भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

सुखदुःखविवेक ११३ होती है, उसीको 'फलाशा', 'संग', 'अहंकार-बुद्धि' और 'काम' कहते हैं; और यह बतलानेके लिये, कि संसारकी दुःखपरंपरा यहींसे शुरू होती है, गीताके दूसरे अध्यायमें कहा गया है, कि विषय-संगसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे मोह और अंतमें मनुष्यका नाशभी होता है (गीता २. ६२, ६३) । अब यह बात सिद्ध हो गई, कि जड़ सृष्टिके अचेतन कर्म स्वयं दुःखके मूल कारण नहीं हैं, किंतु मनुष्य उनमें जो फलाशा, संग, काम या इच्छा लगाये रहता है, वही यथार्थमें दुःखका मूल है। ऐसे दुःखोंसे बचे रहनेका महज उपाय यही है, कि सिर्फ विषयकी फलाशा, संग, काम या आसक्तिको मनोनिग्रहद्वारा छोड़ देना चाहिये। संन्यासमार्गियोंके कथनानुसार सब विषयों और कर्मोंहीको, अथवा सब प्रकारकी इच्छाओंहीको, छोड़ देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसी लिये गीता (गीता २. ६४) में कहा है, कि जो मनुष्य फलाशाको छोड़कर यथाप्राप्त विषयोंका निष्काम और निस्संग-बुद्धिसे सेवन करता है, वही सच्चा स्थितप्रज्ञ है। संसारके कर्मव्यवहार कभी रुक नहीं सकते। मनुष्य चाहे इस संसारमें रहे या न रहे; परंतु प्रकृति अपने गुणधर्मानुसार सदैव अपना व्यापार करतीही रहेगी। जड़ प्रकृतिको न तो उसमें कुछ सुख है, और न दुःख। मनुष्य व्यर्थही अपने आपको महत्त्व देकरही प्रकृतिके व्यवहारोंमें आसक्त हो जाता है, इसीलिये वह सुख-दुःखका भागी हुआ करता है। यदि वह इस आसक्त- बुद्धिको छोड़ दे और अपने सब व्यवहार इस भावनासे करने लगे, कि "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" (गीता ३. २८) - प्रकृतिके गुणधर्मानुसारही सब व्यापार हो रहे हैं- तो असंतापजन्य कोईभी दुःख उसको होही नहीं सकता। इसलिये यह समझकर, कि प्रकृति तो अपना व्यापार करतीही रहती है; उसके लिये संसारको दुःखप्रधान मानकर रोते नहीं रहना चाहिये; और न उसको त्यागनेहीका प्रयत्न करना चाहिये। महाभारत (मभा. शां. २५. २६) में व्यासजीने युधिष्ठिरको यह उपदेश दिया है, कि :- सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाऽप्रियम् । प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ "चाहे सुख हो या दुःख, प्रिय हो अथवा अप्रिय, जो जिस समय जैसे प्राप्त हो वह उस समय वैसेही, मनको निराश न करते हुए (अर्थात् नाराज बनकर अपने कर्तव्यको न छोड़ते हुए) सेवन करते रहो !" इस उपदेशका महत्त्व पूर्णतया तभी ज्ञात हो सकता है, जब कि हम इस बातको ध्यानमें रखें, कि संसारमें अनेक कर्तव्य ऐसे हैं, जिन्हें दुःख सह करभी करना पड़ता है। भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञका यह लक्षण बतलाया है, कि "यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्" (गीता गी. र. ८

११४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र २. ५७) - अर्थात् शुभ अथवा अशुभ जो कुछ आ पड़े, उसके बारेमें जो सदा निष्काम या निस्संग रहता है, और जो उसका अभिनंदन या द्वेष कुछभी नहीं करता, वही स्थितप्रज्ञ है। फिर पाँचवे अध्याय (गीता ५. २०) में कहा है, कि "न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्" - सुख पा कर फूल न जाना चाहिये। और दुःखमें कातरभी न होना चाहिये। एवं दूसरे अध्याय (गीता २. १४, १५) में इन सुख-दुःखोंको निष्काम-बुद्धिसे भोगनेका उपदेश किया है। भगवान् श्रीकृष्णने उसी उपदेशको बार बार दुहराया है (गीता ५. ९; १३. ९)। वेदान्तशास्त्रकी परिभाषामें उसीको "सब कर्मोंको ब्रह्मार्पण करना" कहते हैं। और भक्ति- मार्गमें 'ब्रह्मार्पण'के बदले 'श्रीकृष्णार्पण' शब्दकी योजना की जाती है। बस यही, गीतार्थ का सारांश है। कर्म चाहे किसीभी प्रकारका हो, परंतु कर्म करनेकी इच्छा और अपने उद्योगको बिना छोड़े तथा फल-प्राप्तिकी आसक्ति न रखकर (अर्थात् निस्संग- बुद्धिसे) उसे करते रहना चाहिये; और साथ-ही-साथ हम भविष्यमें परिणाम- स्वरूप मिलनेवाले सुख-दुःखोंकोभी एकही समान भोगनेके लिये तैयार रहना चाहिये। ऐसा करनेसे अमर्यादित तृष्णादि और असंतोषजनित दुष्परिणामोंसे तो हम बचेंगेही; परंतु दूसरा लाभ यह होगा, कि तृष्णा या असंतोषके साथ साथ कर्मकोभी त्याग देनेसे जीवनकेही नष्ट हो जानेका जो प्रसंग आ सकता है, वह भी नहीं आ सकेगा; और हमारी मनोवृत्तियाँ शुद्ध होकर प्राणिमात्रके लिये हितप्रद हो जायेंगी। इसमें संदेह नहीं, कि इस तरह फलाशा छोड़नेके लियेभी इंद्रियोंका और मनका वैराग्यसे पूरा दमन करना पड़ता है; परंतु स्मरण रहे, कि इंद्रियोंको वशमें करके स्वार्थके बदले वैराग्यसे तथा निष्काम- बुद्धिसे लोकसंग्रहके लिये उन्हें अपने अपने व्यापार करने देना कुछ और बात है; और संन्यास-मार्गानुसार तृष्णाको मारनेके लिये इंद्रियोंके सभी व्यापारोंको अर्थात् कर्मोंको आग्रहपूर्वक समूल नष्ट कर डालना बिलकुलही भिन्न बात है। इन दोनोंमें ज़मीन-आसमानका अंतर है। गीतामें जिस वैराग्यका और जिस इंद्रिय- निग्रहका उपदेश किया गया है, वह पहले प्रकारका है; दूसरे प्रकारका नहीं; और उसी तरह अनुगीता (मभा. अश्व. ३२. १७-२३) में जनक-ब्राह्मण-संवादमें राजा जनक ब्राह्मणरूपधारी धर्मसे कहते हैं कि :- शृणु बुद्धिं च यां ज्ञात्वा सर्वत्र विषयो मम । नाहमात्मार्थमिच्छामि गन्धान् घ्राणगतानपि ॥ . . . . . . . . . . नाहमात्मार्थमिच्छामि मनो नित्यं मनोन्तरे । मनो मे निर्जितं तस्मात् वशे तिष्ठति सर्वदा ॥

सुखदुःखविवेक ११५ अर्थात् "जिस (वैराग्य) बुद्धिको मनमें धारण करके मैं सब विषयोंका सेवन करता हूँ, उसका हाल सुनो। नाकसे मैं 'अपने लिये' वास नहीं लेता (आँखोंसे मैं 'अपने लिये' नहीं देखता, इत्यादि), और मनकाभी उपयोग मैं आत्माके लिये अर्थात् अपने लाभके लिये नहीं करता। अतएव मेरी नाक (आँख इत्यादि) और मन मेरे वशमें हैं, अर्थात् मैंने उन्हें जीत लिया है।" गीताके वचनकाभी (गीता ३. ६, ७) यही तात्पर्य है, कि जो मनुष्य केवल इंद्रियोंकी वृत्तियोंको तो रोक देता है, और मनसे विषयोंका चिंतन करता रहता है, वह पूरा ढोंगी है; और जो मनुष्य मनोनिग्रहपूर्वक काम्य-बुद्धिको जीत कर, सब मनोवृत्तियोंको लोकसंग्रहके लिये अपना अपना काम करने देता है, वही श्रेष्ठ है। बाह्य जगत् या इंद्रियोंके व्यापार हमारे उत्पन्न किये हुए नहीं हैं, वे स्वभावसिद्ध हैं। हम देखते हैं, जब कोई संन्यासी बहुत भूखा होता है तब उसको चाहे वह कितनाही निग्रही हो - भीख माँगनेके लिये कहीं बाहर जानाही पड़ता है (गीता ३. ३३); या बहुत देरतक एक जगह बैठे रहनेसे ऊबकर वह उठ खड़ा हो जाता है। तात्पर्य यह है, कि निग्रह चाहे जितना हो; परंतु इंद्रियोंके जो स्वभावसिद्ध व्यापार हैं, वे कभी नहीं छूटते। और यदि यह बात सच है, तो इंद्रियोंकी वृत्तियों तथा सब कर्मोंको और सब प्रकारकी इच्छाओं या असंतोषको नष्ट करनेके दुराग्रहमें न पड़ना (गीता २. ४७; १८. ५९), एवं मनोनिग्रहपूर्वक फलाशा छोड़ कर सुख-दुःखोंको एक बराबर समझना (गीता २. १८), तथा निष्काम-बुद्धिसे लोकहितके लिये कर्मोंका शास्त्रोक्त रीतिसे करते रहनाही, श्रेष्ठ तथा आदर्श मार्ग है। इसीलिये - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ इस श्लोकमें (गीता २. ४७) श्रीभगवान् अर्जुनको पहले यह बतलाते हैं, कि तू इस कर्मभूमिमें पैदा हुआ है, इसलिये "तुझे कर्म करनेकाही अधिकार है"; परंतु इस बातकोभी ध्यानमें रख, कि तेरा यह अधिकार केवल (कर्तव्य) कर्म करने- तकही सीमित है। इस 'एव' पदका अर्थ है 'केवल'; जिससे यह सहज विदित होता है, कि मनुष्यका अधिकार कर्मके सिवा अन्य बातोंमें - अर्थात् कर्मफलके विषयमें नहीं है। यह महत्त्वपूर्ण बात केवल अनुमानपरही अवलंबित नहीं रख दी है; क्योंकि दूसरे चरणमें भगवान्‌ने स्पष्ट शब्दोंमें पुनः कह दिया है, कि "तेरा अधिकार कर्मफलके विषयमें कुछभी नहीं है।" अर्थात् किसी कर्मका फल मिलना - न मिलना तेरे अधिकारकी बात नहीं है। वह सृष्टिके कर्मविपाकपर या ईश्वरपर अवलंबित है। फिर जिस बातमें हमारा अधिकारही नहीं है उसके विषयमें आशा - करना कि वह अमुक प्रकार हो - केवल मूर्खताका लक्षण है; परंतु यह तीसरी बातभी अनुमानपर अवलंबित नहीं है। तीसरे चरणमें कहा गया है, कि "इसलिये तू कर्म-

