं, उससे अभी जो अस्तित्वमें है, वह उत्पन्न नहीं हो सकता। इसलिये सांख्यवादियोंने यह सिद्धान्त निकाला है, कि किसी कार्यके वर्तमान द्रव्यांश और गुण मूल कारणमेंभी किसी न किसी रूपसे स्थिर रहते हैं। इसी सिद्धान्तको 'सत्कार्यवाद' कहते हैं। अर्वाचीन पदार्थ- विज्ञानके ज्ञाताओंनेभी यही सिद्धान्त ढूंढ़ निकाला है, कि पदार्थोंके जड़ द्रव्य और कर्मशक्ति दोनों सर्वदा स्थिर रहते हैं। और किसी पदार्थके चाहे जितने रूपांतर हो जायें; तोभी अन्तमें सृष्टिके कुल द्रव्यांशका और कर्मशक्तिका जोड़ हमेशा एकसा बना रहता है। उदाहरणार्थ, जब हम दीपकको जलता देखते हैं, तब तेलभी धीरे धीरे कम होता जाता है; और अंतमें वह नष्ट हुआसा दीख पड़ता है। यद्यपि यह सब तेल जल जाता है, तथापि उसके परमाणुओंका बिलकुलही नाश नहीं हो जाता। उन परमाणुओंका अस्तित्व धुएँ या काजल या अन्य सूक्ष्म द्रव्योंके रूपमें बना रहता है। यदि हम इन सूक्ष्म द्रव्योंको एकत्र करके तौलें तो मालूम
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५७ होगा, कि उनका तौल या वज़न तेल और तेलके जलते समय उसमें मिले हुए वायुके पदार्थोंके तौलके बराबर होता है। अब तो यहभी सिद्ध हो चुका है, कि उक्त नियम कर्मशक्तिके विषयमेंभी लगाया जा सकता है। यह बात याद रखनी चाहिये, कि यद्यपि आधुनिक पदार्थविज्ञानशास्त्रका और सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त दिखनेमें एक-सा है, फिरभी सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त केवल एक पदार्थसे दूसरे पदार्थकी उत्पत्तिके विषयमें - अर्थात् सिर्फ कार्य-कारण-भावहीके संबंधमें उपयुक्त होता है। परंतु, अर्वाचीन पदार्थविज्ञानशास्त्रका सिद्धान्त इससे अधिक व्यापक है। 'कार्य'का कोईभी गुण 'कारण'के बाहरके गुणोंसे उत्पन्न नहीं हो सकता। इतनाही नहीं; किंतु जब कारणको कार्यका स्वरूप प्राप्त होता है, तब उस कार्यमें रहनेवाले द्रव्यांश और कर्म-शक्तिका कुछभी नाश नहीं होता और पदार्थकी भिन्न भिन्न अवस्थाओंके द्रव्यांश और कर्मशक्तिके जोड़का वज़नभी सदैव एकही-सा रहता है - न तो वह घटता है और न बढ़ता है। यह बात प्रत्यक्ष प्रयोगसे गणितके द्वारा सिद्ध कर दी गई है और यही उक्त दोनों सिद्धान्तोंकी महत्त्वकी विशेषता है। इस प्रकार जब हम विचार करते हैं, तो हमें जान पड़ता है, कि भगवद्गीताके "नासतो विद्यते भावः" - जो रही नहीं, उसका कभीभी अस्तित्व हो नहीं सकता - इत्यादि सिद्धान्त जो दूसरे अध्यायके आरंभमें दिये हैं (गीता २. १६), वे यद्यपि देखनेमें सत्कार्यवादके समान दीख पड़े, तोभी उनकी समता केवल कार्यकारणात्मक सत्कार्यवादकी अपेक्षा अर्वाचीन पदार्थ-विज्ञानशास्त्रके सिद्धान्तोंके साथ अधिक है। छांदोग्योपनिषद्के उपर्युक्त वचनकाभी यही भावार्थ है। सारांश, सत्कार्यवादका सिद्धान्त वेदान्तियोंको मान्य है; परंतु अद्वैत वेदान्तशास्त्रका मत है, कि इस सिद्धान्तका उपयोग सगुण सृष्टिके परे नहीं किया जा सकता। और निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्ति कैसे दीख पड़ती है इस बातकी उपपत्ति औरही प्रकारसे लगानी चाहिये। इस वेदान्त-मतका विचार आगे चलकर अध्यात्म-प्रकरणमें विस्तृत रीतिसे किया जायगा। इस समय तो हमें सिर्फ यही विचार करना है, कि सांख्यवादियोंकी पहुँच कहाँतक है। इसलिये अब हम इस बातका विचार करेंगे, कि सत्कार्यवादका सिद्धान्त मानकर सांख्योंने क्षर-अक्षर शास्त्रमें उसका उपयोग कैसे किया है। सांख्यमतानुसार जब सत्कार्यवाद सिद्ध हो जाता है तब यह मत आप-ही-आप गिर जाता है, कि दृश्यसृष्टिकी उत्पत्ति शून्यसे अर्थात् किसी पदार्थके पहले न रहते हुई है। क्योंकि, शून्यसे अर्थात् जो कुछभी नहीं है, उससे जो "अस्तित्वमें है" वह उत्पन्न नही हो सकता। इस बातसे यह साफ़ साफ़ सिद्ध होता है, कि सृष्टि किसी- न-किसी पदार्थसे उत्पन्न हुई है और इस समय सृष्टिमें जो गुण हमें दीख पड़ते हैं, वेही इसके मूलपदार्थमेंभी होने चाहिये। अब यदि हम सृष्टिकी ओर देखें, तो हमें वृक्ष, पशु, मनुष्य, पत्थर, सोना, चांदी, हीरा, जल, वायु इत्यादि अनेक पदार्थ दीख पड़ते हैं, और इन सबके रूप तथा गुणभी भिन्न भिन्न हैं। सांख्यवादियोंका सिद्धान्त है, कि
१५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यह भिन्नता या नानात्व मूलमें - अर्थात् मूल पदार्थमें - नहीं है; किंतु मूलमें सब वस्तुओंका द्रव्य एकही है। अर्वाचीन रसायनशास्त्रज्ञोंने भिन्न भिन्न द्रव्योंका पृथक्करण करके पहले ६२ मूलतत्त्व ढूंढ़ निकाले थे; परंतु अब पश्चिमी विज्ञानवेत्ताओंनेभी यह निश्चय कर लिया है, कि ये ६२ मूल तत्त्व स्वतंत्र या स्वयंसिद्ध नहीं हैं। किंतु इन सबकी जड़में कोई-न-कोई एकही पदार्थ है; और उस पदार्थहीसे सूर्य, चंद्र, तारागण, पृथ्वी इत्यादि सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है। इसलिये अब उक्त सिद्धान्तका अधिक विवेचन आवश्यक नहीं है। जगतके सब पदार्थोंका जो यह मूलद्रव्य है, उसेही सांख्यशास्त्रमें 'प्रकृति' कहते हैं। प्रकृतिका अर्थ 'मूलधर्म, है। इस प्रकृतिसे आगे जो पदार्थ बनते हैं, उन्हें 'विकृति' अर्थात् मूलद्रव्यके विकार कहते हैं। परंतु यद्यपि सब पदार्थोंमें मूल द्रव्य एकही है, तथापि यदि इस मूल द्रव्यमें गुणभी एकही हो, तो सत्कार्यवादानुसार इस एकही गुणसे अनेक गुणोंका उत्पन्न होना संभव नहीं है। और इधर तो जब हम इस जगतके पत्थर, मिट्टी, पानी, सोना इत्यादि भिन्न भिन्न पदार्थोंकी ओर देखते हैं, तब उनमें भिन्न भिन्न अनेक गुण पाये जाते हैं। इसलिये पहले सब पदार्थोंके गुणोंका निरीक्षण करके सांख्यवादियोंने इन गुणोंके सत्त्व, रज और तम ये तीन भेद या वर्ग कर दिये हैं। इसका कारण यही है, कि जब हम किसीभी