भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

आधिभौतिक सुखवाद ९३ इस बातको आधिभौतिक सुखवादीभी मानते हैं, कि शारीरिक सुखसे मानसिक सुखकी योग्यता अधिक है। पशुको जितने सुख मिल सकते हैं, वे सब किसी मनुष्यको देकर उससे पूछो कि “क्या, तुम पशु होना चाहते हो ?” तो वह कभी इस बातके लिये राजी न होगा। इसी तरह, ज्ञानी पुरुषोंको यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि तत्त्वज्ञानके गहन विचारोंसे बुद्धिमें जो एक प्रकारकी शांति उत्पन्न होती है, उसकी योग्यता सांसारिक संपत्ति अथवा बाह्योपभोगसे हज़ार गुना बढ़ कर है। अच्छा, यदि लोकमतको देखें, तोभी यही ज्ञात होगा, की नीतिका निर्णय करना केवल संख्यापर अवलंबित नहीं है। लोग जो कुछ किया करते हैं, वह सब केवल आधिभौतिक सुखकेही लिये नहीं किया करते - वे आधिभौतिक सुखहीको अपना परम उद्देश्य नहीं मानते । बल्कि हम लोग यही कहा करते हैं, कि बाह्य सुखोंकी कौन कहे, विशेष प्रसंग आनेपर अपनी जानकीभी परवाह नहीं करनी चाहिये । क्योंकि ऐसे समयमें आध्यात्मिक दृष्टिके अनुसार जिन सत्य आदि नीति-धर्मोंकी योग्यता अपनी जानसेभी अधिक है, उनका पालन करनेके लिये मनोनिग्रह करनेमेंही मनुष्यका मनुष्यत्व है। यही हाल अर्जुनका था। उसकाभी प्रश्न यह नहीं था, कि लड़ाई करनेपर किसको कितना सुख होगा। उसका श्रीकृष्णसे यही प्रश्न था, कि “मेरा, अर्थात् मेरे आत्माका श्रेय किसमें है सो मुझे बतलाइये” (गीता. २.७; ३.२) आत्माका यह नित्यका श्रेय और सुख आत्माकी शांतिमें है। इसी लिये बृहदारण्य- कोपनिषद् (बृ. २. ४. २) में कहा गया है, कि “अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन” अर्थात् सांसारिक सुखसंपत्तिके यथेष्ट मिल जानेपरभी आत्मसुख और शांति नहीं मिल सकती । इसी तरह कठोपनिषद्‌में लिखा है, कि जब मृत्यु नचिकेताको पुत्र, पौत्र, पशु, धान्य, द्रव्य इत्यादि अनेक प्रकारकी सांसारिक संपत्ति देने सिद्ध हुआ तो उसने साफ़ जवाब दिया, कि “मुझे आत्मविद्या चाहिये, संपत्ति नहीं।” और 'प्रेय' अर्थात् इंद्रियोंको प्रिय लगनेवाले सांसारिक सुखमें तथा 'श्रेय' अर्थात् आत्माके सच्चे कल्याणमें भेद दिखलाते हुए (कठ. १. २. २ में) कहा है, कि :- श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मंदो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ “जब प्रेय (तात्कालिक बाह्य इंद्रियसुख) और श्रेय (सच्चा और चिर- कालिक कल्याण) ये दोनों मनुष्यके सामने उपस्थित होते हैं, तब बुद्धिमान् मनुष्य उन दोनों में किसी एकको चुन लेता है। जो मनुष्य यथार्थमें बुद्धिमान् होता है, वह प्रेयकी अपेक्षा श्रेयको अधिक पसंद करता है; परंतु जिसकी बुद्धि मंद होती है, उसको आत्मकल्याणकी अपेक्षा प्रेय अर्थात् बाह्य सुखही अधिक अच्छा लगता है।” इस लिये यह मान लेना उचित नहीं, कि संसारमें इंद्रियजन्य विषय-सुखही मनुष्यका ऐहिक परम उद्देश्य है; तथा मनुष्य जो कुछ करता है वह सब केवल बाह्य अर्थात् आधिभौतिक सुखहीके लिये अथवा अपने दुःखोंको दूर करनेके लियेही करता है।

९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इंद्रियगम्य बाह्यसुखोंकी अपेक्षा बुद्धिगम्य अंतःसुखकी - अर्थात् आध्या- त्मिक सुखकी - योग्यता अधिक तो हैही; परंतु इसके साथ साथ एक बात यहभी है, कि विषय-सुख अनित्य है। वह दशा नीति-धर्मकी नहीं है। इस बातको सभी मानते हैं, कि अहिंसा, सत्य आदि धर्म कुछ बाहरी उपाधियों अर्थात् बाह्य सुखदुःखों- पर अवलंबित नहीं हैं; किंतु ये सभी अवसरोंके लिये और सब कामोंमें एकसमान उपयोगी हो सकते हैं। अतएव ये नित्य हैं। बाह्य बातोंपर अवलंबित न रहनेवाली, नीति-धर्मोंकी यह नित्यता उनमें कहांसे और कैसे आई - अर्थात् इस नित्यताका कारण क्या है ? इस प्रश्नका आधिभौतिक-वादसे हल होना असंभव है। कारण यह है, कि यदि बाह्यसृष्टिके सुख-दुःखोंके अवलोकनसे कुछ सिद्धान्त निकाला जाय, तो सब सुख-दुःखोंके स्वभावतः अनित्य होनेके कारण, उनके अपूर्ण आधार- पर बने हुए नीति-सिद्धान्तभी वैसेही अनित्य होंगे। और, ऐसी अवस्थामें सुख- दुःखोंकी कुछभी परवाह न करके सत्यके लिये जान दे देनेकी सत्य-धर्मकी जो त्रिकालाबाधित नित्यता है, वह "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख"के तत्त्वसे सिद्ध नहीं हो सकेगी। इसपर यह आक्षेप किया जाता है, कि जब सामान्य व्यवहारोंमें सत्यके लिये प्राण देनेका समय आ जाता है, तो बड़े बड़े लोगभी असत्य पक्ष ग्रहण करनेमें संकोच नहीं करते; और उस समय हमारे शास्त्रकारभी जादा सख्ती नहीं करते; तब सत्य आदि धर्मोंकी नित्यता क्यों माननी चाहिये ? परंतु यह आक्षेप या दलील ठीक नहीं है; क्योंकि जो लोग सत्यके लिये जान देनेका साहस नहीं कर सकते, वेभी अपने मुंहसे इस नीति-धर्मकी नित्यताको मानाही करते हैं। इसी लिये महाभारतमें अर्थ, काम आदि पुरुषार्थोंकी सिद्धि करनेवाले सब व्याव- हारिक धर्मोंका विवेचन करके, अंतमें भारत-सावित्रीमें (और विदुरनीतिमेंभी) व्यासजीने सब लोगोंकों यही उपदेश किया है :- न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः । धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नि यो हेतुरस्य त्वनित्यः ।। अर्थात् “सुख-दुःख अनित्य हैं; परंतु (नीति) धर्म नित्य हैं। इसलिये सुखकी इच्छासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण-संकट आनेपरभी धर्मको कभी नहीं त्यागना चाहिये। यह जीव नित्य है; और सुखदुःख आदि विषय अनित्य हैं।" इसीलिये व्यासजी उपदेश करते हैं, कि अनित्य सुखदुःखोंका विचार न करके नित्य-जीवका संबंध नित्य-धर्मसेही जोड़ देना चाहिये । (महा. स्व. ५. ६; उ. ३९. १२, १३)। यह देखनेके लिये, व्यासजीका उक्त उपदेश उचित है या नहीं, हमें अब इस बातका वचार करना चाहिये, कि सुख-दुःखका यथार्थ स्वरूप क्या है, और नित्य सुख किसे कहते हैं।