११६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फलकी लालचसे किसीभी कामको मत कर।" क्योंकि, कर्मविपाकके अनुसार तेरे कर्मोंका जो फल प्राप्त होगा वह अवश्य होगाही। तेरी इच्छासे उसमें कुछ न्यूना- धिकता नहीं हो सकती; और उसके देरीसे या जल्दीसे मिल जानेकी संभावना नहीं है। परंतु तेरे लालचीपनसे तो तुझे केवल व्यर्थ दुःखही मिलेगा। अब यहाँ कोई-विशेषतः संन्यासमार्गी पुरुष-प्रश्न करेंगे, कि कर्म करके फलाशा छोड़नेके झगड़ेमें पड़नेकी अपेक्षा कर्माचरणकोही छोड़ देना क्या अच्छा नहीं होगा? इस- लिये भगवान्‌ने अंतमें अपना निश्चित मतभी बतला दिया है, कि "कर्म न करनेका (अकर्मणि) तू हठ मत कर। तेरा जो अधिकार है उसके अनुसार-परंतु फलाशा छोड़कर-कर्म करता जा।" कर्मयोगकी दृष्टिसे ये सब सिद्धान्त इतने महत्त्वपूर्ण हैं, कि उक्त श्लोकके चारों चरणोंको यदि हम कर्मयोगशास्त्र या गीता-धर्मके चतुःसूत्री कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह मालूम हो गया, कि इस संसारमें सुख-दुःख हमेशा क्रमसे मिला करते हैं; और यहाँ सुख की अपेक्षा दुःखकी मात्रा अधिक है। ऐसी अवस्थामेंभी जब यह सिद्धान्त बतलाया जाता है, कि सांसारिक कर्मोंको छोड़ नहीं देना चाहिये; तब कुछ लोगोंकी यह समझ हो सकती है, कि दुःखकी आत्यंतिक निवृत्ति करने और अत्यंत सुख प्राप्त करनेके सब मानवी प्रयत्न व्यर्थ हैं। और केवल आधिभौतिक अर्थात् इंद्रियगम्य बाह्य विषयोपभोगरूपी सुखोंकोही देखें, तो यह नहीं कहा जा सकता, कि उनकी यह समझ ठीक नहीं है। यह सच है, कि यदि कोई बालक पूर्णचंद्रको पकड़नेके लिये हाथ फैला दे, तो जैसे आकाशका चंद्रमा उसके हाथमें कभी नहीं आता; उसी तरह आत्यंतिक सुखकी आशा रखकर केवल आधिभौतिक सुखके पीछे लगे रहनेसे आत्यंतिक सुखकी प्राप्ति कभी नहीं होगी। परंतु स्मरण रहे, कि आधिभौतिक सुखही समस्त प्रकारके सुखोंका भांडार नहीं है। इसलिये उपर्युक्त कठिनाईमेंभी आत्यंतिक और नित्य सुखप्राप्तिका मार्ग ढूंढ़ लिया जा सकता है। यह ऊपर बतलाया जा चुका है, कि सुखोंके दो भेद हैं-एक शारीरिक और दूसरा मानसिक और शरीर अथवा इंद्रियोंके व्यापारोंकी अपेक्षा मनको अंतमें अधिक महत्त्व देना पड़ता है। ज्ञानी पुरुष जो यह सिद्धान्त बतलाते हैं, कि शारीरिक (अर्थात् आधिभौतिक) सुखकी अपेक्षा मानसिक सुखकी योग्यता अधिक है, उसे वे कुछ अपने ज्ञानके घमंडसे नहीं बतलाते। प्रसिद्ध आधिभौतिकवादी मिलनेभी अपने उपयुक्तता- वादविषयक ग्रंथमें साफ़ मंजूर किया है,* कि उस सिद्धान्तमेंही श्रेष्ठ मनुष्य-

  • "It is better to be a human being dissatisfied than a pig satis- fied, better to be Socrates dissatisfied than a fool satisfied. And if the fool, or the pig, is of a different opininon, it is because they only know their own side of the question." Utilitarianism; p. 14 (Longmans 1907).

सुखदुःखविवेक ११७ जन्मकी सच्ची सार्थकता और महत्ता है। कुत्ते, शूकर और बैल इत्यादिकोभी इंद्रियसुखका आनंद मनुष्योंके समानही होता है; और मनुष्यकी यदि यह समझ होती, कि संसारमें सच्चा सुख विषयोपभोगही है; तो मनुष्य पशु बननेपरभी राजी हो गया होता। परंतु पशुओंके सब विषय-सुखोंके नित्य मिलनेका अवसर आने- परभी कोई मनुष्य पशु होनेको राजी नहीं होता। इससे यही विदित होता है, कि पशुकी अपेक्षा मनुष्यमें कुछ-न-कुछ विशेषता अवश्य है। इस विशेषताको समझनेके लिये, उस आत्माके स्वरूपका विचार करना पड़ता है, जिसे मन और बुद्धिद्वारा स्वयं अपना और बाह्यसृष्टिका ज्ञान होता है; और, ज्योंही यह विचार किया जायगा त्योंही स्पष्ट मालूम हो जायगा, कि पशु और मनुष्यके लिये विषयोपभोगसुख तो एकही-सा है; परंतु उसकी अपेक्षा मन और बुद्धिके अत्यंत उदात्त व्यापारमें तथा शुद्धावस्थामें जो सुख है, वही मनुष्यका श्रेष्ठ और आत्यंतिक सुख है। यह सुख आत्मवश है, इसकी प्राप्ति किसी वाह्यवस्तुपर अवलंबित नहीं है और इसकी प्राप्तिके लिये दूसरोंके सुखको न्यून करनेकीभी कुछ आवश्यकता नहीं है। यह सुख अपनेही प्रयत्नसे हमीको मिलता है। और ज्यों ज्यों हमारी उन्नति होती जाती है, त्यों त्यों इस सुखका स्वरूपभी अधिकाधिक शुद्ध और निर्मल होता चला जाता है। भर्तृहरिने सच कहा है, कि "मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः" - मनके प्रसन्न होनेपर क्या दरिद्रता और क्या अमीरी, दोनों समानही हैं। प्लेटो नामक प्रसिद्ध यूनानी तत्त्ववेत्तानेभी यह प्रतिपादन किया है, कि शारीरिक (अर्थात् वाह्य या आधिभौतिक) सुखकी अपेक्षा मनका सुख श्रेष्ठ है, और मनके सुखसेभी बुद्धिग्राह्य (अर्थात् परम आध्यात्मिक) सुख अत्यंत श्रेष्ठ है।* इसलिये यदि हम अभी मोक्षके विचारको छोड़ दें, तोभी यही सिद्ध होता है, कि जो बुद्धि आत्म- विचारमें निमग्न हो, उसीही परम सुख मिल सकता है। इसी कारण भगवद्गीतामें सुखके - सात्त्विक, राजस और तामस तीन भेद किये गये हैं और इनका लक्षणभी बतलाया गया है। यथा-आत्मनिष्ठ बुद्धि (अर्थात् सब भूतोंमें एकही आत्माको जानकर, आत्माके उसी सच्चे स्वरूपमें रत होनेवाली बुद्धि) की प्रसन्नतासे जो आध्यात्मिक सुख प्राप्त होता है, वही श्रेष्ठ और सात्त्विक सुख है - "तन्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तं आत्मबुद्धिप्रसादजम्" (गीता १८. ३७); जो आधिभौतिक सुख इंद्रियोंसे और इंद्रियोंके विषयोंसे होता है, वह सात्त्विक सुखसे कम दर्जेका होता है, और राजस कहलाता है (गीता १८. ३८)। और जिस सुखसे चित्तको मोह होता है, तथा जो सुख, निद्रा या आलस्यसे उत्पन्न होता है, उसकी योग्यता तामस अर्थात् अत्यन्त कनिष्ठ श्रेणीकी है। इस प्रकरणके आरंभमें गीताका जो श्लोक दिया है, उसका यही तात्पर्य है। और गीता (गीता ६. २२) में यहभी कहा है, कि इस * Republic Book IX.

