श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५१ जा सकता है। पहला यह, कि शायद उपनिषद् (वेदान्त) और सांख्य दोनोंकी वृद्धि, दो सगे भाइयोंके समान, साथही साथ हुई हो; और उपनिषदोंमें जो सिद्धान्त सांख्योंके मतोंके समान दीख पड़ते हैं, उन्हें उपनिषत्कारोंने स्वतंत्र रीतिसे खोज निकाला हो। दूसरा यह, कि कदाचित् कुछ सिद्धान्त सांख्यशास्त्रसे लेकर वेदान्तियोंने उन्हें वेदान्तके अनुकूल स्वरूप दे दिया हो। तीसरा यह कि प्राचीन वेदान्तके सिद्धान्तोंमेंही कपिलाचार्यने अपने मतके अनुसार कुछ परिवर्तन और सुधार करके सांख्यशास्त्रकी उपपत्ति कर दी हो। इन तीनोंमेंसे तीसरी बातही अधिक विश्वसनीय ज्ञात होती है; क्योंकि, यद्यपि वेदान्त और सांख्य दोनों बहुत प्राचीन हैं, तथापि उनमें वेदान्त या उपनिषद् सांख्यसेभी अधिक प्राचीन ( श्रौत ) है। अस्तु; यदि पहले हम न्याय और सांख्यके सिद्धान्तोंको अच्छी तरह समझ लें तो फिर वेदान्तके - विशेषतः गीता-प्रतिपादित वेदान्तके - तत्त्व जल्दी समझमें आ जायेंगें । इसलिये पहले हमें इस बातका विचार करना चाहिये, कि इन दो स्मार्त शास्त्रोंका, क्षर-अक्षर-सृष्टिकी रचनाके विषयमें क्या मत है। बहुतेरे लोक न्यायशास्त्रका यही उपयोग समझते हैं, कि किसी विवक्षित अथवा गृहीत बातसे तर्कके द्वारा कौन-कौन-से अनुमान निकाले जावें और कैसे ? और यह निर्णय कैसे किया जावें, कि इन अनुमानोंमेंसे कौन-से सही हैं और कौन-से गलत हैं। परंतु यह भूल है। अनुमानादि प्रमाणखंड न्यायशास्त्रका एक भाग है सही; पर क्यों ? परंतु यही उसका प्रधान विषय नहीं है, तो प्रमाणोंके अतिरिक्त, सृष्टिकी अनेक वस्तुओंका यानी प्रमेय पदार्थोंका वर्गीकरण करके नीचेके वर्गसे ऊपरके वर्गकी ओर चढ़ते जानेसे सृष्टिके सब पदार्थोंके मूल वर्ग कितने हैं, उनके गुण-धर्म क्या हैं, उनसे अन्य पदार्थोंकी उत्पत्ति कैसे हुई है, और ये बातें किस प्रकार सिद्ध हो सकती हैं, इत्यादि अनेक प्रश्नोंकाभी विचार न्यायशास्त्रमें किया गया है। अतः यही कहना उचित होगा, कि यह शास्त्र केवल अनुमानखंडका विचार करनेके लिये नहीं; वरन् उक्त प्रश्नोंका विचार करनेहीके लिये निर्माण किया गया है। कणादके न्यायसूत्रोंका आरंभ और आगेकी रचनाभी इसी प्रकारकी है। कणादके अनुयायियोंको कणाद कहते हैं। इन दोनोंका कहना है, कि जगतका मूल कारण परमाणुही है। परमाणुके विषयमें कणादकी और पश्चिमी भौतिक- शास्त्रज्ञोंकी व्याख्या एक-सी समानही है। किसीभी पदार्थका विभाग करते करते अंतमें जब विभाग नहीं हो सकता, तब उसे परमाणु (आधिपरम + अणु) कहना चाहिये। जैसे जैसे ये परमाणु एकत्र होते जाते हैं, वैसे वैसे संयोगके कारण उनमें नये नये गुण उत्पन्न होते हैं; और भिन्न भिन्न पदार्थ बनते जाते हैं। मन और शरीरकेभी परमाणु होते हैं; और जब वे एकत्र होते हैं तब चैतन्यकी उत्पत्ति होती है। पृथ्वी, जल, तेज और वायुके परमाणु स्वभावहीसे पृथक् पृथक् हैं। पृथ्वीके मूलपरमाणुमें चार गुण ( रूप, रस, गंध, स्पर्श ) हैं;