पाँचवाँ प्रकरण सुखदुःखविवेक सुखमात्यंतिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतींद्रियम् । * — गीता ६. २१ हमारे शास्त्रकारोंको यह सिद्धान्त मान्य है, कि इस संसारका प्रत्येक मनुष्य सुख- प्राप्तिके लिये या प्राप्त सुखकी वृद्धिके लिये, दुःखको टालने या कम करनेके लिये ही सदैव प्रयत्न किया करता है। भृगुजी भरद्वाजसे शांतिपर्व (मभा. शां. १९०. ९) में कहते हैं, कि “ इह खलु अमुष्मिंश्च लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थमभिधी- यंते। न ह्यतःपरं त्रिवर्गफलं विशिष्टतरमस्ति।” अर्थात् इस लोक तथा परलोकमें सारी प्रवृत्ति केवल सुखके लिये है; और धर्म, अर्थ, कामका इसके अतिरिक्त कोई अन्य फल नहीं है। परंतु शास्त्रकारोंका कथन है, कि मनुष्य यह न समझकर कि सच्चा सुख किसमें है — मिथ्या सुखहीको सत्य सुख मान बैठता है; और इस आशासे, कि आज नहीं तो कल सुख अवश्य मिलेगा — वह अपनी आयुके दिन व्यतीत किया करता है। अकस्मात, एक दिन मृत्युके झपेटेमें पड़कर वह इस संसारको छोड़कर चल बसता है। परंतु उसके उदाहरणसे अन्य लोक सावधान होनेके बदले उसीका अनुकरण करते हैं। इस प्रकार यह भव-चक्र चलता रहा है, और कोई मनुष्य सच्चे और नित्य सुखका विचार नहीं करता ! इस विषयमें पूर्वी और पश्चिमी तत्त्व- ज्ञानियोंमें बड़ाही मतभेद है, कि यह संसार केवल दुःखमय है, या सुखप्रधान अथवा दुःखप्रधान है। परंतु इन पक्षवालोंमेंसे सभीको यह बात मान्य है, कि मनुष्यका कल्याण अपने दुःखका अत्यंत निवारण करके अत्यंत सुख-प्राप्ति करनेहीमें है। ‘सुख’ शब्दके बदले प्रायः ‘हित’, ‘श्रेय’ और कल्याण शब्दोंका अधिक उपयोग हुआ करता है। इनका भेद आगे चलकर बतलाया जायगा। यदि यह मान लिया जाय, कि सुख शब्दमेंही सब प्रकारके सुख और कल्याणका समावेश हो जाता है, तो सामान्यतः कहा जा सकता है, कि प्रत्येक मनुष्यका प्रयत्न केवल सुखके लिये हुआ करता है। परंतु इस सिद्धान्तके आधारपर सुख-दुःखका जो लक्षण महाभारतांतर्गत पराशरगीता (मभा. शां. २९५. २७) में दिया गया है, कि “ यदिष्टं तत्सुखं प्राहुः द्वेष्यं दुःखमिहेष्यते ” — जो कुछ हमें इष्ट है वही सुख है; और जिसका हम द्वेष करते हैं, अर्थात् जो हमें नहीं चाहिये, वही दुःख है — उसे शास्त्रकी दृष्टिसे पूर्ण निर्दोष नहीं कह * “ जो केवल बुद्धिसे ग्राह्य हो और इंद्रियोंसे परे हो, उसे आत्यंतिक सुख कहते हैं।”

९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सकते । क्योंकि इस व्याख्याके 'इष्ट' शब्दका अर्थ इष्ट वस्तु या पदार्थभी हो सकता है, और इस अर्थको माननेसे इष्ट पदार्थकोभी सुख कहना पड़ेगा । उदाहरणार्थ, प्यास लगनेपर पानी इष्ट होता है; परंतु इस बाह्य पदार्थ 'पानी' को 'सुख' नहीं कहते । यदि ऐसा होगा, तो नदीके पानीमें डूबनेवालेके बारेमें कहना पड़ेगा, कि वह सुखमें डूबा है । सच बात यह है, कि पानी पीनेसे जो इंद्रियतृप्ति होती है, उसे सुख कहते हैं। इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्य इस इंद्रियतृप्ति या सुखको चाहता है; परंतु इससे यह व्यापक सिद्धान्त नहीं बताया जा सकता, कि जिसकी चाह होती है वह सब सुखही है। इसी लिये नैयायिकोंने सुखदुःखको वेदना कह कर उसकी व्याख्या इस तरहसे की है, 'अनुकूलवेदनीयं सुखं' जो वेदना हमारे अनुकूल है, वह सुख है; और 'प्रतिकूलवेदनीयं दुःखं' जो वेदना हमारे प्रतिकूल है, वह दुःख है । ये वेदनाएँ जन्मसिद्ध अर्थात् मूलहीकी और अनुभवगम्य मात्र हैं। इसलिये नैयायिकोंकी उक्त व्याख्यासे बढ़कर सुखदुःखका अधिक उत्तम लक्षण बतलाया नहीं जा सकता । ये वेदनात्मक सुख-दुःख केवल मनुष्यके व्यापारोंसेही उत्पन्न नहीं होते हैं, तो कभी कभी कुछ देवताओंके कोपसेभी बड़े बड़े रोग और दुःख उत्पन्न हुआ करते हैं, जिन्हें मनुष्यको अवश्य भोगना पड़ता है। इसीलिये वेदान्त-ग्रंथोंमें सामान्यतः इन सुख- दुःखोंके तीन भेद-आधिदैविक, आधि भौतिक और आध्यात्मिक किये गये हैं। देवता- ओंकी कृपा या कोपसे जो सुख-दुःख मिलते हैं, उन्हें 'आधिदैविक' कहते हैं। बाह्य- सृष्टिके - पृथ्वी आदि पंचमहाभूतात्मक पदार्थोंका मनुष्यकी इंद्रियोंसे संयोग होनेपर - शीतोष्ण आदिके कारण जो सुखदुःख उत्पन्न हुआ करते हैं, उन्हें 'आधिभौतिक' कहते हैं। और, ऐसे बाह्यसंयोगके बिना उत्पन्न होनेवाले अन्य सब सुखदुःखोंको 'आध्यात्मिक' कहते हैं। यदि सुख-दुःखका यह वर्गीकरण स्वीकार किया जाय, तो शरीरहीके वात- पित्त आदि दोषोंके परिमाणके बिगड़ जानेसे उत्पन्न होनेवाले ज्वर आदि दुःखोंको - तथा उन्हीं दोषोंका परिणाम यथोचित रहनेसे अनुभवमें आनेवाले शारीरिक स्वास्थ्यको - आध्यात्मिक सुख-दुःख कहना पड़ता है। क्योंकि, यद्यपि ये सुखदुःख पंचमहाभूतात्मक शरीरसे संबंध रखते हैं - अर्थात् ये शारीरिक हैं - तथापि हमेशा यह नहीं कहा जा सकता, कि ये शरीरसे बाहर रहनेवाले पदार्थोंके संयोगसे पैदा हुए हैं। और इसलिये आध्यात्मिक सुख-दुःखोंके, वेदान्तकी दृष्टिसे फिर भी दो भेद - शारीरिक और मानसिक - करने पड़ते हैं। परंतु इस प्रकार सुख-दुःखोंके 'शारीरिक' और 'मानसिक' दो भेद कर दें, तो फिर आधिदैविक सुख-दुःखोंको भिन्न माननेकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। क्योंकि, यह तो स्पष्टही है कि देवताओंकी कृपा अथवा क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले सुख-दुःखोंकोभी आखिर मनुष्य अपनेही शरीर या मनके द्वारा भोगता है। अतएव हमने इस ग्रंथमें वेदान्त-ग्रंथोंकी परिभाषाके अनुसार सुख-दुःखोंका त्रिविध वर्गीकरण नहीं किया है। किंतु उनके दोही वर्ग (बाह्य या शारीरिक और आभ्यन्तर या मानसिक) किये हैं, और इसी