११८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परम सुखका अनुभव मनुष्यको यदि एक बारभी हो जाता है, तो फिर कितनेही भारी दुःखके जबरदस्त धक्के क्यों न लगते रहें, उसकी यह सुखमय स्थिति कभी नहीं डिगने पाती। यह आत्यंतिक सुख स्वर्गकेभी विषयोपभोगसुखमें नहीं मिल सकता और इसे पानेके लिये पहले अपनी बुद्धि प्रसन्न होनी चाहिये। जो मनुष्य बुद्धिको प्रसन्न रखनेकी युक्तिको बिना सोचे-समझे केवल विषयोपभोगमेंही निमग्न हो जाता है, उसका सुख अनित्य और क्षणिक होता है। इसका कारण यह है, कि जो इंद्रियसुख आज है, वह कल नहीं रहता। इतनाही नहीं; किंतु जो बात हमारी इंद्रियोंको आज सुखकारक प्रतीत होती है, वही किसी कारणसे दूसरे दिन दुःखमय हो जाती है। उदाहरणार्थ, ग्रीष्म ऋतुमें जो ठंडा पानी हमें अच्छा लगता है, वही शीतकालमें अप्रिय हो जाता है। अस्तु, इतना करनेपरभी उसमे सुखेच्छाकी पूर्ण तृप्ति होनेही नहीं पाती। इसलिये, सुखका व्यापक अर्थ लेकर यदि हम उस शब्दका उपयोग सभी प्रकारके सुखोंके लिये करें, तोभी हमें सुख-सुखमें भेद करनाही पड़ेगा। नित्य व्यवहारमें सुखका अर्थ मुख्यतः इंद्रियसुखही होता है। परंतु जो इंद्रियातीत है, अर्थात् जो केवल आत्मनिष्ठ बुद्धिकोही ज्ञात हो सकता है, उसमें और विषयोप- भोगरूपी सुखमें जब भिन्नता प्रकट करनी हो, तब आत्मबुद्धि-प्रसादसे उत्पन्न होनेवाले सुखको - अर्थात् आध्यात्मिक सुखको - श्रेय, कल्याण, हित, आनंद अथवा शांति कहते हैं, और विषयोपभोगमे होनेवाले आधिभौतिक सुखको केवल सुख या प्रेय कहते हैं। पिछले प्रकरणके अंतमें दिये हुए कठोपनिषदके वाक्यमें, प्रेय और श्रेयमे नचिकेताने जो भेद बतलाया है उसकाभी अभिप्राय यही है। मृत्युने उसे अग्निका रहस्य पहलेही बतला दिया था। परंतु इस सुखके मिलनेपरभी जब उसने आत्मज्ञान-प्राप्तिका वर माँगा, तब मृत्युने उसके बदलेमें उसे अनेक सांसारिक सुखोंका लालच दिखलाया। परंतु नचिकेता इन अनित्य, आधिभौतिक सुखोंको कल्याणकारक नहीं समझता था। क्योंकि ये (प्रेय) सुख बाहरी दृष्टिमे अच्छे हैं, पर आत्माके श्रेयके लिये अच्छे नहीं। इसीलिये उसने उन सुखोंकी ओर ध्यान नहीं दिया। किंतु उस आत्मविद्याकी प्राप्तिके लियेही हठ किया; जिसका परिणाम आत्माके लिये श्रेयस्कर या कल्याणकारक है, और उसे अंतमें पाकरही छोड़ा। सारांश यह है, कि आत्मबुद्धि-प्रसादसे उत्पन्न होनेवाले केवल बुद्धिगम्य सुखको - अर्थात् आध्यात्मिक सुखकोही - हमारे शास्त्रकार श्रेष्ठ सुख मानते हैं। और उनका कथन है, कि यह नित्य सुख आत्मवश है, इसलिये सभीको प्राप्त हो सकता है; तथा सब लोगोंको चाहिये, कि वे इसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करें। पशु-धर्ममे प्राप्त सुखमें, और मानवी सुखमें जो कुछ विशेषता या विलक्षणता है, वह यही है; और यह आत्मानंद केवल बाह्य उपाधियोंपर कभी निर्भर न होनेके कारण सब सुखोंमें नित्य, स्वतंत्र और श्रेष्ठ है। इसीको गीतामें निर्वाण, अर्थात् परम शांति कहा है (गीता ६. १५), और यही स्थितप्रज्ञोंकी

सुखदुःखविवेक ११९ ब्राह्मी अवस्थाकी परमावधिका मुख है (गीता २. ७१; ६. २८; १२. १२; १८. ६२) । अब इस बातका निर्णय हो चुका, कि आत्माकी शांति या सुखही अत्यंत श्रेष्ठ है; और वह आत्मवश होनेके कारण सब लोगोंको प्राप्यभी है। परंतु यह प्रकट है, कि यद्यपि सब धातुओंमें सोना अधिक मूल्यवान् है, तथापि केवल सोनेसेही

  • लोहा इत्यादि अन्य धातुओंके बिना - जैसे संसारकाम नहीं चल सकता, अथवा जैसे केवल शक्करसेही - विना नमकके - काम नहीं चल सकता, उसी तरह आत्म- सुख या शांतिकोभी समझना चाहिये। इसमें संदेह नहीं, कि इस शांतिके साथ - शरीर-धारणके लिये सही - कुछ सांसारिक वस्तुओंकी आवश्यकता होती है; और इसी अभिप्रायसे आशीर्वादके संकल्पमें केवल 'शांतिरस्तु' न कह कर " शांतिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु" - अर्थात् शांतिके साथ पुष्टि और तुष्टिभी चाहिये - कहनेकी रीति है। यदि शास्त्रकारोंकी यह समझ होती, कि केवल शांतिसे ही तुष्टि हो सकती है, तो इस संकल्पमें 'पुष्टि' शब्दको व्यर्थ घुसेड़ देनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी। इसका यह मतलब नहीं है, कि पुष्टि - अर्थात् ऐहिक सुखोंकी वृद्धिके लिये रात- दिन लालच करते रहो। उक्त संकल्पका भावार्थ यही है, कि तुम्हें शांति, पुष्टि और तुष्टि (संतोष), तीनों उचित परिमाणमें मिलें; और इनकी प्राप्तिके लिये तुम्हें यत्नभी करना चाहिये। कठोपनिषद्‌काभी यही तात्पर्य है। नचिकेता जब मृत्युके अर्थात् यमके लोकमें गया तब यमने उससे कहा, कि तुम कोईभी तीन वर माँग लो; और उससे माँगेपर दे दिये, इतनीही कथा इस उपनिषदमें विस्तारसे दी गयी है; पर उस समय नचिकेताने एकदम यह वर नहीं माँगा, कि मुझे ब्रह्मज्ञानका उपदेश करो। किंतु उसने कहा, कि "मेरे पिता मुझपर क्रुद्ध हैं, इसलिये प्रथम वर आप मुझे यही दीजिये, कि वे मुझपर प्रसन्न हो जावें।" अनंतर उसने दूसरा वर माँगा कि "अग्निके - अर्थात् ऐहिक समृद्धि प्राप्त करा देनेवाले यज्ञ आदि कर्मोंके - ज्ञानका उपदेश करो।" इन दोनों वरोंको प्राप्त करके अंतमें उसने तीसरा वर यह माँगा, कि "मुझे आत्मविद्याका उपदेश करो।" परंतु जब यमराज कहने लगे, कि इस तीसरे वरके बदलेमें तुझे औरभी अधिक संपत्ति देता हूँ; तब - अर्थात् प्रेय (सुख) की प्राप्तिके लिये आवश्यक यज्ञ आदि कर्मोंका ज्ञान प्राप्त हो जाने- पर उसीकी अधिक आशा न करके - नचिकेताने इस बातका आग्रह किया, कि "अब मुझे श्रेय (आत्यंतिक सुख) की प्राप्ति करा देनेवाले ब्रह्मज्ञानकाही उपदेश करो।" सारांश यह है, कि इस उपनिषद्‌के अंतिम मंत्रमें जो वर्णन है, उसके अनुसार 'ब्रह्मविद्या' और 'योगविधि' (अर्थात् यज्ञ-याग आदि कर्म), दोनोंको प्राप्त करके नचिकेता मुक्त हो गया है (कठ. ६. १८)। इससे ज्ञान और कर्म इन दोनोंका समुच्चयही इस उपनिषद्‌का तात्पर्य सिद्ध होता है। इसी विषयपर इंद्रकीभी एक कथा है। कौषीतकी उपनिषद्में कहा गया है, कि इंद्र तो स्वयं ब्रह्मज्ञानी थाही,

