भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 956 में से

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पृष्ठ 159

११२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बाह्य वस्तुस्वरूपभी मालूम हो जाता है; और मनका विशेष ध्यान सुख-दुःखोंके केवल आंतरिक अनुभवपर है। बस, इस बातको ध्यानमें रखनेसे सुख-दुःखोंके उक्त दोनों लक्षणोंमें कुछ विरोध नहीं पड़ेगा। इस प्रकार जब सुख-दुःखोंके लिये इंद्रियोंका अवलंब अनावश्यक हो गया, तब तो यही कहना चाहिये कि :- भेषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिंतयेत्। "मनसे दुःखोंका चिंतन न करनाही दुःखनिवारणकी अचूक ओषधि है" (महा. शां. २०५. २); और इसी तरह मनको कठोर बनाकर सत्य तथा धर्मके लिये सुखपूर्वक अग्निमें जलकर भस्म हो जानेवालोंके अनेक उदाहरण इतिहासमेंभी मिलते हैं। इसलिये गीताका कथन है, कि हमें जो कुछ करना है, उसे मनोनिग्रहके साथ और उसकी फलाशाको छोड़ कर तथा सुख-दुःखोंमें समभाव रखकर करना चाहिये। ऐसा करनेसे न तो हमें कर्माचरणका त्याग करना पड़ेगा और न हमें उसके दुःखकी बाधाही होगी। फलाशा-त्यागका यह अर्थ नहीं है, कि हमें जो फल मिले उसे छोड़ दें; अथवा ऐसी इच्छा रखें, कि वह फल कभी किसीको न मिले। इसी तरह फलाशामें और कर्म करनेकी केवल इच्छा, आशा, हेतु या फलके लिये किसी बातकी योजना करनेमेंभी बहुत अंतर है। केवल हाथपैर हिलानेकी इच्छा होनेमें और अमुक मनुष्यको पकड़नेके लिये या किसी मनुष्यको लात मारनेके लिये हाथ- पैर हिलानेकी इच्छामें बहुत भेद है। पहली इच्छा केवल कर्म करनेकीही है, उसमें दूसरा कोई हेतु नहीं होता; और यदि यह इच्छा छोड़ दी जाय, तो कर्मका करनाही रुक जायगा। इस इच्छाके अतिरिक्त प्रत्येक मनुष्यको इस बातका ज्ञानभी होना चाहिये, कि हरएक कर्मका कुछ-न-कुछ फल अथवा परिणाम अवश्यही होगा। बल्कि ऐसे ज्ञानके साथ साथ उसे इस बातकी इच्छा अवश्य होनी चाहिये, कि मैं अमुक फलप्राप्तिके लिये अमुक प्रकारकी योजना करकेही अमुक कर्म करना चाहता हूँ। नहीं तो उसके सभी कार्य पागलोंके-से निरर्थक सिद्ध होंगे। ये सब इच्छाएँ, हेतु, योजनाएँ, परिणाममें दुःखकारक नहीं होती; और, गीताका यह कथनभी नहीं है, कि कोई उनको छोड़ दें। परंतु स्मरण रहे, कि उस स्थितिसे बहुत आगे बढ़ कर जब मनुष्यके मनमें यह भाव होता है, कि "मैं जो कर्म करता हूँ, मेरे उस कर्मका अमुक फल मुझे अवश्यही मिलना चाहिये।" अर्थात् जब कर्मफलके विषयमें, कर्ताकी बुद्धिमें ममत्वकी यह आसक्ति, अभिमान, अभिनिवेश, आग्रह या इच्छा उत्पन्न हो जाती है और मन उसीसे ग्रस्त हो जाता है और जब इच्छानुसार फल मिलनेमें बाधा होने लगती है, तभी दुःख-परंपराका प्रारंभ हुआ करता है। यदि यह बाधा अनिवार्य अथवा दैवकृत हो, तो केवल निराशामात्र होती है, परंतु वह कहीं मनुष्यकृत हुई तो फिर क्रोध या द्वेषभी उत्पन्न हो जाता है, जिससे कुकर्म होनेपर मर मिटना पड़ता है। कर्मके परिणामके विषयमें जो यह ममत्वयुक्त आसक्ति

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