सुखदुःखविवेक ९७ वर्गीकरणके अनुसार, हमने इस ग्रंथमें सब प्रकारके शारीरिक सुख-दुःखोंको 'आधिभौतिक' और सब प्रकारके मानसिक सुख-दुःखोंको 'आध्यात्मिक' कहा है। वेदान्तग्रंथमें जैसे तीसरा वर्ग 'आधिदैविक' दिया गया है, वैसे हमने नहीं किया है। क्योंकि, हमारे मतानुसार सुख-दुःखोंका शास्त्रीय रीतिसे विवेचन करनेके लिये यह द्विविध वर्गीकरणही अधिक सुभीतेका है। सुखदुःखका जो विवेचन आगे किया गया है, उसे पढ़ते समय यह बात अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिये, कि वेदान्त-ग्रंथोंके और हमारे वर्गीकरणमें भेद है। सुख-दुःखोंको चाहे आप द्विविध मानिये अथवा त्रिविध, इसमें संदेह नहीं, कि दुःखकी चाह किसीभी मनुष्यको नहीं होती। इसीलिये वेदान्त और सांख्यशास्त्र (सां. का. १; गीता ६. २१, २२) में कहा गया है, कि सब प्रकारके दुःखोंकी अत्यंत निवृत्ति करना और आत्यंतिक तथा नित्य सुखकी प्राप्ति करनाही मनुष्यका परम पुरुषार्थ है। जब यह बात निश्चित हो चुकी, कि मनुष्यका परम साध्य या उद्देश्य आत्यंतिक सुखही है, तब ये प्रश्न मनमें सहजही उत्पन्न होते हैं, कि अत्यंत सत्य और नित्य सुख किसको कहना चाहिये ? उसकी प्राप्ति होना संभव है या नहीं ? यदि संभव है तो कब और कैसे ? इत्यादि। और जब हम इन प्रश्नोंपर विचार करने लगते हैं, तब सबसे पहले यही प्रश्न उठता है, कि नैयायिकोंके बतलाये हुए लक्षणके अनुसार सुख और दुःख दोनों भिन्न भिन्न स्वतंत्र वेदनाएँ, "अनुभव या वस्तुएँ हैं" अथवा "जो उजेला नहीं वह अँधेरा" इस न्यायके अनुसार इन दोनों वेदनाओं- मेंसे एकका अभाव होनेपर दूसरी संज्ञाका उपयोग किया जाता है। भर्तृहरिने कहा है, कि "प्याससे जब मुँह सूख जाता है, तब हम उस दुःखका निवारण करनेके लिये पानी पीते हैं। भूखसे जब हम व्याकुल हो जाते हैं, तब मिष्टान्न खाकर उस व्यथाको हटाते हैं; और काम-वासनाके प्रदीप्त होनेपर उसको स्त्रीसंग द्वारा तृप्त करते हैं। इतना कहकर अंतमें कहा है कि :- प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः । "किसी व्याधि अथवा दुःखके उत्पन्न होनेपर उसका जो निवारण या प्रतिकार किया जाता है, उसीको लोक भ्रमवश 'सुख' कहा करते हैं।" दुःखनिवारणके अतिरिक्त 'सुख' कोई भिन्न वस्तु नहीं है। यह नहीं समझना चाहिये, कि उक्त सिद्धान्त मनुष्योंके सिर्फ़ उन्हीं व्यवहारोंके विषयमें उपयुक्त होता है, जो स्वार्थहीके लिये किये जाते हैं। पिछले प्रकरणमें आनंदगिरिका यह मत बतलायाही गया है, कि जब हम किसीपर कुछ उपकार करते हैं, तब उसका कारण यही होता है, कि उसके दुःखको देखनेसे हमारी कारुण्यवृत्ति हमारे लिये असह्य हो जाती है; और इस दुःसहत्वकी व्यथाको दूर करनेके लियेही हम परोपकार किया करते हैं। इस पक्षके स्वीकृत करनेपर हमें महाभारतके अनुसार यह मानना पड़ेगा कि :- गी. र. ७