१२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और उसने प्रतर्दनकोभी ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया था। तथापि जब इंद्रका राज छिन लिया गया और प्रल्हादको त्रैलोक्यका आधिपत्य मिला, तब इंद्रने देवगुरु बृहस्पतिसे पूछा, कि "मुझे बतलाइये कि श्रेय किसमें है ?" तब बृहस्पतिने राज्यभ्रष्ट इंद्रको ब्रह्मविद्या अर्थात् आत्मज्ञानका उपदेश करके कहा, कि "श्रेय इसीमें है" - एतावच्छ्रेय इति - परंतु इससे इंद्रका समाधान नहीं हुआ। उसने फिर प्रश्न किया, "क्या औरभी कुछ अधिक है ?" - को विशेषो भवेत् ? - तब बृहस्पतिने उसे शुक्राचार्यके पास भेजा। वहाँभी वही हाल हुआ; और शुक्राचार्यने कहा, कि "प्रल्हादको वह विशेषता मालूम है।" तब अंतमें इंद्र ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रल्हादका शिष्य बनकर सेवा करने लगा। एक दिन प्रल्हादने उससे कहा, कि शील (सत्य तथा धर्मसे चलने का स्वभाव) ही त्रैलोक्यका राज्य पाने का रहस्य है और वही श्रेय है। अनंतर, जब प्रल्हादने कहा, कि "मैं तेरी सेवासे प्रसन्न हूँ, तू चाहे जो वर माँग," तब ब्राह्मण-वेशधारी इंद्रने यही वर माँगा, कि "आप अपना शील मुझे दीजिये।" प्रल्हादके 'तस्थातु' कहतेही उसके 'शील'के साथ धर्म, सत्य, वृत्त, श्री अथवा ऐश्वर्य आदि सब देवता उसके शरीरसे निकल कर इंद्र-शरीरमें प्रविष्ट हो गये। फलतः इंद्र अपना राज्य पा गया। यह प्राचीन कथा भीष्मने युधिष्ठिरसे महाभारतके शांतिपर्व (महा. शां. १२४) में कही है। इस सुंदर कथासे हमें यह बात साफ़ मालूम हो जाती है, कि केवल ऐश्वर्यकी अपेक्षा केवल आत्मज्ञानकी योग्यता भले ही अधिक हो, परंतु जिस इस संसारमें रहना है, उसको अन्य लोगोंके समानही अपने लिये तथा अपने देशके लिये, ऐहिक समृद्धि प्राप्त कर लेनेकी आवश्यकता और नैतिक हक भी है। इसलिये जब यह प्रश्न उठे, कि इस संसारमें मनुष्यका सर्वोत्तम ध्येय या परम उद्देश्य क्या है, तो हमारे कर्मयोगशास्त्रमें अंतिम उत्तर यही मिलता है, कि शांति और पुष्टि, प्रेय और श्रेय अथवा ज्ञान और ऐश्वर्य दोनोंको एक साथ प्राप्त करो। सोचनेकी बात है, कि जिन भगवान्‌से बढ़कर संसारमें और कोई श्रेष्ठ नहीं और जिनके दिखलाये हुए मार्गपर अन्य सभी लोग चलते हैं (गीता ३ : २३); उस भगवान्‌ने क्या ऐश्वर्य और संपत्तिका छोड़ दिया है ? ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ अर्थात् "समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, संपत्ति, ज्ञान और वैराग्य इन छः बातोंको 'भग' कहते हैं"। भग शब्दकी ऐसी व्याख्या पुराणोंमें है (विष्णु. ६. ५. ७४)। कुछ लोग इस श्लोकके 'ऐश्वर्य' शब्दका अर्थ 'योगैश्वर्य' किया करते हैं। क्योंकि 'श्री' अर्थात् संपत्तिसूचक शब्द आगे आया है। परंतु व्यवहारमें ऐश्वर्य शब्दमें सत्ता, यश और संपत्तिका, तथा ज्ञानमें वैराग्य और धर्मका समावेश हुआ करता है। इससे हम बिना किसी बाधाके कह सकते हैं, कि लौकिक दृष्टिसे उक्त श्लोकका

सुखदुःखविवेक १२१ सब अर्थ, ज्ञान और ऐश्वर्य इन्हीं दो शब्दोंसे शक्य हो जाता है। और जब कि स्वयं भगवाननेही ज्ञान और ऐश्वर्यको अंगीकार किया है, तब हमेंभी उस बातको प्रमाण समझकर स्वीकार करना चाहिये (गीता. ३. २१; मभा. शां. ३४१. २५) । कर्मयोगमार्गका सिद्धान्त यह कदापि नही, कि कोरा आत्मज्ञानही इस संसारमें परम साध्य वस्तु है। यह तो संन्यासमार्गका सिद्धान्त है; जो कहता है, कि संसार दुःखमय है; इसलिये उसको एकदम छोड़ही देना चाहिये । भिन्न भिन्न मार्गोंके इन सिद्धान्तोंको एकत्र करके गीताके अर्थका अनर्थ करना उचित नहीं है । स्मरण रहे गीताहीका कथन है, कि ज्ञानके बिना केवल ऐश्वर्य, सिवा आसुरी संपत्के और कुछ नहीं है। इसलिये यही सिद्ध होता है, कि ऐश्वर्यके साथ ज्ञान, और ज्ञानके साथ ऐश्वर्य, अथवा शांतिके साथ पुष्टि, हमेशा होनी चाहिये । ऐसा कहनेपर, कि ज्ञानके साथ ऐश्वर्य होना अत्यावश्यक है; कर्म करनेकी आवश्यकता आप-ही-आप उत्पन्न होती है। क्योंकि मनुका कथन है "कर्माण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते " (मनु. ९. ३०० ) - कर्म करनेवाले पुरुषकोही इस जगतमें श्री अथवा ऐश्वर्य मिलता है. और प्रत्यक्ष अनुभवसेभी यही बात सिद्ध होती है; एवं गीतामें जो उपदेश अर्जुनको दिया गया है, वहभी ऐसाही है ( गीता ३.८) । इसपर कुछ लोगोंका कहना ' , कि मोक्षकी दृष्टिसे कर्मकी आवश्यकता न होनेके कारण अंतमें - अर्थात् ज्ञानोत्तर अवस्था में - सब कर्मोंको छोड़ देनाही चाहिये । परंतु यहाँ तो केवल सुख- दुःखका विचार करना है। और अबतक मोक्ष तथा कर्मके स्वरूपकी परीक्षाभी नहीं की गई है, इसलिए उक्त आक्षेपका उत्तर यहाँ नही दिया जा सकता। आगे चलकर नौवे तथा दसवें प्रकरणमें अध्यात्म और कर्मविपाकका स्पष्ट विवेचन करके ग्यारहवें प्रकरणमें बतला दिया जायगा, कि यह आक्षेपभी बेसिर-पैरका है। सुख और दुःख दो भिन्न तथा स्वतंत्र वेदनाएँ हैं। सुखेच्छा केवल सुखोप- भोगसेही तृप्त नहीं हो सकती । इसलिये संसारमें बहुधा दुःखकाही अधिक अनुभव होता है। परंतु इस दुःखको टालनेके लिये तृष्णा या असंतोष और साथ साथ सब कर्मोंकाभी समूल नाश करना उचित नहीं। उचित यही है, कि केवल फलाशा छोड़- कर सब कर्मोंको करते रहना चाहिये । केवल विषयोपभोग-सुख कभी पूर्ण न होनेवाला, अनित्य और पशुधर्म है। अतएव इस संसारमें बुद्धिमान मनुष्यका सच्चा ध्येय इस अनित्य पशुधर्मसे ऊंचे दर्जेका होना चाहिये । आत्मबुद्धि-प्रसादसे प्राप्त होनेवाला शांति-सुखही वह सच्चा ध्येय है; परंतु आध्यात्मिक सुखही यद्यपि इस प्रकार ऊंचे दर्जेका हो, तथापि उसके साथ इन सासारिक जीवनमे ऐहिक वस्तुओंकीभी उचित आवश्यकता है; और इसलिये सदा निष्काम-बुद्धिसे प्रयत्न अर्थात् कर्म करतेही रहना चाहिये । - इतनी सब बातें जब कर्मयोगशास्त्रके अनुसार सिद्ध हो चुकी, तो अब सुखकी दृष्टिसे विचार करनेपरभी यह बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, कि आधिभौतिक सुखोंकोही परम साध्य मानकर कर्मोंके केवल सुख-

१२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र दुःखात्मक बाह्यपरिणामोंके तारतम्यसेही नीतिमत्ताका निर्णय करना अनुचित है । कारण यह है, कि जो वस्तु कभी पूर्णावस्थाको पहुँचही नहीं सकती, उसे परम साध्य मानना मानो 'परम' शब्दका दुरुपयोग करके मृगजलके स्थानमें जलकी खोज करना है । जब हमारा परम साध्यही अनित्य तथा अपूर्ण है, तब उसकी आशामें बैठे रहनेसे हमें अनित्य-वस्तुको छोड़कर और मिलेगाही क्या ? "धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये" इस वचनका मर्मभी यही है । "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" इस शब्दसमूहके 'सुख' शब्दके अर्थके विषयमें आधिभौतिकवादियोंमेंभी बहुत मतभेद है । उनमेंसे बहुतेरोंका कहना है, कि बहुधा मनुष्य सब विषय-सुखोंको लात मारकर केवल सत्य अथवा धर्मके लिये जान देनेको तैयार हो जाता है । इससे यह मानना अनुचित है, कि मनुष्यकी इच्छा सदैव आधिभौतिक सुख-प्राप्तिकीही रहती है । इसलिये उन पंडितोंने यह सूचना की है, कि सुखके बदलेमें हित अथवा कल्याण शब्दकी योजना करके "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" इस सूत्रका रूपांतर "अधिकांश लोगोंका अधिक हित या कल्याण" कर देना चाहिये, परंतु इतना करनेपरभी इस मतमें यह दोष बनाही रहता है, कि कर्ताकी बुद्धिका कुछभी विचार नहीं किया जाता । अच्छा, यदि यह कहें, कि विषय-सुखोंके साथ मानसिक सुखोंकाभी विचार करना चाहिये; तो उससे आधिभौतिक पक्षकी इस पहलीही प्रतिज्ञाका विरोध हो जाता है, कि किसीभी कर्मकी नीतिमत्ताका निर्णय केवल उसके बाह्य-परिणामोंसेही करना चाहिये; और तब अंशतः अध्यात्म-पक्षका स्वीकार करना पड़ता है, तो उसे अधूरा या अंशतः स्वीकार करनेमे क्या लाभ होगा ? इसीलिये हमारे कर्मयोग-शास्त्रमें यह अंतिम सिद्धान्त निश्चित किया गया है कि, सर्वभूतहित, अधिकांश लोगोंका अधिक सुख और मनुष्यत्वका परम उत्कर्ष इत्यादि नीतिनिर्णयके सब बाह्य साधनोंको अथवा आधिभौतिक मार्गको गौण या अप्रधान समझना चाहिये; और आत्मप्रसाद-रूपी आत्यंतिक सुख तथा उसीके साथ रहने- वाली कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिकोही आध्यात्मिक कसौटी जान कर उसीसे कर्म-अकर्मकी परीक्षा करनी चाहिये । उन लोगोंकी बात छोड़ दो, जिन्होंने यह कसम खा ली हो, कि हम दृश्य सृष्टिके परे तत्त्वज्ञानमें प्रवेशही न करेंगे । जिन लोगोंने ऐसी कसम खाई नहीं है, उन्हें युक्तिसे यह मालूम हो जायगा, कि मन और बुद्धिकेभी परे जाकर नित्य आत्माके नित्य कल्याणकोही कर्मयोग-शास्त्रमें प्रधान मानना चाहिये । कई लोग भूलसे समझ बैठते हैं, कि जहाँ एक बार वेदान्तमें घुसे, कि बस, फिर सभी कुछ ब्रह्ममय हो जाता है; और वहाँ व्यवहारकी उपपत्तिका कुछ पताही नही चलता । आजकल जितने वेदान्तविषयक ग्रंथ पढ़े जाते हैं, वे प्रायः संन्यास- मार्गके अनुयायियोंकेही लिखे हुए हैं; और संन्यासमार्गवाले इस तृणारूपी संसारके सब व्यवहारोंको निःसार समझते हैं, इसलिये उनके ग्रंथोंमें कर्मयोगकी ठीक उपपत्ति सचमुच नहीं मिलती । अधिक क्या कहें; इन परसंप्रदाय-असहिष्णु ग्रंथ-