पदार्थको देखते हैं, तब स्वभावतः उसकी दो भिन्न भिन्न अवस्थाएँ दीख पड़ती हैं; - पहली शुद्ध, निर्मल या पूर्णावस्था और दूसरी उसके विरुद्ध निकृष्टावस्था। परंतु साथही साथ निकृष्टावस्थासे पूर्णावस्थाकी ओर बढ़नेकी उस पदार्थकी प्रवृत्तिभी दृष्टिगोचर हुआ करती है; यही तीसरी अवस्था है। इन तीनों अवस्थाओंमेंसे शुद्धा- वस्था या पूर्णावस्थाको सात्त्विक, निकृष्टावस्थाको तामसिक और प्रवर्तकावस्थाको राजसिक कहते हैं। इस प्रकार सांख्यवादी कहते हैं, कि सत्त्व, रज और तम तीनों गुण सब पदार्थोंके मूलद्रव्यमें अर्थात् उनकी प्रकृतिमें आरंभसेही रहा करते हैं। इसलिये यदि यह कहा जाय, कि इन तीन गुणोंहीको प्रकृति कहते हैं, तो अनुचित नहीं होगा। इन तीनों गुणोंमेंसे प्रत्येक गुणका जोर आरंभमें समान या बराबर रहता है, इसीलिये पहले पहल यह प्रकृति साम्यावस्थामें रहती है। यह साम्यावस्था जगतके आरंभमें थी; और जगत्का लय हो जानेपर वैसीही फिर हो जायगी। साम्यावस्थामें कुछभी हल- चल नहीं होती, सब कुछ स्तब्ध रहता है। परंतु जब उक्त तीनों गुण न्यूनाधिक होने लगते हैं, तब प्रवृत्त्यात्मक रजोगुणके कारण मूल प्रकृतिसे भिन्न भिन्न पदार्थ उत्पन्न होने लगते हैं; और सृष्टिका आरंभ होने लगता है। अब यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है, कि यदि पहले सत्त्व, रज और तम ये दोनों गुण साम्यावस्थामें थे, तो इनमें न्यूनाधिकता कैसे उत्पन्न हुई है ? इस प्रश्नका सांख्यवादी यही उत्तर देते हैं, कि यह प्रकृतिका मूलभूत धर्मही है (सां. का. ६१)। यद्यपि प्रकृति जड़ है, तथापि वह आप-ही-आप ये सब व्यवहार करती रहती है। इन तीनों गुणोंमेंसे सत्त्वगुणका लक्षण ज्ञान अर्थात् जानना और तमोगुणका लक्षण अज्ञान है। रजोगुण बुरे या भले
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५९ कार्यका प्रवर्तक है। ये तीनों गुण कभी अलग अलग नहीं रह सकते। सब पदार्थोंमें सत्त्व, रज और तम इन तीनोंका मिश्रण रहताही है; और यह मिश्रण हमेशा इन तीनोंका परस्पर न्यूनाधिकतासे हुआ करता है। इसलिये यद्यपि मूलद्रव्य एक ही है, तोभी गुणभेदके कारण एक मूलद्रव्यकेही सोना, लोहा, मिट्टी, जल, आकाश, मनुष्यका शरीर इत्यादि भिन्न भिन्न अनेक विकार हो जाते हैं। जिसे हम सात्त्विक गुणका पदार्थ कहते हैं, उसमें रज और तमकी अपेक्षा, सत्त्वगुणका जोर या परिमाण अधिक रहता है, इस कारण उस पदार्थमें हमेशा रहनेवाले रज औरतम - दोनों गुण दब जाते हैं और वे हमें दीख नहीं पड़ते। वस्तुतः, सत्त्व, रज और तम - तीनों गुण अन्य पदार्थोंके समान, सात्त्विक पदार्थमेंभी विद्यमान रहते हैं। केवल सत्त्वगुणका, केवल रजोगुणका, या केवल तमोगुणका कोई पदार्थही नहीं है। प्रत्येक पदार्थमें तीनोंका रगड़ा-झगड़ा चलाही करता है; और इस झगड़ेमें जो गुण प्रबल हो जाता है, उसीके अनुसार हम प्रत्येक पदार्थको सात्त्विक, राजस या तामस कहा करते हैं (सां. का. १२; महा. अश्व - अनुगीता - ३६ और शां. ३०५) । उदाहरणार्थ, हमारे शरीरमें जब रज और तम गुणोंपर सत्त्वका प्रभाव जम जाता है, तब हमारे अंतःकरणमें ज्ञान उत्पन्न होता है, सत्यका परिचय होने लगता है, और चित्तवृत्ति शांत हो जाती है। यह नहीं समझना चाहिये, कि उस समय हमारे शरीरमें रजोगुण और तमोगुण बिलकुलही नहीं होते; बल्कि वे सत्त्वगुणके प्रभावसे दब जाते हैं, इसलिये उनका कुछ अधिकार चलने नहीं पाता (गीता १४. १०)। यदि सत्त्वके बदले रजोगुण प्रबल हो जाय, तो हमारे अंतःकरणमें लोभ जागृत हो जाता है, लालच बढ़ने लगता है, और वह हमें अनेक बुरे कामोंमें प्रवृत्त करता है। इसी प्रकार जब सत्त्व और रजकी अपेक्षा तमोगुण प्रबल हो जाता है, तब निद्रा, आलस्य, स्मृतिभ्रंश, इत्यादि दोष शरीरमें उत्पन्न हो जाते हैं। तात्पर्य यह है, कि इस जगत्के पदार्थोंमें सोना, लोहा, पारा इत्यादि जो अनेकता या भिन्नता दीख पड़ती है, वह प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंकीही परस्पर-न्यूनाधिकता या संघर्षका फल है। मूल प्रकृति यद्यपि एकही है, तोभी यह अनेकता या भिन्नता कैसे उत्पन्न हो जाती है - बस, इसीके विचारको 'विज्ञान' कहते हैं। इसीमें सब आधिभौतिक शास्त्रोंकाभी समावेश हो जाता है। उदाहरणार्थ, रसायनशास्त्र, विद्युच्छास्त्र, पदार्थ विज्ञानशास्त्र, ये सब विविध ज्ञान विज्ञानही हैं। साम्यावस्थामें रहनेवाली प्रकृतिको सांख्यशास्त्रमें 'अव्यक्त' अर्थात् इंद्रियोंको गोचर न होनेवाली कहा है। इस प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंकी पर- स्पर-न्यूनाधिकतासे उत्पन्न जो अनेक पदार्थ हमारी इंद्रियोंको गोचर होते हैं, अर्थात् जिन्हें हम देखते हैं, चखते हैं, सूंघते हैं, या स्पर्श करते हैं, उन्हें सांख्यशास्त्रमें 'व्यक्त' कहा है। स्मरण रहे, कि जो पदार्थ हमारी इंद्रियोंको स्पष्ट रीतिसे गोचर हो सकते हैं, वे सब 'व्यक्त' कहलाते हैं। चाहे फिर वे पदार्थ अपनी आकृतिके कारण, रूपके