९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तृष्णार्त्तिप्रभवं दुःखं दुःखातिप्रभवं सुखम् । “ पहले जब कोई तृष्णा उत्पन्न होती है, तब उसकी पीड़ासे दुःख होता है; और उस दुःखकी पीड़ासे फिर सुख उत्पन्न होता है ” ( मभा. शां. २५. २२; १७४. १९ ) । संक्षेपमें इस पंथका यह कहना है, कि मनुष्यके मनमें पहले एक-आध आशा, वासना या तृष्णा उत्पन्न होती है; और जब उससे दुःख होने लगे, तब उस दुःखका जो निवारण किया जाता है, वही सुख कहलाता है। सुख कोई दूसरी भिन्न वस्तु नहीं है। अधिक क्या कहें उस पंथके लोगोंने यहभी अनुमान निकाला है, कि मनुष्यकी सब सांसारिक प्रवृत्तियाँ केवल वासनात्मक या तृष्णात्मकही हैं, और जबतक सब सांसारिक कर्मोंका त्याग नहीं किया जायगा, तबतक वासना या तृष्णाकी जड़ उखड़ नहीं सकती; और जबतक तृष्णा या वासनाकी जड़ नष्ट नहीं हो जाती, तबतक सत्य और नित्य सुखका मिलनाभी संभव नहीं है। वृहदारण्यक ( वृ. ४. ४. २२; वे. सू. ३. ४. १५ ) में विकल्पसे और जाबाल-संन्यास आदि उपनिषदोंमें प्रधानतासे उसीका प्रतिपादन किया गया है; तथा अष्टावक्र-गीता ( ९. ८; १०. ३-८) एवं अवधूत-गीता ( ३. ४६ ) में इसीका अनुवाद है। इस पंथका अंतिम सिद्धान्त यही है, कि जिस किसीको आत्यंतिक सुख या मोक्ष प्राप्त करना है, उसे उचित है, कि वह जितना जल्द हो सके उतना जल्द संसारको छोड़कर संन्यास ले ले। स्मृति-ग्रंथोंमें जिसका वर्णन किया गया है, और श्रीशंकराचार्यने कलियुगमें जिसकी स्थापना की है, वह श्रौत-स्मार्त संन्यासमार्ग इसी तत्त्वपर चलाया गया है। सच है; यदि सुख कोई स्वतंत्र वस्तुही नहीं है, जो कुछ है, सो दुःखही है; और वहभी तृष्णामूलक है, तो इन तृष्णा आदि विकारोंकोही पहले समूल नष्ट कर देनेपर फिर स्वार्थ और परार्थकी सारी झंझटें आप-ही-आप दूर हो जायगी; और तब मनकी जो मूल साम्यावस्था या शांति है, वही रह जायगी। इसी अभिप्रायसे महा- भारतान्तर्गत शांतिपर्वकी, पिंगलगीतामें, और मंकिगीतामें भी, कहा गया है, कि :- यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ “ सांसारिक काम अर्थात् वासनाकी तृप्ति होनेसे जो सुख होता है और जो सुख स्वर्गमें मिलता है, उन दोनों सुखोंकी योग्यता तृष्णाके क्षयसे होनेवाले सुखके सोलहवें हिस्सेके बराबरभी नहीं है” ( मभा. शां. १७४. ४८; १७७. ४९ ) । वैदिक संन्यासमार्गकाही आगे चलकर जैन और बौद्ध-धर्ममें अनुकरण किया गया है। इसीलिये इन दोनों धर्मोंके ग्रंथोंमें तृष्णाके दुष्परिणामोंका और उसकी त्याज्यताका वर्णन, उपर्युक्त वर्णनोंहीके समान और कहीं कही तो उससेभी बढ़ा चढ़ा किया गया है (उदाहरणार्थ, 'धम्मपद'के 'तृष्णा-वर्ग'को देखिये)। तिब्बतके

सुखदुःखविवेक ९९ बौद्ध-धर्मग्रंथोंमें तो यहाँतक कहा गया है, कि महाभारतका उक्त श्लोक, बुद्धत्व प्राप्त होनेपर गौतम बुद्धके मुखसे निकला था। * तृष्णाके जो दुष्परिणाम ऊपर बतलाये गये हैं, वे श्रीमद्भगवद्गीताकोभी मान्य हैं। परंतु गीताका यह सिद्धान्त है, कि उन्हें दूर करनेके लिये कर्मका त्याग नहीं कर बैठना चाहिये। अतएव यहाँ सुख-दुःखकी उक्त उपपत्तिपर कुछ सूक्ष्म विचार करना आवश्यक है। संन्यासमार्गके लोगोंका यह कथन सर्वथा सत्य नहीं माना जा सकता, कि सब सुख तृष्णा आदि दुःखोंके निवारण होनेपरही उत्पन्न होते हैं। एकबार अनुभवकी हुई (देखी हुई, सुनी हुई, इत्यादि) वस्तुकी जब फिर चाह होती है तब उसे काम, वासना या इच्छा कहते हैं। जब इच्छित वस्तु जल्द नहीं मिलती, तब दुःख होता है; जिससे वह इच्छा तीव्र होने लगती है, अथवा जब इच्छित वस्तुके मिलनेपरभी पूरा सुख नहीं मिलता; और उसकी चाह अधिकाधिक बढ़ने लगती है, तब उसी इच्छाको तृष्णा कहते हैं; परंतु इस प्रकार केवल इच्छाके तृष्णा- स्वरूपमें बदल जानेके पहलेही, यदि वह इच्छा पूर्ण हो जाय, तो उससे प्राप्त होने- वाले सुखके बारेमें हम यह नहीं कह सकेंगे, कि वह तृष्णा-दुःखके क्षय होनेसे उत्पन्न हुआ है। उदाहरणार्थ, प्रतिदिन नियत समयपर भोजन मिलता है, उसके बारेमें अनुभव यह नहीं है, कि भोजन करनेके पहले हमें दुःखही होता हो। यदि नियत समयपर भोजन न मिले तो हमारा जी भूखसे व्याकुल हो जाया करता है - अन्यथा नहीं। अच्छा, यदि हम मान लें, कि तृष्णा और इच्छा एकही अर्थके द्योतक हैं; तोभी यह सिद्धान्त सच नहीं माना जा सकता, कि सब सुख तृष्णामूलकही हैं। उदा- हरणके लिये, एक छोटे बच्चेके मुंहमें अचानक यदि, एक मिश्रीकी डली डाल दो तो यह कहा नहीं जा सकेगा, कि उस बच्चेको मिश्री खानेसे जो सुख हुआ वह पूर्व- तृष्णाके क्षयसे हुआ है। इसी तरह मान लो, कि राह चलते चलते हम किसी रमणीय बागमें जा पहुँचे; और वहाँ कोयलका मधुर गान एकाएक सुन पड़ा, अथवा किसी मंदिरमें भगवान्‌की मनोहर छबि दीख पड़ी; तब ऐसी अवस्थामें यह नहीं कहा जा सकता, कि उस गानके सुननेसे, या उस छबिके दर्शनसे होनेवाले सुखकी हम पहलेहीसे इच्छा किये बैठे थे। सच बात तो यही है, कि सुखकी इच्छा किये बिनाही उस समय हमें सुख मिला। इन उदाहरणोंपर ध्यान देनेसे यह अवश्यही मानना पड़ेगा, कि संन्यास-मार्गवालोंकी सुखकी उक्त व्याख्या ठीक नहीं है; और यहभी मानना पड़ेगा, कि इंद्रियोंमें भलीबुरी वस्तुओंका उपभोग करनेकी स्वाभाविक शक्ति होनेके कारण जब वे अपना व्यापार करती रहती हैं; और जब

  • Rockhill's Life of Buddha p. 33 यह श्लोक 'उदान'नामक पाली ग्रंथ (२. २) में है। परंतु उसमें ऐसा वर्णन नहीं है कि यह श्लोक बुद्धके मुखसे, उसे 'बुद्धत्व' प्राप्त होनेके समय निकला था। इससे यह साफ़ मालूम हो जाता है, कि यह श्लोक पहले पहल बुद्धके मुखसे न निकला हो।

