श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं हो जाती । अतएव यह नहीं कहा जा सकता, कि केवल संघात या समुच्चयसेही कर्तृत्व उत्पन्न होता है। कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि क्षेत्रके सब व्यापार योंही - सिड़ी सरीखे नहीं होते । किंतु उनमें कोई विशिष्ट दिशा, उद्देश्य या हेतु रहता है। तो फिर इस क्षेत्ररूपी कारखानेमें काम करनेवाले मन, बुद्धि आदि सब नौकरोंको इस विशिष्ट दिशा या उद्देश्यकी ओर कौन प्रवृत्त करता है ? संघातका अर्थ केवल समूह है। सब पदार्थोंको एकत्र करके उनके जोड़नेके लिये उनमें धागा डालना पड़ता है, नहीं तो वे फिर कभी-न-कभी अलग हो जायेंगे। अब हमें सोचना चाहिये, कि यह धागा कौन-सा है ? यह बात नही है, कि गीताको संघात मान्य न हो; परंतु उसकी गणना क्षेत्रहीमें की जाती है ( गीता १३. ६) । संघातसे इस बातका निर्णय नहीं होता, कि क्षेत्रका स्वामी अर्थात् क्षेत्रज्ञ कौन है। कुछ लोग समते हैं, कि समुच्चयमें कोई नया गुण उत्पन्न हो जाता है। परंतु पहले तो यह मतही सत्य नहीं; क्योंकि तत्त्वज्ञोंने पूर्ण विचार करके सिद्धान्त कर दिया है, कि जो पहले किसीभी रूपमें अस्तित्वमें नहीं था, वह इस जगतमें नया उत्पन्न नहीं होता ( गीता २. १६) । यदि हम इस सिद्धान्तको क्षणभरके लिये एक ओर धर दें, तोभी यह प्रश्न सहजही उपस्थित हो जाता है, कि संघातमें उत्पन्न होने- वाला यह नया गुणही क्षेत्रका स्वामी क्यों न माना जाय। इसपर कई अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंका कथन है, कि द्रव्य और उसके गुण भिन्न भिन्न नहीं रह सकते; गुणके लिये किसी-न-किसी अधिष्ठानकी आवश्यकता होती है। इसी कारण समुच्चयोत्पन्न गुणके बदले हम समुच्चयहीको उस क्षेत्रका स्वामी मानते हैं। ठीक है; परंतु व्यवहारमेंभी 'अग्नि' शब्दके बदले लकड़ी, 'विद्युत्'के बदले मेघ, अथवा पृथ्वीकी 'आकर्षण-शक्ति'के बदले पृथ्वीही क्यों नहीं कहा जाता ? यदि यह बात निर्विवाद सिद्ध है, कि क्षेत्रके सब व्यापार व्यवस्थापूर्वक और उचित रीतिसे मिल-जुलकर चलते रहनेके लिये - मन और बुद्धिके सिवा - किसी भिन्न शक्तिका अस्तित्व अत्यंत आवश्यक है। और यदि यह बात सच हो, कि उस शक्तिका अधिष्ठान अबतक हमारे लिये अगम्य है; अथवा उस शक्ति या अधिष्ठानका पूर्ण-स्वरूप ठीक ठीक नहीं बतलाया जा सकता है; तो यह कहना न्यायोचित कैसे हो सकता है, कि वह शक्ति हैही नहीं ? जैसे कोईभी मनुष्य अपनेही कंधेपर बैठ नहीं सकता, वैसेही यहभी नहीं कहा जा सकता, कि संघातसंबंधी ज्ञान स्वयं संघातही प्राप्त कर लेता है। अतएव तर्ककी दृष्टिसेभी यही दृढ़ अनुमान किया जाता है, कि देहेंद्रिय आदि संघातके व्यापार जिसके उपभोग लाभके लिये हुआ करते हैं, वह संघातसे भिन्नही है। यह तत्त्व - जो कि संघातसे भिन्न है - स्वयं सब बातोंको जानता है। इसलिये यह बात सच है, कि सृष्टिके अन्य पदार्थोंके सदृश्य यह स्वयं अपनेही लिये 'ज्ञेय' अर्थात् गोचर हो नहीं सकता। परंतु उससे इसके अस्तित्वमें कुछ बाधा नहीं पड़