कारोंने संन्यासमार्गीय कोटिक्रम या युक्तिवादको कर्मयोगमें संमिलित करके ऐसाभी प्रयत्न किया है, जिससे लोग समझने लगें, कि कर्मयोग और संन्यास दो स्वतंत्र मार्ग नहीं हैं; किंतु संन्यासही अकेला शास्त्रोक्त मोक्षमार्ग है। परंतु यह ठीक नहीं है। संन्यास-मार्गके समान कर्मयोग-मार्गभी वैदिक धर्ममें अनादि कालसे स्वतंत्रता- पूर्वक चला आ रहा है, और इस मार्गके संचालकोंने वेदान्ततत्त्वोंको न छोड़ते हुए कर्मयोग शास्त्रकी ठीक ठीक उपपत्तिभी दिखलाई है। भगवद्गीता ग्रंथ इसी पंथका है। यदि गीताको छोड़ दें, तोभी जान पड़ेगा, कि अध्यात्म-दृष्टिसे कार्य अकार्य- शास्त्रका विवेचन करनेकी पद्धति ग्रीन सरीखे ग्रंथकार द्वारा इंग्लैंडमेंही शुरू कर दी गई है * और जर्मनीमें तो उससेभी पहले यह पद्धति प्रचलित थी। दृश्य सृष्टिका कितनाही विचार करें; परंतु जब तक यह बात ठीक मालूम नहीं हो जाती, कि इस सृष्टिको देखनेवाला और कर्म करनेवाला कौन है, तबतक तात्त्विक दृष्टिसे इस विषयकाभी विचार पूरा नहीं हो सकता, कि इस संसारमें मनुष्यका परम साध्य, श्रेष्ठ कर्तव्य या अंतिम ध्येय क्या है। इसीलिये याज्ञवल्क्यका यह उपदेश कि “ आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः । ” प्रस्तुत विषयमेंभी अक्षरशः उपयुक्त होता है। दृश्य जगतकी परीक्षा करनेसे यदि परोपकार सरीखे तत्त्वही अंतमें निष्पन्न होते हैं, तो उससे आत्मविद्याका महत्त्व कम तो होता नहीं उलटे उससे सब प्राणियोंमें एकही आत्माके होनेका एक और सबूत मिल जाता है। इस बातका तो कुछ उपायही नहीं है, कि आधिभौतिकवादी अपनीही बनाई हुई मर्यादासे स्वयं बाहर नहीं जा सकते। परंतु हमारे शास्त्रकारोंकी दृष्टि इस संकुचित मर्यादाके परे पहुँच गई है; और इसलिये उन्होंने आध्यात्मिक दृष्टिसेही कर्मयोगशास्त्रकी पूरी उपपत्ति दी है। इस उपपत्तिकी चर्चा करनेके पहले कर्म- अकर्म-परीक्षाके एक और पूर्वपक्षकाभी कुछ विचार कर लेना आवश्यक है। इसलिये अब उस पंथका विवेचन किया जायगा।

  • Prolegomena to Ethics, Book I; and Kant's Metaphysics of Morals (Trans. by Abbot in Kant's Theory of Ethics.)

छठा प्रकरण आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् । * कर्म-अकर्मकी परीक्षा करनेका - आधिभौतिक मार्गके अतिरिक्त - दूसरा पंथ आधिदैवतवादियोंका है। इस पंथके लोगोंका यह कथन है, कि जब कोई मनुष्य कर्म-अकर्मका या कार्य-अकार्यका निर्णय करता है, तब वह इस झगड़ेमें नहीं पड़ता, कि किसका किस कर्मसे कितना सुख अथवा दुःख होगा; अथवा उनमेंसे सुखका जोड़ अधिक होगा या दुःखका। वह आत्म-अनात्म-विचारकी झंझटमेंभी नहीं पड़ता; और ये झगड़े बहुतेरोंकी तो समझमें नहीं आते। यहभी नहीं कहा जा सकता, कि प्रत्येक प्राणी प्रत्येक कर्मको केवल अपने सुखके लियेही करता है। आधिभौतिकवादी कुछभी उपपत्ति कहें; परंतु यदि इस बातका थोड़ासा विचार किया जाय, कि धर्म-अधर्मका निर्णय करते समय मनुष्यके मनकी स्थिति कैसी होती है, तो यह ध्यानमें आ जायगा, कि मनकी स्वाभाविक और उदात्त मनोवृत्तियां - करुणा, दया, परोपकार आदि - ही किसी कामको करनेके लिये मनुष्यको एकाएक प्रवृत्त किया करती हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई भिखारी दीख पड़ता है; तब मनमें यह विचार आनेके पहलेही - कि उसे "दान करनेसे जगत्का अथवा अपने आत्माका कितना हित होगा" - मनुष्यके हृदयमें करुणावृत्ति जागृत हो जाती है; और वह अपनी शक्तिके अनुसार उस याचकको कुछ दान कर देता है। इसी प्रकार जब बालक रोता है, तब माता उसे दूध पिलाते समय इस बातका कुछभी विचार नहीं करती, कि बालकको पिलानेमें कितने लोगोंका इस बातका कितना हित होगा। अर्थात् ये उदात्त मनोवृत्तियांही कर्मयोगशास्त्रकी यथार्थ नींव हैं। हमें किसीने ये मनोवृत्तियां दी नहीं हैं; किंतु ये निसर्गसिद्ध अर्थात् स्वाभाविक अथवा स्वयंभू देवताही हैं। जब न्यायाधीश न्यायासनपर बैठता है, तब उसकी बुद्धिमें न्यायदेवताकी प्रेरणा हुआ करती है; और वह उसी प्रेरणाके अनुसार न्याय किया करता है। परंतु जब कोई न्यायाधीश इस प्रेरणाका अनादर करता है, तभी उससे अन्याय हुआ करते हैं। न्यायदेवताके सदृशही करुणा, दया, परोपकार, कृतज्ञता, कर्तव्यप्रेम, धैर्य आदि सद्गुणोंकी जो स्वाभाविक मनोवृत्तियां हैं, वेभी देवता हैं। प्रत्येक मनुष्य स्वभावतः इन देवताओंके शुद्ध स्वरूपोंसे परिचित

  • "वही बोलना चाहिये जो सत्यपूत अर्थात् सत्यसे शुद्ध किया गया है; और वही आचरण करना चाहिये जो मनको शुद्ध मालूम हो।"

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १२५ रहता है। परंतु यदि लोभ, द्वेष, मत्सर आदि कारणोंसे वह इन देवताओंकी परवाह न करे, तो उसे देवता क्या करें ? यह बात सच है, कि कई बार इन देवताओंमेंभी विरोध उत्पन्न हो जाता है, और तब कोई कार्य करते समय हमें संदेह हो जाता है कि किस देवताकी स्फूर्ति बलवती मानें ? तब इस संदेहका निर्णय करनेके लिये न्याय, करुणा आदि देवताओंके अतिरिक्त किसी दूसरेकी सलाह लेन। आवश्यक जान पड़ता है। परंतु ऐसे अवसरपर अध्यात्मविचार अथवा सुख-दुःखकी न्यूना- धिकताके झगड़ेमें न पड़कर यदि हम अपने मनोदेवताकी गवाही लें, तो वह एकदम इस बातका निर्णय कर देता है, कि इन दोनोंमेंसे कौन-सा मार्ग श्रेयस्कर है। यही कारण है, कि उक्त सब देवताओंमें मनोदेवता श्रेष्ठ है ! 'मनोदेवता' शब्दमें इच्छा, क्रोध, लोभ आदि सभी मनोविकारोंको शामिल नहीं करना चाहिये। किन्तु इस शब्दसे मनकी वह ईश्वरदत्त और स्वाभाविक शक्तिही अभीष्ट है, कि जिसकी सहायतासे केवल भले-बुरेका निर्णय किया जाता है। इसी शक्तिका एक बड़ा भारी नाम 'सदसद्विवेक-बुद्धि' * है और यदि किसी संदेहग्रस्त अवसरपर मनुष्य स्वस्थ अंतःकरणसे और शांतिके साथ विचार करे, तो यह सदसद्विवेक-बुद्धि कभी उसको धोखा नहीं देगी। इतनाही नहीं तो ऐसे अवसरोंपर हम दूसरोंसे यही कहा करते हैं, "कि तू अपने मनसे पूछ।" इस बड़े देवताके पास एक सूची हमेशा मौजूद रहती है। उसमें यह लिखा होता है, कि किस सद्गुणको किस समय कितना महत्त्व दिया जाना चाहिये। यह मनोदेवता समय समयपर इसी सूचीके अनुसार अपना निर्णय झट प्रकट किया करता है। मान लीजिये, किसी समय आत्मरक्षा और अहिंसामें विरोध उत्पन्न हुआ; और यह शंका उपस्थित हुई, कि दुर्भिक्षके समय अभक्ष्य भक्षण करना चाहिये या नहीं ? तब इस संशयको दूर करनेके लिये यदि हम शांत चित्तसे इस मनोदेवताकी मिन्नत करें, तो झट उसका यही निर्णय प्रकट होगा, कि "अभक्ष्य भक्षण करो।" इसी प्रकार यदि कभी स्वार्थ और परार्थ अथवा परोपकारके बीच विरोध उत्पन्न हो जाय, तो उसका निर्णयभी इस मनोदेवताको मनाकर करना चाहिये। मनोदेवताके घरकी - धर्म-अधर्मके न्यूनाधिक भावकी - यह सूची एक ग्रंथकारको शांतिपूर्वक विचार करनेसे उपलब्ध हुई है, जिसे उसने अपने ग्रंथमें प्रकाशित किया है।† इस सूचीमें नम्रतायुक्त पूज्यभावको पहला अर्थात् अत्युच्च स्थान दिया गया है; और उसके बाद करुणा, कृतज्ञता, उदारता,