१६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण, गंधके कारण, या किसी अन्य गुणके कारण व्यक्त होते हों। व्यक्त पदार्थ अनेक हैं और उनमेंसे कुछ, जैसे पत्थर, पेड़, पशु इत्यादि स्थूल कहलाते हैं; और कुछ, जैसे मन, बुद्धि, आकाश इत्यादि - यद्यपि ये इंद्रिय-गोचर अर्थात् व्यक्त हैं, तथापि - सूक्ष्म कहलाते हैं। यहाँ 'सूक्ष्म' से छोटेका मतलब नहीं है। क्योंकि आकाश यद्यपि सूक्ष्म है, तथापि वह सारे जगतमें सर्वत्र व्याप्त है। इसलिये, सूक्ष्म शब्दसे 'स्थूलके विरुद्ध' या वायुसेभी अधिक महीन, यही अर्थ लेना चाहिये। 'स्थूल' और 'सूक्ष्म' शब्दोंसे किसी वस्तुकी शरीररचनाका ज्ञान होता है; और 'व्यक्त' एवं 'अव्यक्त' शब्दोंसे हमें यह बोध होता है, कि उस वस्तुका प्रत्यक्ष ज्ञान हमें हो सकता है या नहीं। अतएव भिन्न भिन्न पदार्थोंमेंसे (चाहे वे दोनों सूक्ष्म हों तोभी) एक व्यक्त और दूसरा अव्यक्त हो सकता है। उदाहरणार्थ, यद्यपि हवा सूक्ष्म है, तथापि हमारी स्पर्शेंद्रियको उसका ज्ञान होता है, इसलिये उसे व्यक्त कहते हैं। और सब पदार्थोंकी मूल प्रकृति (या मूल द्रव्य) वायुसेभी अत्यंत सूक्ष्म है और उसका ज्ञान हमारी किसी इंद्रियको नहीं होता; इसलिये अव्यक्त कहते हैं। अब यहाँ प्रश्न हो सकता है, कि यदि इस प्रकृतिका ज्ञान किसीभी इंद्रियको नहीं होता, तो उसका अस्तित्व सिद्ध करनेके लिये प्रमाण है? इस प्रश्नका उत्तर सांख्यवादी इस प्रकार देते हैं, कि अनेक व्यक्त पदार्थोंके क्या अवलोकनसे सत्कार्यवादके अनुसार यही अनुमान सिद्ध होता है, कि इन सब पदार्थोंका मूलरूप (प्रकृति) यद्यपि इंद्रियोंको प्रत्यक्ष गोचर न हो, तथापि उसका अस्तित्व सूक्ष्म रूपसे अवश्य होनाही चाहिये (सां. का. ८)। वेदान्तियोंनेभी ब्रह्मका अस्तित्व सिद्ध करनेके लिये इसी युक्तिवादका स्वीकार किया है (कठ. ६. १२, १३ पर शांकरभाष्य देखो)। यदि हम प्रकृतिको इस प्रकार अत्यंत सूक्ष्म और अव्यक्त मान लें, तो नैयायिकोंके परमाणुकी जड़ही उखड़ जाती है। क्योंकि परमाणु यद्यपि अव्यक्त और असंख्य हो सकते हैं, तथापि प्रत्येक परमाणुके स्वतंत्र व्यक्ति या अवयव हो जानेके कारण यह प्रश्नभी शेष रह जाता है, कि दो परमाणुओंके बीचमें कौनसा पदार्थ है? इसी कारण सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त है, कि प्रकृतिमें परमाणुरूप अवयव- भेद नहीं है?। किंतु वह सदैव एकसे एक लगीं हुई - बीचमें थोड़ाभी अंतर न छोड़ती हुई - एकही समान है; अथवा यों कहिये कि वह अव्यक्त (अर्थात् इंद्रियोंको गोचर न होनेवाले) और निरवयवरूपसे निरंतर और सर्वत्र है। परब्रह्मका वर्णन करते हुए दासबोध (दा. २०.२.३) में श्रीसमर्थ रामदासस्वामी कहते हैं, "जिधर देखिये, उधरही वह अपार है, उसका किसी ओर पार नहीं है। वह एकही प्रकारका और स्वतंत्र है, उसमें द्वैत (या और कुछ) नहीं है।"* सांख्यवादियोंके 'प्रकृति' विषयमेंभी यही वर्णन उपयुक्त है। त्रिगुणात्मक प्रकृति अव्यक्त, स्वयंभू और एकही प्रकारकी है; और चारों ओर निरंतर व्याप्त है। आकाश, वायु, आदि भेद पीछेसे
- हिंदी दासबोध, पृष्ठ ४८१ (चित्रशाला, पूना)।
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हुए; और यद्यपि वे सूक्ष्म हैं, तथापि व्यक्त हैं, और इन सबकी मूल प्रकृति एकही-सी तथा सर्वव्यापी और अव्यक्त है। स्मरण रहे, कि वेदान्तियोंके 'परब्रह्म' में और सांख्य- वादियोंकी 'प्रकृति'में आकाश-पातालका अंतर है। उसका कारण यह है, कि परब्रह्म चैतन्यरूप और निर्गुण है; परंतु प्रकृति जडरूप और सत्त्वरजतमोमयी अर्थात् सगुण है। इस विषयपर अधिक विचार आगे किया जायगा। यहाँ सिर्फ़ यही विचार करना है कि, सांख्यवादियोंका मत क्या है। जब हम इस प्रकार 'सूक्ष्म' और 'स्थूल', 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' शब्दोंका अर्थ समझने लगे, तब कहना पड़ेगा कि सृष्टिके आरंभमें प्रत्येक पदार्थ सूक्ष्म और अव्यक्त प्रकृतिके रूपमें रहता है। फिर वह (चाहे सूक्ष्म हो या स्थूल हो) व्यक्त अर्थात् इंद्रियगोचर होता है, और जब प्रलय- कालमें इस व्यक्त स्वरूपका नाश होता है, तब फिर वह पदार्थ अव्यक्त प्रकृतिमें मिलकर अव्यक्त हो जाता है। गीतामेंभी यही मत दीख पड़ता है (गीता २. २८ और ८. १८)। सांख्यशास्त्रमें इस अव्यक्त प्रकृतिहीको 'अक्षर'भी कहते हैं; और प्रकृतिसे होनेवाले सब पदार्थोंको 'क्षर' कहते हैं। यहाँ 'क्षर' शब्दका अर्थ, संपूर्ण नाश नहीं है; किंतु सिर्फ़ व्यक्त स्वरूपका नाशही अपेक्षित है। प्रकृतिके औरभी अनेक नाम हैं - जैसे प्रधान, गुण-क्षोभिणी, बहुधानक, प्रसवधर्मिणी इत्यादि। सृष्टिके सब पदार्थोंका मुख्य मूल होनेके कारण उसे (प्रकृतिको) प्रधान कहते हैं। तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाका भंग स्वयं आपही करती है, इसलिये उसे गुण-क्षोभिणी कहते हैं। गुणत्रयीरूपी पदार्थभेदके बीज प्रकृतिमें हैं; इसलिये उसे बहुधानक कहते हैं। और प्रकृतिसेही सब पदार्थ उत्पन्न होते हैं, इसलिये उसे प्रसवधर्मिणीभी कहते हैं। इस प्रकृतिहीको वेदान्तशास्त्रमें 'माया' अर्थात् मायावी दिखावा कहते हैं। सृष्टिके सब पदार्थोंको 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' या 'क्षर' और 'अक्षर' इन दो विभागोंमें बाँटनेके बाद अब यह सोचना चाहिये कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें बतलाये गये आत्मा, मन, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियोंको सांख्यमतके अनुसार, किस विभाग या वर्गमें रखना चाहिये। क्षेत्र और इंद्रियाँ तो जड़ही हैं; इस कारण उनका समावेश व्यक्त पदार्थोंमें हो सकता है। परंतु मन, अहंकार, बुद्धि और विशेष करके आत्माके विषयमें क्या कहा जा सकता है? यूरोपके वर्तमान समयके प्रसिद्ध सृष्टि- शास्त्रज्ञ हेकेलने अपने ग्रंथमें लिखा है कि मन, बुद्धि, और आत्मा ये सब शरीरकेही धर्म हैं। उदाहरणार्थ, हम देखते हैं, कि जब मनुष्यका मस्तिष्क बिगड़ जाता है, तब उसकी स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है; और वह पागलभी हो जाता है। इसी प्रकार सिरमें चोट लगनेसे जब मस्तिष्कका कोई भाग संज्ञारहित हो जाता है, तबभी उस भागकी मानसिक शक्ति नष्ट हो जाती है। सारांश यह है कि मनोधर्मभी जड़ मस्तिष्ककेही गुण हैं; अतएव ये जड़ वस्तुसे कभी अलग नहीं किये जा सकते; और इसीलिये मस्तिष्कके साथ साथ मनोधर्म और आत्माको 'व्यक्त' पदार्थोंके वर्गमें शामिल करना चाहिये। यदि यह जड़वाद मान लिया जाय, तो