१०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कभी उन्हें अनुकूल या प्रतिकूल विषयकी प्राप्ति हो जाती है, तब पहले तृष्णा या इच्छाके न रहनेपरभी हमें सुख-दुःखका अनुभव हुआ करता है। इसी बातकी ध्यान रखकर गीता (२. १४) में कहा गया है, कि 'मात्रास्पर्शोंसे शीत-उष्ण आदिका अनुभव करनेपर सुख-दुःख उत्पन्न हुआ करता है। सृष्टिके बाह्य पदार्थोंको 'मात्रा' कहते हैं। गीताके उक्त पदोंका अर्थ यह है, कि जब उन बाह्य पदार्थोंका इंद्रियोंसे स्पर्श अर्थात् संयोग होता है, तब सुख या दुःखकी वेदना उत्पन्न होती है। यही कर्मयोगशास्त्रकाभी सिद्धान्त है। कानको कर्कश आवाज़ अप्रिय क्यों मालूम होती है ? जिह्वाको मधुर रस प्रिय क्यों लगता है ? आँखोंको पूर्ण चंद्रका प्रकाश आल्हादकारक क्यों प्रतीत होता है ? इत्यादि बातोंका कारण कोईभी नहीं बतला सकता। हम लोग केवल इतनाही जानते हैं, कि जीभको मधुर रस मिलनेसे वह संतुष्ट हो जाती है। इससे प्रकट होता है, कि आधिभौतिक सुखका स्वरूप केवल इंद्रियोंके अधीन है; और इसलिये कभी कभी इन इंद्रियोंके व्यापारोंको जारी रखनेमेंही सुख मालूम होता है - चाहे इसका परिणाम भविष्यमें कुछभी हो। उदा- हरणार्थ, कभी कभी ऐसा होता है, कि मनमें कुछ विचार आनेसे उस विचारके सूचक शब्द आप-ही-आप मुंहसे बाहर निकल पड़ते हैं। ये शब्द कुछ इस इरादेसे बाहर नहीं निकाले जाते, कि इनको कोई जान लें; बल्कि कभी कभी तो इन स्वाभाविक व्यापारोंसे हमारे मनकी गुप्त बातभी प्रकट हो जाया करती है, जिससे हमको, उल्टे नुकसान हो सकता है। छोटे बच्चे जब चलना सीखते हैं, तब वे दिनभर यहाँ वहाँयोंही चलते फिरते हैं। इसका कारण यह है, कि उन्हें चलते रहनेकी क्रियामेंही उस समय आनंद मालूम होता है। इसलिये सब सुखोंको दुःखाभावरूपही न कहकर यही कहा गया है, कि "इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ" (गीता ३. ३४) अर्थात् इंद्रियोंमें और उनके शब्दस्पर्शा आदि विषयोंमें जो राग (प्रेम) और द्वेष हैं, वे दोनों पहलेहीसे 'व्यवस्थित' अर्थात् स्वतंत्र-सिद्ध हैं। और अब हमें यही जानना है, कि इंद्रियोंके ये व्यापार आत्माके लिये कल्याणदायक कैसे होंगे या करलिये जा सकेंगे। इसके लिये श्रीकृष्ण भगवान्‌का यही उपदेश है, इंद्रियों और मनकी वृत्तियोंका नाश करनेका प्रयत्न करनेके बदले उनको अपने आत्माके लिये लाभ- दायक बनानेके अर्थ अपने अधीन रखना चाहिये - उन्हे स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिये। भगवान्के इस उपदेशमें, तृष्णा तथा उसीके साथ सब मनोवृत्तियोंकोभी समूल नष्ट करनेके लिये कहनेमें, जमीन-आसमानका अंतर है। गीताका यह तात्पर्य नहीं है, कि संसारके सब कर्तृत्व और पराक्रमका बिलकुल नाश कर दिया जाय; बल्कि उसके अठारहवें अध्याय (गीता १८. २६) में तो कहा है, कि कार्य-कर्तामें समबुद्धिके साथ धृति और उत्साहके गुणोंका होनाभी आवश्यक है। इस विषयपर विस्तृत विवेचन आगे किया जायगा। यहाँ हमको केवल यही जानना है, कि 'सुख' और 'दुःख' दोनों भिन्न वृत्तियां हैं, या उनमेंसे एक दूसरीका अभाव मात्रही है।

सुखदुःखविवेक १०१ इस विषयमें गीताका मत उपर्युक्त विवेचनसे पाठकोंके ध्यानमें आही गया होगा। 'क्षेत्र'का अर्थ बतलाते समय 'सुख' और 'दुःख'की अलग अलग गणना की गई है (गीता १३. ६); बल्कि यहभी कहा गया है, 'सुख' सत्त्वगुणका और 'तृष्णा' रजोगुणका लक्षण है (गीता १४. ६, ७); और सत्त्वगुण तथा रजोगुण दोनों अलग हैं। इससेभी भगवद्गीताका यह मत साफ़ मालूम हो जाता है, कि सुख और दुःख दोनों एक दूसरेके प्रतियोगी हैं; और भिन्न भिन्न दो वृत्तियाँ हैं। अठारहवें अध्यायमें राजस त्यागकी जो न्यूनता दिखलाई है, कि “कोईभी काम यदि दुःखकारक है, तो उसे छोड़ देनेसे त्यागफल नहीं मिलता; किंतु ऐसा त्याग राजस कहलाता है” (गीता १८. ८), वहभी इस सिद्धान्तके विरुद्ध है, कि “सब सुख तृष्णा-क्षयमूलकही हैं।” अब यदि यहमान लें, कि सब सुख तृष्णा-क्षयरूप अथवा दुःखाभावरूप नहीं हैं, और यहभी मान लें, कि सुख-दुःख दोनों स्वतंत्र वस्तुएँ हैं; तोभी - इन दोनों वेदनाओंके परस्पर-विरोधी या प्रतियोगी होनेके कारण - यह दूसरा प्रश्न उपस्थित होता है, कि जिस मनुष्यको दुःखका कुछभी अनुभव नहीं है, उसे सुखका स्वाद मालूम हो सकता है या नहीं ? कई लोगोंका तो यहाँतक कहना है, कि दुःखका अनुभव किये बिना सुखका स्वादही नहीं मालूम हो सकता। इसके विपरीत, स्वर्गके देवताओंके नित्यसुखका उदाहरण देकर कुछ पंडित प्रतिपादन करते हैं, कि सुखका स्वाद मालूम होनेके लिये दुःखके पूर्वानुभवकी कोई आवश्यकता नहीं है। जिस तरह किसीभी खट्टे पदार्थको पहले चखे बिनाही शहद, गुड़, शक्कर, आम, केला इत्यादि पदार्थोंका भिन्न भिन्न प्रकारका मीठापन मालूम हो जाया करता है, उसी तरह सुखकेभी अनेक प्रकार होनेके कारण पूर्व-दुःखानुभवके बिनाही भिन्न भिन्न प्रकारके सुखों (जैसे, रूईदार गद्दीपरसे उठकर परोंकी गद्दीपर बैठना इत्यादि) का सदैव अनुभव करते रहनाभी सर्वथा संभव है। परंतु सांसारिक व्यव- हारोंको देखनेसे मालूम हो जायगा, कि यह वादही निरर्थक है। पुराणोंमें देवताओं- परभी संकट पड़नेके कई उदाहरण हैं; और पुण्यका अंश घटतेही कुछ समयके बाद स्वर्ग-सुखकाभी नाश हो जाया करता है। इसलिये स्वर्गीय सुखका उदाहरण ठीक नहीं है। और, यदि ठीकभी हो, तो स्वर्गीय सुखका उदाहरण हमारे किस काम का ? यदि यह सत्य मान लें, कि “नित्यमेव सुखं स्वर्गे” तो इसीके आगे (मभा. शां. १९०. १४) यहभी कहा है, कि “सुखं दुःखमिहोभयम्” - अर्थात् इस संसारमें सुख और दुःख दोनों मिश्रित हैं। इसीके अनुसार समर्थ श्रीरामदास स्वामीनेभी कहा है, “हे विचारवान् मनुष्य, इस बातको अच्छी तरह सोचकर देख ले, कि इस संसारमें पूर्ण सुखी कौन है ?” इसके सिवा द्रौपदीने सत्यभामाको यह उपदेश दिया है कि :-

