भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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१४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अतिरिक्त और कुछ करते धरते नहीं बनता; और कर सकना संभव भी नहीं है। यह सच है, कि मन चिंतन करता है और बुद्धि निश्चय करती है। परंतु इससे यह निर्णय नहीं होता कि इन कामोंको बुद्धि और मन किनके लिये करते हैं; अथवा भिन्न भिन्न समयपर मन और बुद्धिके जो पृथक् पृथक् व्यापार हुआ करते हैं, उनका एकत्र ज्ञान होनेके लिये जो एकता करनी पड़ती है, वह एकता या एकीकरण कौन करता है; तथा उसीके अनुसार आगे सब इंद्रियोंको अपना अपना व्यापार तदनुकूल करनेकी दिशा कौन दिखाता है? यह नहीं कहा जा सकता, कि यह सब काम मनुष्यका जड़ शरीरही किया करता है। इसका कारण यह है, कि जब शरीरकी चेतना अथवा हलचल करनेके सब व्यापार नष्ट हो जाते हैं, तब जड़ शरीरके बने रहने परभी वह इन कामोंको नहीं कर सकता; और जड़ शरीरके घटकावयव जैसे मांस, स्नायु इत्यादि तो अन्नके परिणाम हमेशा घिस जीर्ण होकर नित्य नये हो जाया करते हैं। इसलिये, “कल मैंने जिस अमुक एक बात देखी थी, वही मैं आज दूसरी देख रहा हूँ” इस प्रकारकी एकत्व-बुद्धिके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता, कि वह नित्य बदलने- वाले जड़ शरीरकाही धर्म है। अच्छा; अब जड़ देह छोड़कर चेतनाकोही स्वामी मानें, तो यह आपत्ति दीख पड़ती है, कि गाढ निद्रामें प्राणादि वायुके श्वासोच्छ्वास प्रभृति व्यापार अथवा रुधिराभिसरण आदि व्यापार — अर्थात् चेतना — के स्थिर रहते हुएभी, 'मैं'का ज्ञान नहीं रहता (बृ. २. १. १५-१८)। अतएव यह सिद्ध होता है, कि चेतना — अथवा प्राण प्रभृतिका व्यापार — भी जड़ पदार्थमें उत्पन्न एक प्रकारका विशिष्ट गुण है और वह इंद्रियोंके सब व्यापारोंकी एकता करनेवाली मूल शक्ति या स्वामी नहीं है (कठ. ५. ५)। 'मेरा' और 'पराया' इन संबंधकारक शब्दोंसे केवल अहंकाररूपी गुणका बोध होता है; परंतु इस बातका निर्णय नहीं होता, कि 'अहं' अर्थात् 'मैं' कौन हूँ। यदि इस 'मैं' या 'अहं'को केवल भ्रम मान लें, तो प्रत्येककी प्रतीति अथवा अनुभव वैसा नहीं है; और इस अनुभवको छोड़ कर किसी अन्य बातकी कल्पना करना मानों श्रीसमर्थ रामदास स्वामीके निम्न वचनोंकी सार्थकताही कर दिखाना है — “प्रतीतिके बिना कोईभी कथन अच्छा नहीं लगता। वह कथन ऐसा होता है, जैसे कुत्ता मूंह फैला कर रो गया हो!” (दा. ९. ५. १५)। उक्त अनुभवके विपरीत किसी बातको मान लेनेपरभी इंद्रियोंके व्यापारोंकी एकताकी उपपत्तिका कुछभी पता नहीं लगता। कई लोंगोंकी राय है, कि 'मैं' कोई भिन्न पदार्थ नहीं है, 'क्षेत्र' शब्दमें जिन — मन, बुद्धि, चेतना, जड़ देह आदि — तत्त्वोंका समावेश किया जाता है, उन सबके संघात या समुच्चयकोही 'मैं' कहना चाहिये। पर यह बात हम प्रत्यक्ष देखा करते हैं, कि लकड़ीपर लकड़ी रख देनेसेही संदूक नहीं बन जाता; अथवा किसी घड़ीके सब कील-पुर्जोंको एक स्थानमें रख देनेसेही उनमें गति उत्पन्न