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१६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अंतमें केवल अव्यक्त और जड़ प्रकृतिही शेष रह जाती है। क्योंकि सब व्यक्त पदार्थ इस मूल अव्यक्त-प्रकृतिसेही बने हैं। ऐसी अवस्थामें प्रकृतिके सिवा जगतका कर्ता या उत्पादक दूसरा कोईभी नहीं हो सकता। तब तो यही कहना होगा, कि मूल प्रकृतिकी शक्ति धीरे धीरे बढ़ती गई और अंतमें उसीको चैतन्य या आत्माका स्वरूप प्राप्त हो गया। सत्कार्यवादके समान, इस मूलप्रकृतिके कुछ कायदे या नियम बने हुए हैं। और उन्हीं नियमोंके अनुसार सब जगत् और साथही साथ मनुष्यभी कैदीके समान बर्ताव किया करते है। जड़ प्रकृतिके सिवा आत्मा कोई भिन्न वस्तु हैही नहीं; तब कहना नहीं होगा, कि आत्मा न तो अविनाशी है; और न स्वतंत्र। तब मोक्ष या मुक्तिकी आवश्यकताही क्या है ? प्रत्येक मनुष्य सोचता है, कि मैं अपनी इच्छाके अनुसार अमुक काम कर लूंगा; परंतु वह सब केवल भ्रम है। प्रकृति जिस ओर खींचेगी, उसी ओर मनुष्यको झुकना पड़ेगा। अथवा कै. शंकर मोरो रानडेके अनुसार कहना चाहिये, कि "यह सारा विश्व एक बहुत बड़ा कारागार है, प्राणिमात्र कैदी हैं; और पदार्थोंके गुण-धर्म बेड़ियां हैं! इन बेड़ियोंको कोई तोड़ नहीं सकता।" इस प्रकार सारी सजीव और निर्जीव सृष्टिका व्यवहार चल रहा है-बस यही हेकेलके मतका सारांश है। उसके मतानुसार सारी सृष्टिका मूलकारण एक जड़ और अव्यक्त प्रकृतिही है। इसलिये उसने अपने सिद्धान्तको सिर्फ़ * 'अद्वैत' कहा है। परंतु यह अद्वैत जड़मूलक है, अर्थात् अकेली जड़ प्रकृतिमेंही सब बातोंका समावेश करता है; इस कारण हम इसे जड़ाद्वैत या आधिभौतिक- शास्त्राद्वैत कहेंगे। हमारे सांख्यशास्त्रकार इस जड़ाद्वैतको नहीं मानते। वे यह मानते हैं, कि मन, बुद्धि और अहंकार पंचमहाभूतात्मक जड़ प्रकृतिहीके धर्म हैं; और सांख्य- शास्त्रमेंभी यही लिखा है, कि अव्यक्त प्रकृतिसे ही बुद्धि, अहंकार इत्यादि गुण क्रमसे उत्पन्न होते जाते हैं। परंतु उनका कथन है, कि जड़ प्रकृतिसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इतनाही नहीं; वरन् जिस प्रकार कोई मनुष्य अपनेही कंधोंपर बैठ नहीं सकता, उसी प्रकार प्रकृतिको जाननेवाला या देखनेवाला जब- तक प्रकृतिसे भिन्न न हो, तबतक वह "मैं यह जानता हूँ-वह जानता हूँ" इत्यादि व्यवहारका उपयोग करही नहीं सकता। और इस जगत्के व्यवहारोंकी ओर देखनेसे तो सब लोगोंका यही अनुभव जान पड़ता है, कि "मैं जो कुछ देखता हूँ, या जानता हूँ, वह मुझसे भिन्न है।" इसलिये सांख्यशास्त्रवालोंने कहा है, कि ज्ञाता और ज्ञेय, देखनेवाला और देखनेकी वस्तु या प्रकृतिको देखनेवाला और जड़ प्रकृति, इन दोनोंको मूलताही पृथक् पृथक् मानना चाहिये (सां. का. १७)।
- हेकेलका मूल शब्द monism है। और इस विषयपर उसने स्वतंत्र ग्रंथभी लिखा है।
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६३ पिछले प्रकरणमें जिसे क्षेत्रज्ञ या आत्मा कहा है, वही यह देखनेवाला, ज्ञाता या उपभोग करनेवाला है; और इसे ही सांख्यशास्त्रमें 'पुरुष' या 'ज्ञ' (ज्ञाता) कहा गया हैं। यह ज्ञाता प्रकृतिसे भिन्न है। इस कारण निसर्गसेही प्रकृतिके तीनों ( सत्त्व, रज और तम ) गुणोंके परे रहता है। अर्थात् यह निर्विकार और निर्गुण है; और जानने या देखनेके सिवा कुछभी नहीं करता। इससे यहभी मालूम हो जाता है, कि जगत्में जो घटनाएँ होती रहती हैं, वे सब प्रकृतिकेही खेल हैं। सारांश यह है, कि प्रकृति अचेतन या जड़ है; तो पुरुष सचेतन है। प्रकृति सब काम किया करती है; तो पुरुष उदासीन और अकर्ता है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है; तो पुरुष निर्गुण है। प्रकृति अंधी है; तो पुरुष साक्षी है। इस प्रकार इस सृष्टिमें ये दो भिन्न भिन्न तत्त्व अनादिसिद्ध, स्वतंत्र और स्वयंभू हैं - यही सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त है। इस बातको ध्यानमें रक्खेही भगवद्गीतामें पहले कहा गया है, कि “प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादि उभावपि” – प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं (गीता १३. १९)। इसके बाद उनका वर्णन इस प्रकार किया है। “कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ” अर्थात् देह और इंद्रियोंका व्यापार प्रकृति करती है; और “पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते” – अर्थात् पुरुष सुखदुःखोंका उपभोग करनेके लिये, कारण है। यद्यपि गीतामेंभी प्रकृति और पुरुष अनादि माने गये हैं, तथापि यह बात ध्यानमें रखनी चाहिये, कि सांख्यवादियोंके समान, गीतामें ये दोनों तत्त्व स्वतंत्र या स्वयंभू नहीं माने गये हैं। कारण यह है, कि गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने प्रकृतिको अपनी 'माया' कहा है (गीता ७. १४; १४. ३), और पुरुषके विषयमेंभी यही कहा है, कि “ममैवांशो जीवलोके” (गीता १५. ७) अर्थात् वह मेराही अंश है। इससे मालूम हो जाता है, कि गीता सांख्यशास्त्रसेभी बढ़ गई है। परंतु अभी इस बातकी ओर ध्यान न दे कर हम देखेंगे कि सांख्यशास्त्र आगे क्या कहता है। सांख्यशास्त्रके अनुसार सृष्टिके सब पदार्थोंके तीन वर्ग होते हैं। पहला अव्यक्त (मूल प्रकृति), दूसरा व्यक्त (प्रकृतिके विकार) और तीसरा पुरुष अर्थात् (ज्ञ)। परंतु इनमेंसे प्रलयकालके समय व्यक्त पदार्थोंका स्वरूप नष्ट हो जाता है, इसलिये अब मूलमें केवल प्रकृति और पुरुष ये दोही तत्त्व शेष रह जाते हैं। ये दोनों मूलतत्त्व, सांख्यवादियोंके मतानुसार अनादि और स्वयंभू हैं। वे लोग इसलिये सांख्योंको द्वैतवादी (दो मूल तत्त्व माननेवाले) कहते हैं। वे लोग प्रकृति और पुरुषके परे ईश्वर, काल, स्वभाव या अन्य किसीभी मूल तत्त्वको नहीं मानते।* इसका कारण यह है कि सगुण ईश्वर, काल या स्वभाव, ये सब व्यक्त होनेके कारण अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले व्यक्त पदार्थोंमेंही शामिल हैं।