१०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं दुःखेन साध्वी लभते सुखानि । अर्थात् “ सुख सुखसे कभी नहीं मिलता; साध्वी स्त्रीको सुख-प्राप्तिके लिये दुःख या कष्ट सहना पड़ता है" (मभा. वन. २३३. ४)। इससे कहना पड़ेगा, कि यह उपदेश इस संसारके अनुभवके अनुसार सत्य है। देखिये, यदि जामुन किसीके होंठपर धर दिया जाय, तोभी उसको चबानेके लिये पहले मुंह खोलना पड़ता है; और यदि मुंहमें चला जाय, तो उसे खानेका कष्ट सहनाही पड़ता है। सारांश, यह बात सिद्ध है, कि दुःखके बाद सुख पानेवाले मनुष्यके सुखास्वादमें, और हमेशा विषयोपभोगोंमेंही निमग्न रहनेवाले मनुष्यके सुखास्वादमें बहुत भारी अंतर है। इसका कारण यह है, कि हमेशा सुखका उपभोग करते रहनेसे सुखका अनुभव करनेवाली इंद्रियांभी शिथिल-सी होती जाती हैं। कहाभी है कि :- प्रायेण श्रीमंतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते । काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥ अर्थात् “ श्रीमानोंमें सुस्वादु अन्नका सेवन करनेकोभी शक्ति नहीं रहती; परंतु गरीब लोग काष्ठकोभी पचा जाते हैं" (मभा. शां. २८. २९)। अतएव जब कि हमको इस संसारकेही व्यवहारोंका विचार करना है, तब कहना पड़ता है, कि इस प्रश्नको अधिक हल करते रहनेमें कोई लाभ नहीं, कि बिना दुःख पाये हमेशा सुखका अनुभव किया जा सकता है या नहीं। इस संसारमें यही क्रम सदासे सुन पड़ रहा है, कि “ सुखस्यानंतरं दुःखं दुःखस्यानंतरं सुखम् " (मभा. वन. २६०. ४९; शां. २५. २३.) अर्थात् सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख मिलाही करता है। और महाकवि कालिदासनेभी मेघदूत (मे. १. १४) में वर्णन किया है :- कस्यैकान्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा । नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥ “किसीकीभी स्थिति हमेशा सुखमय या हमेशा दुःखमय नहीं होती। सुख-दुःखकी दशा पहियेके समान ऊपर और नीचेकी ओर हमेशा बदलती रहती है।” फिर यह दुःख चाहे हमारे सुखकी मिठासको अधिक बढ़ानेके लिये उत्पन्न हुआ हो या इस प्रकृतिके संसारमें उसका औरभी कुछ उपयोग होता हो; उक्त अनुभव-सिद्ध क्रमके बारेमें मतभेद हो नहीं सकता। यहाँ, यह बात कदाचित् असंभव न होगी, कि कोई मनुष्य हमेशाही विषय-सुखका उपभोग किया करे और उससे उसका जीभी न ऊबे। परंतु इस कर्मभूमि (मृत्युलोक या संसार)में यह बात सर्वथा असंभव है, कि दुःखका बिलकुल नाश हो जाय और हमेशा सुख-ही-सुखका अनुभव मिलता रहे। यदि यह बात सिद्ध है, कि संसार केवल सुखमय नहीं है, किंतु वह सुख- दुःखात्मक है, तो अब तीसरा प्रश्न आप-ही-आप मनमें पैदा होता है, कि संसारमें सुख अधिक है या दुःख ? जो पश्चिमी पंडित आधिभौतिक सुखकोही परम साध्य

सुखदुःखविवेक १०३ मानते हैं, उनमेंसे बहुतेरोंका कहना है, कि यदि संसारमें सुखसे दुःखही अधिक होता, तो (सब नहीं तो) अधिकांश लोग अवश्यही आत्महत्या कर डालते। क्योंकि जब उन्हें मालूम हो जाता, कि संसार दुःखमय है, तो वे फिर उसमें रहनेकी झंझटमें क्यों पड़ते ? बहुधा देखा जाता है, कि मनुष्य अपनी आयु अर्थात् जीवनसे नहीं ऊबता; इसलिये निश्चयपूर्वक यही अनुमान किया जा सकता है, कि इस संसारमें मनुष्यको दुःखकी अपेक्षा सुखही अधिक मिलता है; और इसलिये धर्म-अधर्मका निर्णयभी, सुखकोही सब लोगोंका परम साध्य समझ कर, किया जाना चाहिए। अब यदि उपर्युक्त मतकी अच्छी तरह जांचकी जाय तो मालूम हो जायगा, कि यहाँ आत्महत्याका जो संबंध सांसारिक सुखके साथ जोड़ दिया गया है, वह वस्तुतः सत्य नहीं है। हाँ, यह बात सच है, कि कभी कभी कोई मनुष्य संसारसे त्रस्त होकर आत्महत्या कर डालता है; परंतु सब लोग उसकी गणना 'अपवाद' में अर्थात् पागलोंमें किया करते हैं। इससे यही बोध होता है, कि सर्वसाधारण लोगभी 'आत्महत्या करने या न करने' का संबंध सांसारिक सुखके साथ नहीं जोड़ते किंतु उसे (अर्थात् आत्महत्या करने या न करनेको) एक स्वतंत्र बात समझते हैं। यदि असभ्य और जंगली मनुष्योंके उस 'संसार' या जीवनका विचार किया जावे, जो सुधरे हुए और सभ्य मनुष्योंकी दृष्टिसे अत्यंत कष्टदायक और दुःखमय प्रतीत होता है; तोभी वही अनुमान निष्पन्न होगा, जिसका उल्लेख ऊपरके वाक्यमें किया गया है। प्रसिद्ध सृष्टिशास्त्रज्ञ चार्ल्स डार्विनने अपने प्रवास-ग्रंथमें कुछ ऐसे जंगली लोगोंका वर्णन किया है, जिन्हें उसने दक्षिण-अमेरिकाके अत्यंत दक्षिण प्रांतोंमें देखा था। उस वर्णनमें लिखा है, कि वे असभ्य लोग - स्त्री, पुरुष सब - कड़ाकेके जाड़ेके अपने देशमें बारहों महीने नंगे घूमते रहते हैं; इनके अपने पास अनाजका कुछभी संग्रह न करते रहनेसे इन्हें कभी कभी भूखों रहना पड़ता है; तथापि इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़तीही जाती है*। देखिये, ये जंगली मनुष्यभी अपनी जान नहीं देते; परंतु क्या इससे यह अनुमान किया जा सकता है, कि उनका संसार या जीवन सुखमय है ? कदापि नहीं। यह बात सच है, कि वे आत्महत्या नहीं करते; परंतु इसके कारणका यदि सूक्ष्म विचार किया जावे, तो मालूम होगा, कि हर एक मनुष्यको - चाहे वह सभ्य हो या असभ्य - केवल इसी बातमें अत्यंत आनंद मालूम होता है, कि "मैं पशु नहीं हूँ मनुष्य हूँ।" और अन्य सब सुखोंकी अपेक्षा मनुष्य होनेके सुखको वह इतना अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है, कि यह संसार कितनाभी कष्टमय क्यों न हो; तथापि वह उसकी ओर ध्यान नहीं देता; और न वह अपने इस मनुष्यत्वके दुर्लभ सुखको खो देनेके लिये कभी तैयार रहता है। मनुष्यकी बात तो दूर रही, पशु-पक्षीभी आत्महत्या नहीं करते तो क्या इससे कह सकते हैं, कि उनकाभी संसार या जीवन सुखमय है ? तात्पर्य यह है, कि "मनुष्य या पशु-पक्षी आत्महत्या नहीं

