श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुखदुःखविवेक ११३ होती है, उसीको 'फलाशा', 'संग', 'अहंकार-बुद्धि' और 'काम' कहते हैं; और यह बतलानेके लिये, कि संसारकी दुःखपरंपरा यहींसे शुरू होती है, गीताके दूसरे अध्यायमें कहा गया है, कि विषय-संगसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे मोह और अंतमें मनुष्यका नाशभी होता है (गीता २. ६२, ६३) । अब यह बात सिद्ध हो गई, कि जड़ सृष्टिके अचेतन कर्म स्वयं दुःखके मूल कारण नहीं हैं, किंतु मनुष्य उनमें जो फलाशा, संग, काम या इच्छा लगाये रहता है, वही यथार्थमें दुःखका मूल है। ऐसे दुःखोंसे बचे रहनेका महज उपाय यही है, कि सिर्फ विषयकी फलाशा, संग, काम या आसक्तिको मनोनिग्रहद्वारा छोड़ देना चाहिये। संन्यासमार्गियोंके कथनानुसार सब विषयों और कर्मोंहीको, अथवा सब प्रकारकी इच्छाओंहीको, छोड़ देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसी लिये गीता (गीता २. ६४) में कहा है, कि जो मनुष्य फलाशाको छोड़कर यथाप्राप्त विषयोंका निष्काम और निस्संग-बुद्धिसे सेवन करता है, वही सच्चा स्थितप्रज्ञ है। संसारके कर्मव्यवहार कभी रुक नहीं सकते। मनुष्य चाहे इस संसारमें रहे या न रहे; परंतु प्रकृति अपने गुणधर्मानुसार सदैव अपना व्यापार करतीही रहेगी। जड़ प्रकृतिको न तो उसमें कुछ सुख है, और न दुःख। मनुष्य व्यर्थही अपने आपको महत्त्व देकरही प्रकृतिके व्यवहारोंमें आसक्त हो जाता है, इसीलिये वह सुख-दुःखका भागी हुआ करता है। यदि वह इस आसक्त- बुद्धिको छोड़ दे और अपने सब व्यवहार इस भावनासे करने लगे, कि "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" (गीता ३. २८) - प्रकृतिके गुणधर्मानुसारही सब व्यापार हो रहे हैं- तो असंतापजन्य कोईभी दुःख उसको होही नहीं सकता। इसलिये यह समझकर, कि प्रकृति तो अपना व्यापार करतीही रहती है; उसके लिये संसारको दुःखप्रधान मानकर रोते नहीं रहना चाहिये; और न उसको त्यागनेहीका प्रयत्न करना चाहिये। महाभारत (मभा. शां. २५. २६) में व्यासजीने युधिष्ठिरको यह उपदेश दिया है, कि :- सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाऽप्रियम् । प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ "चाहे सुख हो या दुःख, प्रिय हो अथवा अप्रिय, जो जिस समय जैसे प्राप्त हो वह उस समय वैसेही, मनको निराश न करते हुए (अर्थात् नाराज बनकर अपने कर्तव्यको न छोड़ते हुए) सेवन करते रहो !" इस उपदेशका महत्त्व पूर्णतया तभी ज्ञात हो सकता है, जब कि हम इस बातको ध्यानमें रखें, कि संसारमें अनेक कर्तव्य ऐसे हैं, जिन्हें दुःख सह करभी करना पड़ता है। भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञका यह लक्षण बतलाया है, कि "यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्" (गीता गी. र. ८