- ईश्वरकृष्ण कट्टर निरीश्वरवादी था। उसने अपनी सांख्यकारिका की अंतिम उपसंहारात्मक तीन आर्याओंमें कहा है, कि मूल विषयपर ७० आर्याएँ थीं।
प्रकरण ४-६: सुख-दुःख विवेक, ज्ञान-कर्म समुच्चय व क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ
१६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और, यदि ईश्वरको निर्गुण मानें, तो सत्कार्यवादानुसार निर्गुण मूलतत्त्वसे त्रिगुणा- त्मक प्रकृति कभी उत्पन्न नहीं हो सकती। इसलिये, उन्होंने यह निश्चित सिद्धान्त किया है, कि प्रकृति और पुरुषको छोड़ कर इस सृष्टिका और कोई तीसरा मूल कारण नहीं है। इस प्रकार जब उन लोगोंने दोही मूल तत्त्व निश्चित कर लिये, तब उन्होंने अपने मतके अनुसार इस बातकोभी सिद्ध कर दिया है, कि इन दोनों मूलतत्त्वोंसे सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई है। वे कहते हैं, कि यद्यपि निर्गुण पुरुष स्वयं कुछभी कर नहीं सकता, तथापि जब प्रकृतिके साथ उसका संयोग होता है, तब जिस प्रकार गाय अपने बछड़ेके लिये दूध देती है, या लोहचुंबकके पास होनेसे लोहमें आकर्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार मूल अव्यक्त प्रकृति अपने गुणों ( सूक्ष्म और स्थूल ) का व्यक्त फैलाव पुरुषके सामने फैलाने लगती है ( सां. का. ५७)। यद्यपि पुरुष सचेतन और ज्ञाता है, तथापि केवल अर्थात् निर्गुण होनेके कारण स्वयं कर्म करनेके कोई साधन उसके पास नहीं हैं; और प्रकृति यद्यपि काम करने- वाली है, तथापि जड़ या अचेतन होनेके कारण वह नही जानती, कि क्या करना परंतु कोलब्रुक और विल्सनके अनुवादके साथ बंबईमें श्रीयुत तुकाराम तात्याने जो पुस्तक मुद्रित की है, उसमें मूल विषयपर केवल ६९ आर्याएँ हैं। इसलिये विल्सन साहबने अपने अनुवादमें यह संदेह प्रकट किया है, कि ७० वीं आर्या कौनसी है। परंतु वह आर्या उनको नहीं मिली; और उनकी शंकाका समाधान नहीं हुआ। हमारा मत है, कि वह वर्तमान ६१ वीं आर्याके आगे होगी। कारण यह है, कि ६१ वीं आर्यापर गौडपादाचार्यका जो भाष्य है, वह कुछ एकही आर्यापर नहीं है; किंतु दो आर्याओपर है और यदि इस भाष्यके प्रतीक पदोंको लेकर आर्या बनाई जाय तो वह इस प्रकार होगी :- कारणमीश्वरमेके ब्रुवते कालं परे स्वभावं वा । प्रजाः कथं निर्गुणतो व्यक्तः कालः स्वभावश्च ॥ यह आर्या पिछले और अगले संदर्भ ( अर्थ या भाव ) के अनुसारभी है। इस आर्यामें निरीश्वरमतका प्रतिपादन है, इसलिये जान पड़ता है, कि किसीने इसे पीछेसे निकाल डाला होगा। परंतु इस आर्याका शोधन करनेवाला मनुष्य इसका भाष्यभी निकाल डालना भूल गया। इसलिये अब हम इस आर्याका ठीक ठीक पता लगा सकते हैं; और इसीसे उस मनुष्यको धन्यवादही देना चाहिये। श्वेताश्वेत- रोपनिषद्के छठे अध्यायके पहले मंत्रमें प्रकट होता है, कि प्राचीन समयमें कुछ लोग स्वभाव और कालको - और वेदान्ती तो उसकेभी आगे बढ़कर ईश्वरको - जगत्का मूलकारण मानते थे। वह मंत्र यह है :- स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैषः महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ परंतु ईश्वरकृष्णने उपर्युक्त आर्याको वर्तमान ६१ वीं आर्याके बाद सिर्फ़ यह बतलानेके लिये रखा है, कि तीनों मूलकारण (अर्थात् स्वभाव, काल और ईश्वर) सांख्यवादियोंको मान्य नहीं हैं!
चाहिये। इस प्रकार लँगड़े और अंधेकी वह जोड़ी है और जैसे अंधेके कंधेपर लँगड़ा बैठे; और वे दोनों एक दूसरेकी सहायतासे मार्ग चलने लगें; वैसेही अचेतन प्रकृति और सचेतन पुरुषका संयोग हो जानेपर सृष्टिके सब कार्य आरंभ हो जाते हैं (सां. का. २१)। और जिस प्रकार नाटककी रंगभूमिपर प्रेक्षकोंके मनोरंजनार्थ एकही नटी कभी एक तो कभी दूसराही स्वाँग बनाकर नाचती रहती है, उसी प्रकार पुरुषके लाभके लिये (पुरुषार्थके लिये), यद्यपि पुरुष कुछभी पारितोषिक नहीं देता; तोभी यह प्रकृति सत्त्व-रज-तम गुणोंकी न्यूनाधिकतासे अनेक रूप धारण करके उसके सामने लगातार नाचती रहती है (सां. का. ५९)। प्रकृतिके इस नाचको देखकर - मोहसे भूल जानेके कारण, या वृथाभिमानके कारण - जबतक पुरुष इस प्रकृतिके कर्तृत्वको स्वयं अपनाही कर्तृत्व मानता रहता है; और जबतक वह सुखदुःखके पाशमें स्वयं अपनेको फँसा रखता है, तबतक उसे मोक्ष या मुक्तिकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती (गीता ३. २७)। परंतु जिस समय पुरुषको यह ज्ञान हो जाय, कि त्रिगुणात्मक प्रकृति भिन्न है और मैं भिन्न हूँ; उस समय वह मुक्तही है (गीता १३. २९, ३०; १४. २०)। क्योंकि, यथार्थमें पुरुष न तो कर्ता है और न बँधाही है। वह स्वतंत्र है और निसर्गतः केवल अर्थात् अकर्ता है। जो कुछ होता है वह सब प्रकृतिहीका खेल है। यहाँतक कि मन और बुद्धिभी प्रकृतिहीकेही विकार हैं। इसलिये बुद्धिको जो ज्ञान होता है, वहभी प्रकृतिके कार्यकाही फल है। यह ज्ञान तीन प्रकारका होता है; जैसे: सात्त्विक, राजस और तामस (गीता १८. २०-२२)। जब बुद्धिको सात्त्विक ज्ञान प्राप्त होता है, तब पुरुषको यह मालूम होने लगता है, कि मैं प्रकृतिसे भिन्न हूँ। सत्त्व-रज-तमोगुण प्रकृतिहीकेही धर्म हैं; पुरुषके नहीं। पुरुष निर्गुण है; और त्रिगुणात्मक प्रकृति उसका दर्पण है (मभा. शां. २०४. ८) जब यह दर्पण स्वच्छ या निर्मल हो जाता है अर्थात् जब बुद्धि - जो प्रकृतिका विकार है - सात्त्विक हो जाती है, तब इस निर्मल दर्पणमें पुरुषको अपना सात्त्विक या सच्चा स्वरूप दीखने लगता है; और उसे यह बोध हो जाता है, कि मैं प्रकृतिसे भिन्न हूँ। उस समय यह प्रकृति लज्जित हो कर उस पुरुषके सामने नाचना, खेलना या जाल फैलाना बंद कर देती है। जब यह अवस्था प्राप्त हो जाती है, तब पुरुष सब पाशों या जालोंसे मुक्त हो कर अपने स्वाभाविक कैवल्यपदको पहुँच जाता है। 'कैवल्य' शब्दका अर्थ है केवलता, अकेलापन, या प्रकृतिके साथ संयोग न होना। पुरुषकी इस नैसर्गिक या स्वाभाविक स्थितिकोही सांख्यशास्त्रमें मोक्ष (मुक्ति या छुटकारा) कहते हैं। इस अवस्थाके विषयमें सांख्यवादियोंने एक बहुतही नाजुक प्रश्नका विचार उपस्थित किया है। उनका प्रश्न है, कि पुरुष प्रकृतिको छोड़ देता है, या प्रकृति पुरुषको छोड़ देती है? कुछ लोगोंकी समझमें यह प्रश्न वैसेही निरर्थक प्रतीत होगा, जैसे यह प्रश्न कि दुल्हेके लिये दुल्हन लंबी है या दुल्हनके लिये दुल्हा ठिंगना है। क्योंकि जब दो वस्तु-
