श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुखदुःखविवेक ११५ अर्थात् "जिस (वैराग्य) बुद्धिको मनमें धारण करके मैं सब विषयोंका सेवन करता हूँ, उसका हाल सुनो। नाकसे मैं 'अपने लिये' वास नहीं लेता (आँखोंसे मैं 'अपने लिये' नहीं देखता, इत्यादि), और मनकाभी उपयोग मैं आत्माके लिये अर्थात् अपने लाभके लिये नहीं करता। अतएव मेरी नाक (आँख इत्यादि) और मन मेरे वशमें हैं, अर्थात् मैंने उन्हें जीत लिया है।" गीताके वचनकाभी (गीता ३. ६, ७) यही तात्पर्य है, कि जो मनुष्य केवल इंद्रियोंकी वृत्तियोंको तो रोक देता है, और मनसे विषयोंका चिंतन करता रहता है, वह पूरा ढोंगी है; और जो मनुष्य मनोनिग्रहपूर्वक काम्य-बुद्धिको जीत कर, सब मनोवृत्तियोंको लोकसंग्रहके लिये अपना अपना काम करने देता है, वही श्रेष्ठ है। बाह्य जगत् या इंद्रियोंके व्यापार हमारे उत्पन्न किये हुए नहीं हैं, वे स्वभावसिद्ध हैं। हम देखते हैं, जब कोई संन्यासी बहुत भूखा होता है तब उसको चाहे वह कितनाही निग्रही हो - भीख माँगनेके लिये कहीं बाहर जानाही पड़ता है (गीता ३. ३३); या बहुत देरतक एक जगह बैठे रहनेसे ऊबकर वह उठ खड़ा हो जाता है। तात्पर्य यह है, कि निग्रह चाहे जितना हो; परंतु इंद्रियोंके जो स्वभावसिद्ध व्यापार हैं, वे कभी नहीं छूटते। और यदि यह बात सच है, तो इंद्रियोंकी वृत्तियों तथा सब कर्मोंको और सब प्रकारकी इच्छाओं या असंतोषको नष्ट करनेके दुराग्रहमें न पड़ना (गीता २. ४७; १८. ५९), एवं मनोनिग्रहपूर्वक फलाशा छोड़ कर सुख-दुःखोंको एक बराबर समझना (गीता २. १८), तथा निष्काम-बुद्धिसे लोकहितके लिये कर्मोंका शास्त्रोक्त रीतिसे करते रहनाही, श्रेष्ठ तथा आदर्श मार्ग है। इसीलिये - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ इस श्लोकमें (गीता २. ४७) श्रीभगवान् अर्जुनको पहले यह बतलाते हैं, कि तू इस कर्मभूमिमें पैदा हुआ है, इसलिये "तुझे कर्म करनेकाही अधिकार है"; परंतु इस बातकोभी ध्यानमें रख, कि तेरा यह अधिकार केवल (कर्तव्य) कर्म करने- तकही सीमित है। इस 'एव' पदका अर्थ है 'केवल'; जिससे यह सहज विदित होता है, कि मनुष्यका अधिकार कर्मके सिवा अन्य बातोंमें - अर्थात् कर्मफलके विषयमें नहीं है। यह महत्त्वपूर्ण बात केवल अनुमानपरही अवलंबित नहीं रख दी है; क्योंकि दूसरे चरणमें भगवान्ने स्पष्ट शब्दोंमें पुनः कह दिया है, कि "तेरा अधिकार कर्मफलके विषयमें कुछभी नहीं है।" अर्थात् किसी कर्मका फल मिलना - न मिलना तेरे अधिकारकी बात नहीं है। वह सृष्टिके कर्मविपाकपर या ईश्वरपर अवलंबित है। फिर जिस बातमें हमारा अधिकारही नहीं है उसके विषयमें आशा - करना कि वह अमुक प्रकार हो - केवल मूर्खताका लक्षण है; परंतु यह तीसरी बातभी अनुमानपर अवलंबित नहीं है। तीसरे चरणमें कहा गया है, कि "इसलिये तू कर्म-