  • इस सदसद्विवेक-बुद्धिको अंग्रेजी में Conscience कहते हैं और आधि- दैवतपक्ष Intuitionist School कहलाता है। † इस ग्रंथकारका नाम James Martineau (जेम्स मार्टिनो) हैं। इसने यह सूची अपने Types of Ethical Theory (Vol. II, p. 266. 3rd Ed). नामक ग्रंथमें दी है। मार्टिनो अपने पंथको Idio-psychological कहता है। परंतु हम उसे आधिदैवत पक्षहीमें शामिल करते हैं।

१२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वात्सल्य आदि भावोंको क्रमशः नीचेकी श्रेणियोंमें शामिल किया है। इस ग्रंथकारका मत है, कि जब ऊपर और नीचेकी श्रेणियोंके सद्गुणोंमें विरोध उत्पन्न हो, तब ऊपरकी श्रेणीके देवताकोही अधिक मान देना चाहिये । उसके मतके अनुसार कार्य-अकार्यका अथवा धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये इसकी अपेक्षा और कोई उचित मार्ग नहीं है। इसका कारण यह है, कि यद्यपि हम अत्यंत दूरदृष्टिसे यह निश्चित कर लें, कि “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” किसमें है, तथापि सारासार बुद्धिमें यह कहनेकी सत्ता या अधिकार नहीं है, कि “जिसमें अधिकांश लोगोंका हित हो वही तू कर ।” इसलिये अंतमें इस प्रश्नका निर्णयही नहीं होता, कि “जिसमें अधिकांश लोगोंका हित है, वह बात मैं क्यों करूँ ?” और सारा झगड़ा ज्यों-का त्यों बना रहता है। राजासे बिना अधिकार प्राप्त किये ही जब कोई न्याया- धीश न्याय करता है, तब उसके निर्णयकी जो दशा होती है, ठीक वही दशा उस कार्य-अकार्यके निर्णयकीभी होती है, जो दूरदृष्टिपूर्वक सुखदुःखोंका विचार करके किया जाता है। केवल दूरदृष्टि यह बात किसीसे नहीं कह सकती, कि “तू यह कर, तुझे यह करनाही चाहिये ।” इसका कारण यही है, कि दूरदृष्टिभी हो तोभी वह मनुष्यकृतही है; और इसी कारणसे वह अपना प्रभाव मनुष्योंपर नहीं जमा सकती । ऐसे समयपर आज्ञा करनेवाला हमसे श्रेष्ठ कोई अधिकारी अवश्य होना चाहिये । और यह काम ईश्वरदत्त सदसद्विवेकदेवताही कर सकता है। क्योंकि वह मनुष्यकी अपेक्षा श्रेष्ठ है अतएव मनुष्यपर अपना अधिकार जमानेमें समर्थ है। यह सद- सद्विवेकबुद्धि या ‘देवता’ स्वयंभू है। इसी कारण व्यवहारमें यह कहनेकी रीत है, कि मेरा ‘मनोदेवता’ अमुक प्रकारकी गवाही नहीं देता। जब कोई मनुष्य एक- आध बुरा काम कर बैठता है, तब पश्चात्तापसे वह स्वयं लज्जित हो जाता है: या उसका मन उसे हमेशा टोकता रहता है। यहभी उपर्युक्त देवताके शासनकाही फल है। इस बातसे उक्त स्वतंत्र मनोदेवताका अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। कारण कि आधिदैवत पंथके मतानुसार यदि उपर्युक्त सिद्धान्त न माना जाय, तो इस प्रश्नकी उपपत्ति नहीं हो सकती, कि हमारा मन हमें क्यों टोका करता है। ऊपर दिया हुआ वृत्तान्त पश्चिमी आधिदैवत पंथके मतका है। पश्चिमी देशोंमें इस पंथका प्रचार विशेषतः ईसाई धर्मोपदेशकोंने किया है। उनके मतके अनुसार धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये केवल आधिभौतिक साधनोंकी अपेक्षा यह ईश्वरदत्त साधन सुलभ, श्रेष्ठ एवं ग्राह्य है। यद्यपि हमारे देशमें प्राचीन कालमें कर्मयोगशास्त्रका ऐसा कोई स्वतंत्र पंथ नहीं था, तथापि उपर्युक्त मत हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें कई जगह पाया जाता है। महाभारतमें अनेक स्थानोंपर मनकी भिन्न भिन्न वृत्तियोंको देवताओंका स्वरूप दिया गया है। पिछले प्रकरणमें यह बतलायाभी गया है, कि धर्म, सत्य, वृत्त, शील, श्री आदि देवताओंने प्रल्हादके शरीरको छोड़ कर इंद्रके शरीरमें कैसे प्रवेश किया। कार्य-अकार्यका अथवा

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १२७ धर्म-अधर्मका निर्णय करनेवाले देवताका नामभी 'धर्म'ही है। ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, कि शिबि राजाके सत्त्वकी परीक्षा करनेके लिये श्येनका रूप धर कर, और युधिष्ठिरकी परीक्षा लेनेके लिये यक्षरूपसे तथा दूसरी बार कुत्ता बन कर 'धर्म'देवता प्रकट हुए थे। स्वयं भगवद्गीता (गीता १०. ३४) मेंभी कीर्ति, धी, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा ये सब देवता माने गये हैं। इनमेंसे स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मनके धर्म हैं। मनभी एक देवता है; और परब्रह्मका प्रतीक मान कर उपनिषदोंमें उसकी उपासनाभी बतलाई गई है (तै. ३. ४; छां. ३. १८) । जब मनुजी कहते हैं, कि " मनःपूतं समाचरेत् " (६. ४६) - मनको जो पवित्र मालूम हो, वही करना चाहिये - तब यही बोध होता है, कि उन्हें 'मन' शब्दसे मनोदेवताही अभिप्रेत है। साधारण व्यवहारमें हम यही कहा करते हैं, कि जो मनोदेवताको अच्छा मालूम हो, वही करना चाहिये । मनुजीने मनुसंहिताके चौथे अध्याय (४. १६१) में यह बात विशेष स्पष्ट कर दी है कि :- यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात् परितोषोऽन्तरात्मनः । यत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत् ॥ "वह कर्म प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये, जिसके करनेसे हमारा अंतरात्मा संतुष्ट हो और जो कर्म इसके विपरीत हो, उसे छोड़ देना चाहिये।" इसी प्रकार चातुर्वर्ण्य- धर्म आदि व्यावहारिक नीतिके मूलतत्त्वोंका उल्लेख करते समय मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृति-ग्रंथकारभी यही कहते हैं :- वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ "वेद, स्मृति, शिष्टाचार और अपने आत्माको प्रिय मालूम होना धर्मके ये चार मूलतत्त्व हैं" (मनु. २. १२) । "अपने आत्माको जो प्रिय मालूम हो " - इसका अर्थ यही है कि मनको जो शुद्ध मालूम हो। इससे स्पष्ट होता है, कि श्रुति, स्मृति और सदाचारसे यदि किसी कार्यकी धर्मता या अधर्मताका निर्णय नहीं हो सकता था, तब निर्णय करनेका चौथा साधन 'मनःपूतता' समझी जाती थी। पिछले प्रकरणमें कही गई प्रल्हाद और इंद्रकी कथा बतला चुकनेपर 'शील'के लक्षणके विषयमें, धृतराष्ट्रने महाभारतमें यह कहा है :- यदन्येषां हितं न स्यात् आत्मनः कर्म पौरुषम् । अपत्रपेत वायेन न तत्कुर्यात् कथंचन ॥ अर्थात् " हमारे जिस कर्मसे लोगोंका हित नहीं हो सकता अथवा जिसके करनेसे स्वयं अपनेहीको लज्जा मालूम होती है, वह कभी नहीं करना चाहिये (मभा. शां. १२४. ६६) । इससे पाठकोंके ध्यानमें यह बात आ जायगी, कि " लोगोंका हित हो नहीं सकता"; "और लज्जा मालूम होती है" इन दो पदोंसे "अधिकांश