  • Darwin's Naturalist's Voyage Round the World - Chap. X.

१०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र करते” इस बातसे यह भ्रामक अनुमान नहीं करना चाहिये, कि उनका जीवन सुखमय है। सच्चा अनुमान यही हो सकता है, कि संसार कैसाभी हो, उससे कुछ अपेक्षा न रखते हुये; सिर्फ़ अचेतन अर्थात् जड़ अवस्थासे सचेतन यानी सजीव अवस्थामें आनेहीसे अनुपम आनंद मिलता है; और उसमेंभी मनुष्यत्वका आनंद तो सबमे श्रेष्ठ है। हमारे शास्त्रकारोंनेभी कहा है :- भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजोविनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृता ॥ ब्राह्मणेषु च विद्वांसः विद्वत्सु कृतबुद्धयः । कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ॥ अर्थात् “अचेतन पदार्थोंकी अपेक्षा सचेतन प्राणी श्रेष्ठ है। सचेतन प्राणियोंमें बुद्धिमान्, बुद्धिमानोंमें मनुष्य, मनुष्योंमें ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें कृतबुद्धि (वे मनुष्य जिनकी बुद्धि सुसंस्कृत हो), कृतबुद्धियोंमें कर्ता (काम करनेवाले), और कर्त्ताओंमें ब्रह्मवादी श्रेष्ठ हैं।” इस प्रकार शास्त्रों (मनु. १. ९६, ९७; मभा. उद्यो. ५. १ और २) में क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियोंका जो वर्णन है, उसकाभी रहस्य वही है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। और उसी न्यायसे प्राकृत भाषा-ग्रंथोंमेंभी कहा गया है, कि चौरासी लाख योनियोंमें नरदेह श्रेष्ठ है, नरोंमें मुमुक्षु श्रेष्ठ है और मुमुक्षुओंमें सिद्ध श्रेष्ठ है। संसारमें जो कहावत प्रचलित है, कि “सबको अपनी जान अधिक प्यारी होती है।” उसकाभी कारण वही है, जो ऊपर लिखा गया है। और इसी कारणसे संसारके दुःखमय होनेपरभी जब कोई मनुष्य आत्महत्या करता है, तो उसको लोग पागल कहते हैं; और धर्मशास्त्रके अनुसार वह पापी समझा जाता है (मभा. कर्ण. ७०. २८)। तथा आत्महत्याका प्रयत्नभी कानूनके अनुसार जुर्म माना जाता है। संक्षेपमें यह सिद्ध हो गया, कि “मनुष्य आत्महत्या नहीं करता” – इस बातसे संसारके सुख- मय होनेका अनुमान करना उचित नहीं है। ऐसी अवस्थामें हमको, “यह संसार सुखमय है या दुःखमय?” इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये, पूर्वकर्मानुसार नरदेहप्राप्ति-रूप अपने नैसर्गिक भाग्यकी बातको छोड़कर, केवल उसके पश्चात् अर्थात् इस संसारहीकी बातोंका विचार करना चाहिये। “मनुष्य आत्महत्या नहीं करता; बल्कि वह जीनेकी इच्छा करता रहता है” – यह तो सिर्फ़ संसारकी प्रवृत्तिका कारण है। आधिभौतिक पंडितोंके कथनानुसार संसारके सुखमय होनेका यह कोई सबूत या प्रमाण नहीं है। यह बात इस प्रकारभी कही जा सकती है, कि आत्महत्या न करनेकी बुद्धि स्वाभाविक है; वह संसारके सुखदुःखोके तारतम्यसे उत्पन्न नहीं हुई है; और, इसीलिये इससे यह सिद्ध हो नहीं सकता कि संसार सुखमय है।