१६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ओंका एक दूसरेसे वियोग होता है, तब हम देखते हैं कि दोनो एक दूसरेको छोड़ देती हैं। इसलिये ऐसे प्रश्नका विचार करनेसे कुछ लाभ नहीं है, कि किसने किसको छोड़ दिया। परंतु कुछ अधिक सोचनेपर मालूम हो जायगा, कि सांख्य- वादियोंका उक्त प्रश्न उनकी दृष्टिसे अयोग्य नहीं है। सांख्यशास्त्रके अनुसार 'पुरुष' निर्गुण, अकर्ता और उदासीन है। इसलिये तत्त्वदृष्टिसे 'छोड़ना' या 'पकड़ना' क्रियाओंका कर्ता पुरुष नहीं हो सकता (गीता १३. ३१, ३२)। इसलिये सांख्य- वादी कहते हैं, कि प्रकृतिही 'पुरुष'को छोड़ दिया करती है। अर्थात् वही 'पुरुष'से अपना छुटकारा या मुक्ति कर लेती है। क्योंकि कर्तृत्व 'प्रकृति'हीका धर्म है। (सां. का. ६२ और गीता १३. १४) सारांश यह है, कि मुक्ति नामकी ऐसी कोई निराली अवस्था नहीं है, जो 'पुरुष'को कहीं बाहरसे प्राप्त हो जाती हो। अथवा यह कहिये, कि वह 'पुरुष'की मूल और स्वाभाविक स्थितिसे कोई भिन्न स्थितिभी नहीं है। प्रकृति और पुरुषमें वैसाही संबंध है, जैसा कि घासके बाहरी छिलके और अंदरके गूदेमें रहता है; या जैसा पानी और उसमें रहनेवाली मछलीमें। सामान्य पुरुष प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हो जाते हैं; और यह स्वाभाविक भिन्नता पहचान नहीं सकते। इसी कारण वे संसार-चक्रमें फँसे रहते हैं। परंतु जो इस भिन्नताको पहचान लेता है, वह मुक्तही है। महाभारत (मभा. शां. १९४. ५८; २४८. ११; और ३०६-३०८) में लिखा है, कि ऐसेही पुरुषको 'ज्ञाता' या 'बुद्ध' और 'कृतकृत्य' कहते हैं। गीताके वचन "एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात्" (गीता १५. २०) में बुद्धिमान् शब्दकाभी यही अर्थ है। अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे मोक्षका सच्चा स्वरूपभी यही है (वे. सू. शां. भा. १. १. ४)। परंतु सांख्यवादियोंकी अपेक्षा अद्वैत वेदान्तियोंका विशेष कथन यह है, कि आत्माहीमें परब्रह्मस्वरूप है; और जब वह अपने मूलस्वरूपको अर्थात् परब्रह्मको पहचान लेता है, तब वही उसकी मुक्ति है। वे लोग यह कारण नहीं बतलाते, कि पुरुष निसर्गतः 'केवल' है। सांख्य और वेदान्तका यह भेद अगले प्रकरणमें स्पष्ट करके बतलाया जायगा। यद्यपि अद्वैत वेदान्तियोंको सांख्यवादियोंका यह मत मान्य है, कि पुरुष (आत्मा) निर्गुण, उदासीन और अकर्ता है; तथापि वे लोग सांख्यशास्त्रकी 'पुरुष' संबंधी इस दूसरी कल्पनाको नहीं मानते, कि एकही प्रकृतिको देखनेवाले (साक्षी) स्वतंत्र पुरुष मूलमेंही असंख्य हैं (गीता ८. ४; १३. २०-२२; मभा. शां. ३५१; और वे. सू. शां. भा. २, १. १)। वेदान्तियोंका कहना है, कि उपाधिभेदके कारण सब जीव भिन्न भिन्न मालूम होते हैं, परंतु वस्तुतः सब ब्रह्मही है। सांख्यवादियों- का मत है, कि जब हम देखते हैं, कि प्रत्येक मनुष्यका जन्म, मृत्यु और जीवन अलग अलग हैं; और जब इस जगत्में हम यह भेद पाते हैं कि कोई सुखी है तो कोई दुःखी है; तब मानना पड़ता है, कि प्रत्येक आत्मा या पुरुष मूलसेही भिन्न है, और उनकी संख्याभी अनंत है। (सां. का. १८) केवल प्रकृति और पुरुषही
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सब सृष्टिके मूलतत्त्व हैं सही; परंतु उनमेंसे पुरुष शब्दमें सांख्यवादियोंके मता- नुसार "असंख्य पुरुषोंके समुदाय" का समावेश होता है। इन असंख्य पुरुषोंके और त्रिगुणात्मक प्रकृतिके संयोगसे सृष्टिका सब व्यवहार हो रहा है। प्रत्येक पुरुष और प्रकृतिका जब संयोग होता है, तब प्रकृति अपने गुणोंका जाला उस पुरुषके सामने फैलाती है; और पुरुष उसका उपभोग करता रहता है। ऐसा होते होते जिस पुरुषके चारों ओरकी प्रकृतिके खेल सात्त्विक हो जाते हैं, उस पुरुषकोही (सब पुरुषोंको नहीं) सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है; और उस पुरुषके लिये ही प्रकृतिके सब खेल बंद हो जाते हैं; एवं वह अपने मूल कैवल्यपदको पहुँच जाता है। परंतु यद्यपि उस पुरुषको मोक्ष मिल गया, तोभी शेष सब पुरुषोंको संसारमें फँसेही रहना पड़ता है। कदाचित् कोई यह समझे, कि ज्योंहि पुरुष इस प्रकार कैवल्यपदको पहुँच जाता है, त्योंही वह एकदम प्रकृतिके जालेसे छूट जाता होगा। परंतु सांख्यमतके अनुसार यह समझ गलत है। देह और इंद्रियरूपी प्रकृतिके विचार उस मनुष्यकी मृत्युतक उसे नहीं छोड़ते। सांख्यवादी इसका यह कारण बतलाते हैं, कि "जिस प्रकार कुम्हारका पहिया - ऊपरका घड़ा बन कर निकाल लिया जानेपरभी - पूर्वसंस्कारके कारण कुछ देर तक घूमताही रहता है, उसी प्रकार कैवल्यपदकी प्राप्ति हो जाने परभी इस मनुष्यका शरीर कुछ समयतक शेष रहता है" (सां. का. ६७)। तथापि उस शरीरसे, कैवल्यपदपर आरूढ़ होनेवाले पुरुषको कुछभी अडचन या सुखदुःखकी बाधा नहीं होती। क्योंकि, यह शरीर जड़ प्रकृतिका विकार होनेके कारण स्वयं जड़ही है। इसलिये इसे सुखदुःख दोनों समानही हैं; और यदि कहा जाय, कि पुरुषको सुखदुःखकी बाधा होती हो, तो