श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १४९ या पिंडमें) कौन-सा मूलतत्त्व (क्षेत्रज्ञ या आत्मा) है; और क्षर-अक्षर-विचारसे बाह्य सृष्टिके अर्थात् ब्रह्मांडके मूल तत्त्वका ज्ञान होता है। जब इस प्रकार पिंड और ब्रह्मांडके मूल तत्त्वोंका पहले पृथक् पृथक् निर्णय हो जाता है, (आगे अधिक विचार किया जाएगा), वेदान्तशास्त्रमें यह सिद्धान्त किया जाता है,* कि ये दोनों तत्त्व एकरूप अर्थात् एकही हैं-यानी "जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमें है। यही चराचर सृष्टिका अंतिम सत्य है।" पश्चिमी देशोंमेंभी इन बातोंकी चर्चा की गई है; औट कांट जैसे कुछ पश्चिमी तत्त्वज्ञोंके सिद्धान्त हमारे वेदान्तशास्त्रके सिद्धान्तोंसे बहुत कुछ मिलते-जुलतेभी हैं-जब हम इस बातपर ध्यान देते हैं, और जब हम यहभी देखते हैं, कि वर्तमान समयकी नाईं प्राचीन कालमें आधि- भौतिक शास्त्रकी उन्नति नहीं हुई थी; तब ऐसी अवस्थामें जिन लोगोंने अपनी अंतर्दृष्टिसे वेदान्तके अपूर्व सिद्धान्तोंको ढूंढ निकाला, उनके अलौकिक बुद्धिवैभवके बारेमें आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। और केवल आश्चर्यही नहीं होना चाहिये, किंतु हमें उनपर उचित अभिमानभी होना चाहिये।
- हमारे शास्त्रोंके क्षर-अक्षर-विचार और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारके वर्गीकरणसे ग्रीनसाहब परिचित न थे। तथापि, उन्होंने अपने Prolegomena to Ethics ग्रंथके आरंभमें अध्यात्मका जो विवेचन किया है, उसमें पहले Spiritual Principle in Nature और Spiritual Principle in Man इन दोनों तत्त्वोंका विचार किया है और फिर उनकी एकता दिखाई है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें Psychology आदि मानस- शास्त्रोंका, और क्षर-अक्षर-विचारमें Physics, Metaphysics आदि शास्त्रोंका समावेश होता हैँ। इस बातको पश्चिमी पंडितभी मानते हैं, कि उक्त सब शास्त्रोंका विचार कर लेनेपरही आत्मस्वरूपका निर्णय करना पड़ता है।