१२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोगोंका अधिक हित" और 'मनोदेवता' इन दोनों पक्षोंका इस श्लोकमें एक साथ उल्लेख किया गया है। मनुस्मृति (मनु. १२. ३५, ३७) में भी कहा गया है, कि जिस कर्म करनेसे या उसे करते हुए लज्जा मालूम होती है वह तामस है और जो कर्म करनेमें लज्जा मालूम नहीं होती-एवं अंतरात्मा संतुष्ट होता है-वह सात्त्विक है। धम्मपद नामक बौद्ध-ग्रंथ (धम्मपद ६७ और ६८) में भी इसी प्रकारके विचार पाये जाते हैं। कालिदास भी यही कहते हैं, कि जब कर्म-अकर्मका निर्णय करनेमें कुछ संदेह हो, तब- सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः । "सत्पुरुष लोग अपने अंतःकरणहीकी गवाहीको प्रमाण मानते हैं" (शाकुंतल १. २२)। पातंजल योग इसी बातकी शिक्षा देता है, कि चित्तवृत्तियोंका निरोध करके मनको किसी एकही विषयपर कैसे स्थिर करना चाहिये; और यह योगशास्त्र हमारे यहाँ बहुत प्राचीन समयसे प्रचलित है। अतएव जब कभी धर्म-अधर्मके विषयमें कुछ संदेह उत्पन्न हो, तब हम लोगोंको किसीके यह सिखानेकी आवश्यकता नहीं थी कि "अंतःकरणको स्वस्थ और शांत करनेपर जो उचित मालूम हो, वही करना चाहिये।" सब स्मृति-ग्रंथोंके आरंभमें, इस प्रकारके वर्णन मिलते हैं, कि स्मृतिकार ऋषि अपने मनको एकाग्र करके ही धर्म-अधर्म बतलाया करते थे। (मनु. १. १)। योंही देखनेसे तो "किसी काममें मनकी गवाही लेना' यह मार्ग अत्यंत सुलभ प्रतीत होता है, परंतु जब हम तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे इस बातका सूक्ष्म विचार करने लगते हैं, कि 'शुद्ध मन' किसे कहना चाहिये; तब यह सरल पक्ष अंततक काम नहीं दे सकता। और यही कारण है, कि हमारे शास्त्रकारोंने कर्मयोगशास्त्रकी इमारत इस कच्ची नींवपर खड़ी नहीं की है। अब इस बातका विचार करना चाहिये, कि यह तत्त्वज्ञान कौन-सा है। परंतु उसका विवेचन करनेके पहले यहाँपर इस बातका उल्लेख करना आवश्यक है, कि पश्चिमी आधिभौतिकवादियोंने इस आधिदैवत पक्षका किस प्रकार खंडन किया है। कारण यह है, कि यद्यपि इस विषयमें आध्यात्मिक और आधिभौतिक पंथोंके कारण भिन्न भिन्न हैं; तथापि उन दोनोंका अंतिम निर्णय एकही-सा है। अतएव, पहले आधिभौतिक कारणोंका उल्लेखकर देनेसे आध्यात्मिक कारणोंकी महत्ता और सयुक्तता पाठकोंके ध्यानमें शीघ्र आ जायगी। ऊपर कह आये हैं, कि आधिदैविक पंथमें शुद्ध मनोदेवताकोही अग्रस्थान दिया गया है इससे यह प्रकट होता है, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" वाले आधिभौतिक नीतिग्रंथमें कर्ताकी बुद्धि या हेतुके कुछ भी विचार न किये जानेका जो दोष पहले बतलाया गया है, वह इस आधिदैवत पक्षमें नहीं है। परंतु जब हम इस बातका सूक्ष्म विचार करने लगते हैं, कि सदसद्विवेकविषयी शुद्ध मनोदेवता किसे कहना चाहिये; तब इस पंथमेंभी दूसरे अनेक अपरिहार्य बाधाएँ उपस्थित हो जाती

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १२९ हैं। कोईभी बात लीजिये; कहनेकी आवश्यकता नहीं है, कि उसके बारेमें भली- भाँति विचार करना - वह ग्राह्य है अथवा अग्राह्य है, करनेके योग्य है या नहीं, उससे लाभ अथवा सुख होगा या नहीं; इत्यादि बातोंका निर्णय करना - नाक अथवा आँख जैसी इंद्रियोंका काम नहीं है। किंतु वह काम उस स्वतंत्र इंद्रियका है, जिसे मन कहते हैं। अर्थात्, कार्य-अकार्य अथवा धर्म-अधर्मका निर्णय मनही करता है। चाहे आप उसे इंद्रिय कहें या देवता। यदि आधिदैविक पंथ का सिर्फ यही कहना हो, तो कोई आपत्ति नहीं। परंतु पश्चिमी आधिदैवत पक्ष इससे एक पग औरभी आगे बढ़ा हुआ है। उसका यह कथन है, - भला अथवा बुरा (सत् अथवा असत्) न्याय्य अथवा अन्याय्य, धर्म अथवा अधर्मका निर्णय करना एक बात है; और इस बातका निर्णय करना दूसरी बात है, कि अमुक पदार्थ भारी है या हलका है, गोरा है या काला, अथवा गणितका कोई उदाहरण सही है या गलत - ये दोनों बातें अत्यंत भिन्न हैं। इनमेंसे दूसरे प्रकारकी बातोंका निर्णय न्यायशास्त्रका आधार लेकर मन कर सकता है; परंतु पहले प्रकारकी बातोंका निर्णय करनेके लिये केवल मन असमर्थ है। अतएव यह काम सदसद्विवेचन-शक्तिरूप देवताही किया करता है, जो कि हमारे मनमें रहता है। इसका कारण वे यह बतलाते हैं, कि जब हम किसी गणितके उदाहरणकी जाँच करके निश्चय करते हैं, कि वह सही है या गलत, तब हम पहले उसके गुणा, जोड़ आदिकी जाँच कर लेते हैं, और फिर अपना निश्चय स्थिर करते हैं। अर्थात् इस निश्चयके स्थिर होनेके पहले मनको अन्य क्रिया या व्यापार करने पड़ते हैं; परंतु भले-बुरेका निर्णय इस प्रकार नहीं किया जाता। जब हम यह सुनते हैं, कि किसी एक आदमीने किसी दूसरेको जानसे मार डाला, तब हमारे मुँहसे एकाएक ये उद्गार निकल पड़ते हैं; “राम राम! उसने बहुत बुरा काम किया!” और इस विषयमें हमें कुछभी विचार नहीं करना पड़ता। अतएव, यह नहीं कहा जा सकता, कि कुछभी विचार न करके आप-ही-आप जो निर्णय हो जाता है, और जो निर्णय विचार-पूर्वक किया जाता है, वे दोनों एकही मनोवृत्तिके व्यापार हैं। इसलिये यह मानना चाहिये, कि सदसद्विवेचन-शक्तिभी एक स्वतंत्र मानसिक देवता है। सब मनुष्योंके अंतःकरणमें यह देवता या शक्ति एकही-सी जागृत रहती है। इसलिये हत्या करना सभी लोगोंको दोष प्रतीत होता है; उसके विषयमें किसीको कुछ सिखलानाभी नहीं पड़ता। इस आधिदैविक युक्तिवादका आधिभौतिक पंथके लोगोंका यह उत्तर है, कि सिर्फ “हम एक-आध बातका निर्णय एकदम कर सकते हैं;” इतनेहीसे यह नहीं माना जा सकता, कि जिस बातका निर्णय विचार- पूर्वक किया जाता है वह उससे भिन्न है। किसी कामको जल्द अथवा धीरे करना अभ्यासपर अवलंबित है। उदाहरणार्थ, गणितका विषय लीजिये। व्यापारी लोग मनके भावसे सेर-छटाँकके दाम एकदम मुखाग्र गणितकी रीतिसे बतलाया करते हैं। इस कारण यह नहीं कहा जा सकता, कि गुणाकार करनेकी उनकी शक्ति गी. र. ९

१३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

या देवता किसी अच्छे गणितज्ञसे भिन्न है। कोई काम अभ्यासके कारण इतना अच्छी तरह सध जाता है, कि बिना विचार कियेही कोई मनुष्य उसको शीघ्र और सरलतापूर्वक कर लेता है। उत्तम लक्ष्यभेदी मनुष्य उड़ते हुए पक्षियोंको बंदूकसे सहज मार गिराता हैं, इससे कोईभी यह नहीं कहता, कि लक्ष्यभेद एक स्वतंत्र देवता है। इतनाही नहीं; किंतु निशाना मारना, उड़ते हुए पक्षियोंकी गतिको जानना, इत्यादि शास्त्रीय बातोंको कोईभी निरर्थक और त्याज्य नहीं कह सकता । नेपोलियनके विषयमें यह प्रसिद्ध है, कि जब वह समरांगणमें खड़ा होकर चारों ओर सूक्ष्म दृष्टिसे देखता था, तब उसके ध्यानमें यह बात एकदम आ जाया करती थी, कि शत्रु किस स्थानपर कमजोर है। इतनेहीसे किसीने यह सिद्धान्त नहीं निकाला है, कि युद्धकला एक स्वतंत्र देवता है, और उसका अन्य मानसिक शक्तियोंसे कुछभी संबंध नहीं है। इसमें संदेह नहीं; कि किसी एक काममें किसीकी बुद्धि स्वभावतः काम देती है; और किसीकी कम परंतु सिर्फ इस असमानताके आधारपरही हम यह नहीं कहते, कि दोनोंकी बुद्धियां वस्तुतः भिन्न हैं। इसके अतिरिक्त यह बातभी सत्य नहीं, कि कार्य-अकार्यका अथवा धर्म-अधर्मका निर्णय सदैव एकाएक हो जाता है। यदि ऐसाही होता, तो यह प्रश्नभी कभी उपस्थित न होता कि "अमुक काम करना चाहिये अथवा नहीं करना चाहिये।" यह बात प्रकट है, कि इस प्रकारका प्रश्न प्रसंगानुसार अर्जुनकी तरह सभी लोगोंके सामने उपस्थित हुआ करता है; और कार्य-अकार्य-निर्णयके कुछ विषयोंमें, भिन्न भिन्न लोगोंके अभिप्रायभी भिन्न भिन्न हुआ करते हैं। यदि सदसद्विवेचनरूप स्वयंभू देवता एकही है, तो फिर यह भिन्नता क्यों है ? इससे यही कहना पड़ता है, कि मनुष्यकी बुद्धि जितनी सुशिक्षित अथवा सुसंस्कृत होगी, उतनीही योग्यतापूर्वक वह किसी बातका निर्णय करेगा। बहुतेरे जंगली लोग ऐसेभी हैं, कि जो मनुष्यका वध करना अपराध तो मानते नहीं; किंतु मारे हुए मनुष्यका मांसभी वे सहर्ष खा जाते हैं! जंगली लोगोंकी बात जाने दीजिये। सभ्य देशोंमेंभी यह देखा जाता है, कि देशके अनुसार किसी एक देशमें जो बात गर्ह्य समझी जाती है, वही किसी दूसरे देशाचरमें सर्वमान्य समझी जाती है। उदाहरणार्थ, एक स्त्रीके रहने हुए दूसरी स्त्रीके साथ विवाह करना इंग्लैंडमें अपराध माना जाता है; परंतु हिंदुस्थानमें यह बात विशेष दूषणीय नहीं मानी जाती। भरी सभामें सिरकी पगड़ी उतारना हिंदू लोगोंके लिये लज्जा या अमर्यादाकी बात है; परंतु अंग्रेज लोग सिरकी टोपी उतारनाही सभ्यताका लक्षण मानते है। यदि - यह बात सच है, कि ईश्वरदत्त या स्वाभाविक सदसद्विवेचन-शक्तिके कारणही बुरे कर्म करनेमें लज्जा मालूम होती है तो क्या सब लोगोंको एक ही कृत्य करनेमें एकही समान लज्जा नहीं मालूम होनी चाहिये ? बड़े बड़े लुटेरे और डाकू लोगभी एक बार जिसका नमक खा लेते हैं, उसपर हथियार उठाना निंद्य मानते हैं, किंतु बड़े बड़े सभ्य पश्चिमी राष्ट्र अपने पड़ोसी राष्ट्रके लोगोंका वध करना स्वदेश-