यहभी ठीक नहीं। क्योंकि उसे मालूम है, कि मैं प्रकृतिके व्यवहारमें भिन्न हूँ, सब कर्तृत्व प्रकृतिका है, मेरा नहीं। ऐसी अवस्थामें प्रकृतिके मनमाने खेल हुआ करते हैं, परंतु उसे सुखदुःख नहीं होता; और वह सदा उदासीनही रहता है। जो पुरुष प्रकृतिके तीनों गुणोंसे छूट कर यह ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता, वह जन्म- मरणसे छुट्टी नहीं पा सकता। फिर चाहे वह सत्त्वगुणके उत्कर्षके कारण देवयोनिमें जन्म ले, या रजोगुणके कारण मानवयोनिमें जन्म ले, या तमोगुणकी प्रबलताके कारण पशु-कोटिमें जन्म ले। (सां. का. ४४. ५४) जन्ममरणरूपी चक्रके ये फल प्रत्येक मनुष्यको उसके चारों ओरकी प्रकृति अर्थात् उसकी बुद्धिके सत्त्व-रज-तम गुणोंके उत्कर्षापकर्षके कारण प्राप्त हुआ करते हैं। गीतामेंभी कहा है, कि "ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः" - सात्त्विक वृत्तिके पुरुष स्वर्ग जाते हैं; और तामस पुरुषोंको अधोगति प्राप्त होती है (गीता १४. १८)। परंतु ये स्वर्गादि फल अनित्य हैं। जिसे जन्म-मरणसे छुट्टी पाना है, या सांख्योंकी परिभाषाके अनुसार जिसे प्रकृतिसे अपनी भिन्नता अर्थात् कैवल्य चिरस्थायी रखना है, उसे त्रिगुणातीत हो कर विरक्त (संन्यस्त) होनेके सिवा दूसरा मार्ग नहीं है। कपिलाचार्यको यह
१६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वैराग्य और ज्ञान जन्मसेही प्राप्त हुआ था; परंतु यह स्थिति सब लोगोंको जन्महीसे प्राप्त नहीं हो सकती । इसलिये तत्त्व-विवेकरूप साधनसे प्रकृति और पुरुषकी भिन्नताको पहचान कर प्रत्येक पुरुषको अपनी बुद्धि शुद्ध कर लेनेका यत्न करना चाहिये । ऐसे प्रयत्नोंसे जब बुद्धि सात्त्विकही जाती है, तो फिर उसीमें ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य आदि गुण उत्पन्न होते हैं; और मनुष्यको अंतमें कैवल्यपद प्राप्त हो जाता है । जिस वस्तुको पानेकी मनुष्य इच्छा करता है, उसे प्राप्त कर लेनेके योग्य सामर्थ्यकोही यहाँ ऐश्वर्य कहा है । सांख्यमतके अनुसार धर्मकी गणना सात्त्विक गुणमेंही की जाती है। परंतु कपिलाचार्यने अंतमें यह भेद किया है, कि केवल धर्मसे स्वर्गही प्राप्त होता है; और ज्ञान तथा वैराग्य (संन्यास) से मोक्ष या कैवल्यपद प्राप्त होता है; तथा पुरुषके दुःखोंकी आत्यंतिक निवृत्ति हो जाती है । जब देहेंद्रियों और बुद्धिमें पहले सत्त्वगुणका उत्कर्ष होता है; और जब धीरे धीरे उन्नति होते होते अंतमें पुरुषको यह ज्ञान हो जाता है, कि मैं त्रिगुणात्मक प्रकृतिसे भिन्न हूँ तब उसे सांख्यवादी 'त्रिगुणातीत' अर्थात् सत्त्व-रज-तम गुणोंके परे पहुँचा हुआ कहते हैं । इस त्रिगुणातीत अवस्थामें सत्त्व-रज-तममेंसे कोईभी गुण शेष नहीं रहता । इसलिये कुछ सूक्ष्म विचार करनेसे मानना पड़ता हैं, कि यह त्रिगुणातीत अवस्था सात्त्विक, राजस और तामस इन तीनों अवस्थाओंसे भिन्न है । इसी अभिप्रायसे भागवतमें भक्तिके तामस, राजस और सात्त्विक भेद करनेके पश्चात् एक और चौथा भेद किया गया है। इन तीनों गुणोंके पार हो जानेवाला पुरुष, निर्हेतुक और अभेदभावने जो भक्ति करता है उसे 'निर्गुण भक्ति' कहते हैं' (भाग. ३. २९. ७-१४) । परंतु सात्त्विक, गजस और तामस इन तीन वर्गोंकी अपेक्षा वर्गीकरणके तत्त्वोंको व्यर्थ अधिक बढ़ाना उचित नहीं है। इसलिये सांख्य वादी कहते हैं, कि सत्त्वगुणके अत्यंत उत्कर्षसेही अंतमें त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त हुआ करती है; और इसलिये वे इस अवस्थाकी गणना सात्त्विक वर्गमेंही करते हैं। गीतामेंभी यह मत स्वीकार किया गया है। उदाहरणार्थ गीतामें कहा है, कि “जिस अभेदात्मक ज्ञानसे यह मालूम हो, कि सब कुछ एकही हैं उमीको सात्त्विक ज्ञान कहते हैं” (गीता १८. २०) । इसके सिवा मत्त्वगुणके वर्णनके बाद गीतामें १४ वें अध्यायके अंतमें, त्रिगुणातीत अवस्थाका वर्णन है। परंतु भगवद्- गीताको यह प्रकृति और पुरुषवाला द्वैत मान्य नहीं है। इसलिये ध्यान रखना चाहिये, कि गीतामें 'प्रकृति', 'पुरुष', 'त्रिगुणातीत' इत्यादि सांख्यवादियोंके पारि- भाषिक शब्दोंका उपयोग कुछ भिन्न अर्थमें किया गया है; अथवा यह कहिये, कि गीतामें सांख्यवादियोंके द्वैतपर अद्वैत परब्रह्मकी 'छाप' सर्वत्र लगी हुई है। उदा- हरणार्थ, सांख्यवादियोंके प्रकृति-पुरुष भेदकाही गीताके १३ वें अध्यायमें वर्णन है। (गीता १३. १९-३४) परंतु वहाँ 'प्रकृति' और 'पुरुष' शब्दोंका उपयोग क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अर्थमें हुआ है। इसी प्रकार १४ वें अध्यायमें त्रिगुणातीत अवस्थाका
कपिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६९ वर्णन (गीता १४. २२-२७) भी उस सिद्ध पुरुषके विषयमें किया गया है; जो त्रिगुणात्मक मायाके फंदेसे छूटकर उस परमात्माको पहचानता है, जो कि प्रकृति और पुरुषकेभी परे है। यह वर्णन सांख्यवादियोंके उस सिद्धान्तके अनुसार नहीं है; जिसके द्वारा वे यह प्रतिपादन करते हैं, कि 'प्रकृति' और 'पुरुष', दोनों पृथक् पृथक् तत्त्व हैं; और पुरुषका 'कैवल्य' ही त्रिगुणातीत अवस्था है। यह भेद आगे अध्यात्म-प्रकरणमें अच्छी तरह समझा दिया गया है। परंतु गीतामें यद्यपि अध्यात्म पक्षहो प्रतिपादित किया गया है, तथापि आध्यात्मिक तत्त्वोंका वर्णन करते समय भगवान् श्रीकृष्णने सांख्यपरिभाषाका और युक्तिवादका हर जगह उपयोग किया है। इसलिये संभव है, कि गीता पढ़ते समय कोई यह समझ बैठे, कि गीताको सांख्यवादियोंकेही सिद्धान्त ग्राह्य हैं। इस भ्रमको हटानेके लियेही सांख्यशास्त्र और गीताके तत्सदृश सिद्धान्तोंका भेद फिरसे यहाँ बतलाया गया है। वेदान्तसूत्रोंके भाष्यमें श्रीशंकराचार्यने कहा है, कि उपनिषदोंके इस अद्वैत सिद्धान्तको न छोड़- कर-कि "प्रकृति और पुरुषके परे इस जगत्का परब्रह्मरूपी एकही मूलभूत तत्त्व है; और उसीसे प्रकृति, पुरुष आदि सब सृष्टिकी उत्पत्ति हुई है" - सांख्य- शास्त्रके शेष सिद्धान्त हमें अग्राह्य नहीं हैं। (वे. सू. शां. भा. २. १. ३) यही बात गीताके उपपादनके विषयमेंभी चरितार्थ होती है।
