श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ प्रकरण कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । * — गीता १३. १९ पिछले प्रकरणमें यह बात बतला दी गई है, कि शरीर और शरीरके स्वामी या अधिष्ठाता – क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ – के विचारके साथही साथ दृश्य सृष्टि और उसके मूलतत्त्व – क्षर और अक्षर – काभी विचार करनेके पश्चात् फिर आत्माके स्वरूपका निर्णय करना पड़ता है। इस क्षर-अक्षर सृष्टिका योग्य रीतिसे वर्णन करनेवाले तीन शास्त्र हैं। पहला न्यायशास्त्र और दूसरा कापिलसांख्य- शास्त्र । परंतु इन दोनों शास्त्रोंके सिद्धान्तोंको अपूर्ण ठहरा कर वेदान्तशास्त्रने ब्रह्म- स्वरूपका निर्णय एक तीसरीही रीतिसे किया है। इस कारण वेदान्तप्रतिपादित उपपत्तिका विचार करनेके पहले हमें न्याय और सांख्यशास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर विचार करना चाहिये । बादरायणाचार्यके वेदान्तसूत्रोंमें इसी पद्धतिसे काम लिया गया है; और न्याय तथा सांख्यके मतोंका दूसरे अध्यायमें खंडन किया गया है। यद्यपि इस विषयका यहाँपर विस्तृत वर्णन नहीं कर सकते, तथापि हमने उन बातोंका उल्लेख इस प्रकरणमें और अगले प्रकरणमें स्पष्ट कर दिया है, जिनकी भगवद्गीताका रहस्य समझनेमें आवश्यकता है। नैयायिकोंके सिद्धान्तोंकी अपेक्षा सांख्यवादियोंके सिद्धान्त अधिक महत्त्वके हैं। इसका कारण यह है, कि कणादके न्यायमतोंको किसीभी प्रमुख वेदान्ती ने स्वीकार नहीं किया है, परंतु कापिलसांख्यशास्त्रके बहुतसे सिद्धान्तोंका उल्लेख मनु आदिके स्मृति- ग्रंथोंमें तथा गीतामेंभी पाया जाता है। यही बात बादरायणाचार्यनेभी (वे. सू. २. १. १२ और २. २. १७) कही है। इस कारण पाठकोंको सांख्यके सिद्धान्तोंका परिचय प्रथमही होना चाहिये । इसमें संदेह नहीं, कि वेदान्तमें सांख्यशास्त्रके बहुतसे सिद्धान्त पाये जाते हैं; परंतु स्मरण रहे, कि सांख्य और वेदान्तके अंतिम सिद्धान्त एक दूसरेसे बहुत भिन्न हैं। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है, कि वेदान्त और सांख्यके जो सिद्धान्त आपसमें मिलते जुलते हैं, उन्हें पहले किसने निकाला था – वेदान्तियोंने या सांख्यवादियोंने ? परंतु इस ग्रंथमे इतने गहन विचारमें प्रवेश करनेकी आवश्यकता नहीं। फिरभी इस प्रश्नका उत्तर तीन प्रकारसे दिया
- "प्रकृति और पुरुष दोनोंको अनादि जानो।"