श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सकती। क्योंकि यह नियम नहीं है, कि सब पदार्थोंको एकही श्रेणी या वर्ग - जैसे ज्ञेय - में शामिल कर देना चाहिये। सब पदार्थोंके दो वर्ग या विभाग होते हैं; जैसे ज्ञाता और ज्ञेय - अर्थात् जाननेवाला और जाननेकी वस्तु। और जब कोई वस्तु दूसरे वर्ग (ज्ञेय) में शामिल नहीं होती, तब उसका समावेश पहले वर्ग (ज्ञाता) में हो जाता है। एवं उसका अस्तित्वभी ज्ञेय वस्तुके समानही पूर्णतया सिद्ध होता है। इतनाही नहीं; किंतु यहभी कहा जा सकता है, कि संघातके परे जो आत्म- तत्त्व है, वह स्वयं ज्ञाता है। इसलिये उसको होनेवाले ज्ञानका यदि वह स्वयं विषय न हो, तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। इसी अभिप्रायसे बृहदारण्यकोपनिषदमें याज्ञवल्क्यने कहा है, "अरे! जो सब बातोंको जानता है, उसको जाननेवाला दूसरा कहाँसे आ सकता है?" - विज्ञातारमरे केन विजानीयात् (बृ. २. ४. १४)। अतएव, अंतमें यही सिद्धान्त कहना पड़ता है, कि इस चेतना-विशिष्ट सजीव शरीर अर्थात् क्षेत्रमें एक ऐसी शक्ति रहती है, जो हाथ-पैर आदि इंद्रियोंसे लेकर प्राण, चेतना, मन और बुद्धि जैसे परतंत्र एवं एकदेशीय नौकरोंकेभी परे है, और जो उन सबके व्यापारोंकी एकता करती है, और उनके कार्योंकी दिशा बतलाती है; अथवा जो उनके कर्मोंकी नित्य साक्षी रहकर उनसे भिन्न अधिक व्यापक और समर्थ है। सांख्य और वेदान्तशास्त्रोंको यह सिद्धान्त मान्य है; और अर्वाचीन समयमें जर्मन तत्त्वज्ञ कांटनेभी कहा है, कि बुद्धिके व्यापारोंका सूक्ष्म परीक्षण करनेसे यही तत्त्व निष्पन्न होता है। मन, बुद्धि, अहंकार और चेतना, ये सब शरीरके अर्थात् क्षेत्रके गुण अथवा अवयव हैं। इनका प्रवर्तक उससे भिन्न, स्वतंत्र और उसके परे है - "यो बुद्धेः परतस्तु सः" (गीता ३. ४२)। सांख्य- शास्त्रमें इसीका नाम पुरुष है। वेदान्ती इसीको क्षेत्रज्ञ अर्थात् क्षेत्रको जाननेवाला आत्मा कहते हैं। "मैं हूँ" यह प्रत्येक मनुष्यको होनेवाली उसकी प्रतीतिही उस आत्माके अस्तित्वका सर्वोत्तम प्रमाण है (वे. सू. शां. भा. ३. ३. ५३, ५४)। किसीको यह नहीं मालूम होता, कि "मैं नहीं हूँ"! इतनाही नहीं; किंतु मुखसे "मैं नहीं हूँ" शब्दोंका उच्चारण करते समयभी "नहीं हूँ" इस क्रियापदके कर्ताका - अर्थात् 'मैं'का - अथवा आत्माका अस्तित्व वह प्रत्यक्ष रीतिसे मानाही करता है। इस प्रकार 'मैं' इस अहंकारयुक्त सगुण रूपसे शरीरमें, स्वयं अपनेहीको व्यक्त होनेवाले आत्मतत्त्वके अर्थात् क्षेत्रज्ञके असली, शुद्ध और गुणविरहित स्वरूपका यथाशक्ति निर्णय करनेके लियेही वेदान्तशास्त्रकी उत्पत्ति हुई है। (गीता १३. ४)। तथापि यह निर्णय केवल शरीर अर्थात् क्षेत्रकाही विचार करके नहीं किया जाता। पहले कहा जा चुका है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विचारके अतिरिक्त यहभी सोचना पड़ता है, कि बाह्यसृष्टि अर्थात् ब्रह्मांडका विचार करनेसे कौन-सा तत्त्व निष्पन्न होता है। ब्रह्मांडके इस विचारकाही नाम 'क्षर-अक्षर-विचार' है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारसे इस बातका निर्णय होता है, कि क्षेत्रमें (अर्थात् शरीर