आठवाँ प्रकरण विश्वकी रचना और संहार गुणा गुणेषु जायन्ते तत्रैव निविशन्ति च । *
- महाभारत, शांति. ३०५.२३ इस बातका विवेचन हो चुका, कि कापिलसांख्यके अनुसार संसारमें जो दो स्वतंत्र मूलतत्त्व - प्रकृति और पुरुष - हैं, उनका स्वरूप क्या है, और जब इन दोनोंका संयोगही निमित्त कारण हो जाता है; तब पुरुषके सामने प्रकृति अपने गुणोंका जाला कैसे फैलाया करती है; और उस जालेसे हमको अपना छुटकारा किस प्रकार कर लेना चाहिये । परंतु अबतक इसका स्पष्टीकरण नहीं किया गया, कि प्रकृति अपने इस जालेको ( अथवा खेल, संसार या ज्ञानेश्वर महाराजके शब्दोंमें 'प्रकृतिकी टकसाल 'को ) किस क्रमसे पुरुषके सामने फैलाया करती है; और उसका लय किस प्रकार हुआ करता है। प्रकृतिके इस व्यापारहीको “विश्वकी रचना और संहार” कहते हैं; और इसी विषयका विवेचन प्रस्तुत प्रकरणमें किया जायगा। सांख्यमतके अनुसार प्रकृतिने इस जगत् या सृष्टिको असंख्य पुरुषोंके लाभके लियेही निर्माण किया है। 'दासबोध'में श्रीसमर्थ रामदासस्वामीनेभी प्रकृतिसे सारे ब्रह्मांडके निर्माण होनेका बहुत अच्छा वर्णन किया है। उसी वर्णनसे “विश्वकी रचना और संहार” शब्द इस प्रकरणमें लिये गये हैं। इसी प्रकार, भगवद्गीताके सातवें और आठवें अध्यायोंमें मुख्यतः इसी विषयका प्रतिपादन किया गया है। और, ग्यारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने श्रीकृष्णसे यह जो प्रार्थना की है, कि "भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया” (गीता ११.२) - भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलय (जो आपने) विस्तारपूर्वक (बतलाया, उसको) मैंने सुना। अब मुझे अपना विश्वरूप प्रत्यक्ष दिखलाकर कृतार्थ कीजिये - उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि विश्वकी रचना और संहार, क्षर-अक्षर-विचारहीका एक मुख्य भाग है। 'ज्ञान' वह है, जिससे यह बात मालूम हो जाती है, कि सृष्टिके अनेक (नाना) व्यक्त पदार्थोंमें एकही अव्यक्त मूलद्रव्य है (गीता १८.२०); और 'विज्ञान' उसे कहते हैं, जिससे यह मालूम हो, कि एकही मूलभूत अव्यक्त द्रव्यसे अनेक भिन्न भिन्न पदार्थ किस प्रकार अलग अलग निर्मित हुए (गीता
- “गुणोंसेही गुणोंकी उत्पत्ति होती है और उन्हींमें उनका लय हो जाता है।”
विश्वकी रचना और संहार १७१
१३.३०) है; और इसमें न केवल क्षर-अक्षर-विचारहीका समावेश होता है, किंतु क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञान और अध्यात्म विषयोंकाभी समावेश हो जाता है। भगवद्गीताके मतानुसार प्रकृति अपना संसारशकट चलाने या सृष्टिका कार्य चलानेके लिये स्वतंत्र नहीं है; किंतु उसे यह काम ईश्वरकी इच्छा के अनुसार करना पड़ता है (गीता ९.१०)। परंतु, पहले बतलाया जा चुका है, कि कपिलाचार्यने प्रकृतिको स्वतंत्र माना है। सांख्यशास्त्रके अनुसार, प्रकृतिके संसारका आरंभ होनेके लिये 'पुरुषका संयोग' इतनाही निमित्त कारण बस हो जाता है। इस विषयमें प्रकृति और किसीकी अपेक्षा नहीं करती। सांख्योंका यह कथन है, कि ज्योंही पुरुष और प्रकृतिका संयोग होता है, त्योंही उसकी टकसाल जारी हो जाती है और जिस प्रकार वसंत ऋतुमें वृक्षोंमें नये पत्ते दीख पड़ते हैं; और क्रमशः फूल और फल लगते हैं (मभा. शां. २३१.७३; मनु. १.३०), उसी प्रकार प्रकृतिकी मूल साम्यावस्था नष्ट हो जाती है; और उसके गुणोंका विस्तार होने लगता है। इसके विरुद्ध वेदसंहिता, उपनिषद् और स्मृतिग्रंथोंमें प्रकृतिको मूल न मान कर परब्रह्मको मूल माना है; और परब्रह्मसे सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके विषयमें भिन्न भिन्न वर्णन किये गये हैं—"हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्" —पहले हिरण्यगर्भ (ऋ. १०.१२१.१) और इस हिरण्यगर्भसे अथवा सत्यसे सब सृष्टि उत्पन्न हुई (ऋ. १०.७२; १०.१९०); अथवा पहले पानी उत्पन्न हुआ (ऋ. १०.८२.६; तै. ब्रा. १.१.३.७; ऐ. उ. १.१.२) और फिर उससे सृष्टि उत्पन्न हुई। अथवा इस पानीमें एक अंडा उत्पन्न हुआ और उससे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ; ब्रह्मासे अथवा उस मूल अंडेसेही सारा जगत् उत्पन्न हुआ; (मनु. १.८-१३; छां. ३.१९) अथवा वही ब्रह्मा (पुरुष) आधे हिस्सेसे स्त्री हो गया (बृ. १.४, ३; मनु १.३२); अथवा पानी उत्पन्न होनेके पहलेही पुरुष था (कठ. ४.६) अथवा परब्रह्मसे पहले तेज, पानी और पृथिवी (अन्न) येही तीन तत्त्व उत्पन्न हुए और पश्चात् उनके मिश्रणसे सब पदार्थ बने (छां. ६.२-६)। यद्यपि उक्त वर्णनोंमें बहुत भिन्नता है; तथापि वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २.३.१-१५) अन्तिम निर्णय यह किया गया है, कि आत्मरूपी मूलब्रह्मसे ही आकाश आदि पंच- महाभूत क्रमशः उत्पन्न हुए हैं (तै. उ. २.१)। प्रकृति, महत् आदि तत्त्वोंकाभी उल्लेख (कठ. ३.११), मैत्रायणी (६.१०), श्वेताश्वतर (४.१०; ६.१६), आदि उपनिषदोंमें स्पष्ट रीतिसे किया गया है। इससे दीख पड़ेगा, कि यद्यपि वेदान्तमतवाले प्रकृतिको स्वतंत्र न मानते हों, तथापि जब एक बार शुद्ध ब्रह्महीमें मायात्मक प्रकृतिरूप विकार दृग्गोचर होने लगता है, तब आगे सृष्टिके उत्पत्तिक्रमके संबंधमें उनका और सांख्यमतवालोंका अंतमें मेल हो गया था; और इसी कारण महाभारतमें कहा है, कि "इतिहास, पुराण, अर्थशास्त्र आदिमें जो कुछ ज्ञान भरा है, वह सब सांख्योंसे प्राप्त हुआ है" (शां. ३०१.१०८, १०९)। उसका यह मतलब