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १३१ भक्तिका लक्षण समझते हैं। यदि सदसद्विवेचन-शक्तिरूप देवता एकही है, तो यह भेद क्यों है ? और यदि यह कहा जाय, कि शिक्षाके अनुसार अथवा देशके चलनके अनुसार सदसद्विवेचन-शक्तिमेंभी भेद हो जाया करते हैं, तो उसकी स्वयंभू नित्यतामें बाधा आती है। मनुष्य ज्यों ज्यों अपनी असभ्य दशाको छोड़कर सभ्य बनता जाता है, त्यों त्यों उसके मन और बुद्धिका विकास होता जाता है; और इस तरह बुद्धिका विकास होनेपर जिन बातोंका विचार वह अपनी पहली असभ्य अवस्था में नहीं कर सकता था, उन्हीं बातोंका विचार अब वह अपनी सभ्य दशामें शीघ्रतासे करने लग जाता है। अथवा यह कहना चाहिये, कि इस तरह बुद्धिका विकसित होनाही सभ्यताका लक्षण है। यह सभ्य अथवा सुशिक्षित मनुष्यके इंद्रियनिग्रहका परिणाम है, कि वह औरोंकी वस्तुको ले लेने या मांगनेकी इच्छा नहीं करता। इसी प्रकार मनकी वह शक्तिभी - जिससे बुरे-भलेका निर्णय किया जाता है - धीरे धीरे बढ़ती जाती है। और अब तो कुछ बातोंमें वह इतनी परिपक्व हुईही है, कि किसी विषयमें कुछ विचार किये बिनाही हम लोग अपना नैतिक निर्णय प्रकट कर दिया करते हैं। जब हमें आँखोंमें कोई दूर या पासकी वस्तु देखनी होती है, तब आँखोंकी नसोंको उचित परिमाणसे खींचना पड़ता है; और यह क्रिया इतनी शीघ्रतासे होती है, कि हमें उसका कुछ बोधभी नहीं होता। परंतु क्या इतनेहीसे किसीने इस बातकी उपपत्तिको निरुपयोगी मान रखा है ? सारांश यह है, कि मनुष्यकी बुद्धि या मन सब समय और सब कामोंमें एकही है। यह बात यथार्थ नहीं, कि काले-गोरेका निर्णय एक प्रकारकी बुद्धि करती है और बुरे-भलेका निर्णय किसी अन्य प्रकारकी बुद्धिमें किया जाता है। अंतर केवल इतनाही है, कि किसीमें बुद्धि कम रहती है और किसीकी अशिक्षित अथवा अपरिपक्व रहती है। उक्त भेदकी ओर, तथा इस अनुभवकी ओर उचित ध्यान दे कर, कि किसी कामको शीघ्रतापूर्वक कर सकना केवल आदत या अभ्यासका फल है, पश्चिमी आधिभौतिकवादियोंने यह निश्चय किया है, कि मनकी स्वाभाविक शक्तियोंमें परे सदसद्विचार-शक्ति नामक कोई भिन्न, स्वतंत्र और विलक्षण शक्तिके माननेकी आवश्यकता नहीं है। इस विषयमें हमारे प्राचीन शास्त्रकारोंका अंतिम निर्णयभी पश्चिमी आधि- भौतिकवादियोंके सदृशही है। वे इस बातको मानते हैं, कि स्वस्थ और शांत अंतः- करणसे किसीभी बातका विचार करना चाहिये। परंतु उन्हें यह बात मान्य नहीं, कि धर्म-अधर्मका निर्णय करनेवाली बुद्धि अलग है और काला-गोरा पहचाननेकी बुद्धि अलग है। उन्होंने यहभी प्रतिपादन किया है, कि मन जितना सुशिक्षित होगा, उतनाही वह भला या बुरा निर्णय कर सकेगा। अतएव मनको सुशिक्षित करनेका प्रयत्न प्रत्येकको दृढ़तासे करना चाहिये। परंतु वे इस बातको नहीं मानते, कि सदसद्विवेचन-शक्ति सामान्य बुद्धिसे कोई भिन्न वस्तु या ईश्वरीय प्रसाद है। प्राचीन समयमें इस बातका परीक्षण सूक्ष्म रीतिसे किया गया है, कि मनुष्यको ज्ञान

१३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किस प्रकार प्राप्त होता है; और उसके मनका और बुद्धिका व्यापार किस तरह हुआ करता है। इसी परीक्षणको 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञ-विचार' कहते हैं। क्षेत्रका अर्थ 'शरीर' और क्षेत्रज्ञका अर्थ 'आत्मा' है। यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचार अध्यात्मविद्याकी जड़ है। इस क्षेत्रज्ञ-विद्याका ठीक ठीक ज्ञान हो जानेपर, सदसद्विवेक-शक्तिहीका कौन कहे, किसीभी मनोदेवताका अस्तित्व आत्मासे श्रेष्ठ या स्वतंत्र नहीं माना जा सकता। ऐसी अवस्थामें आधिदैवत पक्ष आप-ही-आप कमजोर हो जाता है। अतएव, अब यहाँ इस क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विद्याहीका विचार संक्षेपमें किया जायगा। इस विवेचनसे भगवद्गीताके बहुतेरे सिद्धान्तोंका सत्यार्थभी पाठकोंके ध्यानमें अच्छी तरह आ जायगा। यह कहा जा सकता है, कि मनुष्यका शरीर ( पिंड, क्षेत्र या देह ) एक बहुत बड़ा कारखानाही है। जैसे किसी कारखानेमें पहले बाहरका माल भीतर लिया जाता है; फिर उस मालका चुनाव या व्यवस्था करके इस बातका निश्चय किया जाता है, कि कारखानेके लिये उपयोगी और निरुपयोगी पदार्थ कौन-से हैं; और तब बाहरसे लाये गये कच्चे मालसे नई चीजें बनाते और उन्हें बाहर भेजते हैं। वैसेही मनुष्यकी देहमेंभी प्रतिक्षण अनेक व्यापार हुआ करते हैं। इस सृष्टिके पांचभौतिक पदार्थोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये मनुष्यकी इंद्रियाँही प्रथम साधन हैं। इन इंद्रियोंके द्वारा सृष्टिके पदार्थोंका यथार्थ अथवा मूल स्वरूप नहीं जाना जा सकता। आधिभौतिकवादियोंका यह मत है, कि पदार्थोंका यथार्थ स्वरूप वैसाही है, जैसा कि वह हमारी इंद्रियोंको प्रतीत होता है। परंतु यदि कल किसीको कोई नूतन इंद्रिय प्राप्त हो जाय, तो उसकी दृष्टिसे सृष्टिके पदार्थोंके गुण-धर्म जैसे आज हैं, वैसेही नहीं रहेंगे। मनुष्यकी इंद्रियोंकेभी दो भेद हैं, - एक कर्मेंद्रियाँ और दूसरी ज्ञानेंद्रियाँ। हाथ, पैर, वाणी, गुद और उपस्थ ये पाँच कर्मेंद्रियाँ हैं। हम जो कुछ व्यवहार अपने शरीरसे करते हैं, वह सब इन्हीं कर्मेंद्रियोंके द्वारा होता है। नाक, आँखें, कान, जीभ और त्वचा ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ हैं। आँखोंसे रूप, जिह्वासे रस, कानोंसे शब्द, नाकसे गंध, और त्वचासे स्पर्शका ज्ञान होता है। किसीभी बाह्य पदार्थका जो हमें ज्ञान होता है, वह उस पदार्थके रूप-रस-शब्द-गंध-स्पर्शके सिवा और कुछ नहीं है। उदाहरणार्थ, एक सोनेका टुकड़ा लीजिये। वह पीला दीख पड़ता है, त्वचाको भारी मालूम होता है, पीटनेसे लंबा हो जाता है इत्यादि जो गुण हमारी इंद्रियोंको गोचर होते हैं, उन्हींको हम सोना कहते हैं; और जब ये गुण बार बार एकही पदार्थमें, एकहीसे दृग्गोचर होने लगने हैं, तब हमारी दृष्टिसे सोना एक स्वतंत्र पदार्थ बन जाता है। जिस प्रकार बाहरका माल भीतर लानेके लिये और भीतरका माल बाहर भेजनेके लिये किसी कारखानेमें दरवाजे होते हैं, उसी प्रकार मनुष्यकी देहमें बाहरके मालको भीतर लेनेके लिये ज्ञानेंद्रियाँ-रूपी द्वार हैं, और भीतरका माल बाहर भेजनेके लिये कर्मेंद्रियाँ-रूपी द्वार हैं। सूर्यकी किरणें