केवल मनुष्यजन्म पानेके सौभाग्यको और (उसके बादके) मनुष्यके सांसारिक व्यवहार या 'जीवन'को भ्रमवश एकही नहीं समझ लेना चाहिये। केवल मनुष्यत्व, और मनुष्यके नित्य व्यवहार अथवा सांसारिक जीवन, ये दोनों भिन्न भिन्न बातें हैं। इस भेदको ध्यानमें रखकर यह निश्चय करना है, कि इस संसारमें श्रेष्ठ नरदेह-धारी प्राणीके लिये सुख अधिक है अथवा दुःख ? इस प्रश्नका यथार्थ निर्णय करनेके लिये केवल यही सोचना एकमात्र साधन या उपाय है, कि प्रत्येक मनुष्यके 'वर्तमान समयकी' वासनाओंमेंसे कितनी वासनाएँ सफल हुई और कितनी निष्फल। 'वर्तमान समयकी' कहनेका कारण यह है, कि जो बातें सभ्य या सुधरी हुई दशाके सभी लोगोंको प्राप्त हो जाया करती हैं, उनका नित्य व्यवहारमें उपयोग होने लगता है; और उनसे जो सुख हमें मिलता है, उसे हम लोग भूल जाया करते हैं। एवं जिन वस्तुओंको पानेकी नई इच्छा उत्पन्न होती है, उनमेंसे जितनी हमें प्राप्त हो सकती हैं, सिर्फ उन्हींके आधारपर हम इस संसारके सुख- दुःखोंका निर्णय किया करते हैं। इस बातकी तुलना करना, कि हमें वर्तमानकालमें कितने सुख-साधन उपलब्ध हैं और सौ वर्ष पहले इनमेंसे कितने सुखसाधन प्राप्त हो गये थे; और इस बातका विचार करना कि आजके दिन मैं सुखी हूँ या नहीं; दोनों बातें अत्यंत भिन्न हैं। इन बातोंको समझनेके लिये उदाहरण लीजिये। इसमें संदेह नहीं, कि सौ वर्ष पहलेकी बैलगाड़ीकी यात्रासे वर्तमान समयकी रेल-गाड़ीकी यात्रा अधिक सुखकारक है। परंतु अब इस रेल-गाड़ीसे मिलनेवाले सुखके 'सुखत्व'को हम भूल गये हैं। और इसका परिणाम यह दीख पड़ता है, कि किसी दिन रेल-गाड़ी देरसे आती है; और हमारी डाक हमें समयपर नहीं मिलती, तो हमें अच्छा नहीं लगता - कुछ दुःखी-सा होता है। अतएव मनुष्यके वर्तमान समयके सुख- दुःखोंका विचार, उन सुख-साधनोंके आधारपर नहीं किया जाता कि जो उपलब्ध हैं; किंतु यह विचार मनुष्यकी 'वर्तमान' आवश्यकताओंके (इच्छाओं या वासनाओं) आधारपरही किया जाता है। और, जब हम इन आवश्यकताओं, इच्छाओं या वासनाओंका विचार करने लगते हैं तब मालूम हो जाता है, कि उनका तो कुछ अंतही नहीं - वे अनंत और अमर्यादित हैं। यदि हमारी एक इच्छा आज सफल हो जाय, तो कल दूसरी नई इच्छा उत्पन्न हो जाती है; और मनमें यह भाव उत्पन्न होता है, कि वह इच्छाभी सफल हो। ज्यों ज्यों मनुष्यकी इच्छा या वासना सफल होती जाती है, त्यों त्यों उसकी इच्छाकी दौड़ एक कदम आगेही बढ़ती चली जाती है; और जब कि यह बात अनुभवसिद्ध है, कि इन सब इच्छाओं या वासनाओंका सफल होना संभव नहीं, तब इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्य दुःखी हुए बिना रह नहीं सकता। यहाँ निम्न दो बातोंके भेदपर अच्छी तरह ध्यान देना चाहिये : (१) सब सुख केवल तृष्णा-क्षयरूपही है; और (२) मनुष्यको कितनाही सुख मिले, तोभी वह असंतुष्टही रहता है। यह कहना एक बात है, कि प्रत्येक सुख दुःखाभावरूप नहीं

१०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र है, किंतु सुख और दुःख इंद्रियोंकी दो स्वतंत्र वेदनाएँ हैं, और यह कहना उससे बिलकुलही भिन्न है, कि प्राप्त किसी एक समय सुखोंको भूलकर अधिकाधिक सुख पानेके लिये असंतुष्ट बने रहना । इनमेंसे पहली बात सुखके वास्तविक स्वरूपके विषयमें है; और दूसरी बात यह है, कि प्राप्त सुखसे मनुष्यकी पूरी तृप्ति होती है या नहीं ? विषय-वासना हमेशा अधिकाधिक बढ़तीही जाती है, इसलिये जब प्रतिदिन नये सुख नहीं मिल सकते, तब यही मालूम होता है, कि पूर्वप्राप्त सुखोंकोही बार-बार भोगते रहना चाहिये - और इसीसे मनकी इच्छाका दमन नहीं होता । विटेलियस नामक एक रोमन बादशाह था । कहते हैं, कि बार-बार जिव्हाका सुख पानेके लिये, भोजन करनेपर वह किसी औषधिके द्वारा कै कर डालता था; और प्रतिदिन अनेक बार भोजन किया करता था । परंतु, अंतमें पछतानेवाले ययाति राजाकी कथा इससेभी अधिक शिक्षादायक है । यह राजा शुक्राचार्यके शापसे, बूढ़ा हो गया था; परंतु उन्हींकी कृपासे इसको यह सहूलियतभी मिल गयी थी, कि अपना बुढ़ापा किसीको देकर उसके बदलेमें उसकी जवानी ले लें । तब इसने अपने पुरु नामक बेटेसे उसकी तरुणावस्था मांग ली और सौ दो सौ नहीं, पूरे एक हज़ार वर्षतक लगातार सब प्रकारके विषय-सुखोंका उपभोग किया । अंतमें उसने यही अनुभव किया, कि इस दुनियाके सारे पदार्थ एक मनुष्यकी सुख-वासनाको तृप्त करनेमें असमर्थ हैं । महाभारतके आदिपर्वमें व्यासजीने कहा है, कि तब उसके मुखसे यही उद्गार निकल पड़ा कि :- न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ अर्थात् “ सुखोंके उपभोगसे विषय-वासनाकी तृप्ति तो होतीही नही; किंतु विषय- वासना दिनोंदिन उसी प्रकार बढ़ती जाती है, जैसे अग्निकी ज्वाला हवनपदार्थोंसे बढ़ती जाती है” (महा. आ. ७५ ४९) । यही श्लोक मनुस्मृतिमेंभी पाया जाता है ( मनु. २.९४ ) । तात्पर्य यह है, कि चाहे जितने सुखके साधन उपलब्ध हों, तोभी इंद्रियोंकी इच्छा उत्तरोत्तर बढ़तीही जाती है । इसलिये केवल सुखोपभोगसे सुखकी इच्छा कभी तृप्त नहीं हो सकती; उसको रोकने या दबानेके लिये कुछ अन्य उपाय अवश्यही करना पड़ता है । यह तत्त्व हमारे सभी धर्मशास्त्र-ग्रंथ- कारोंको पूर्णतया मान्य है; और इसलिये उनका प्रथम उपदेश यह है; कि प्रत्येक मनुष्यको अपने कामोपभोगकी मर्यादा बांध लेनी चाहिये । जो लोग कहा करते हैं, कि इस संसारमें परम साध्य केवल विषयोपभोगही है, वे यदि उक्त अनुभूत सिद्धान्तपर थोड़ाभी ध्यान दें, तो उन्हें अपने मतकी निस्सारता तुरंतही मालूम हो जायगी । वैदिक धर्मका यह सिद्धान्त बौद्धधर्ममेंभी पाया जाता है; और ययाति राजाके सदृश, मान्धाता नामक पौराणिक राजानेभी मरते समय कहा है :-

सुखदुःखविवेक १०७ न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति । अपि दिब्बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्छति ॥ “कार्षापण नामक महामूल्यवान् सिक्के की यदि वर्षा होने लगे, तोभी काम- वासना की तित्ति अर्थात् तृप्ति नहीं होती; और स्वर्गका सुख मिलनेपरभी कामी पुरुषकी कामेच्छा पूरी नहीं होती ।” यह वर्णन धम्मपद (१८६, १८७) नामक बौद्ध-ग्रंथमें है। इससे कहा जा सकता है कि विषयोपभोगरूपी सुखकी पूर्ति कभी हो नहीं सकती; और इसीलिये हरएक मनुष्यको हमेशा ऐसा मालूम होता है, कि “मैं दुःखी हूँ !” मनुष्योंकी इस स्थितिको विचारनेसे वही सिद्धान्त स्थिर करना पड़ता है, जो महाभारत (महा. शां. २०५. ६; ३३०. १६) में कहा गया है :- सुखाद्बहुतरं दुःखं जीविते नास्ति संशयः । अर्थात् “इस जीवनमें यानी संसारमें सुखकी अपेक्षा दुःखही अधिक है ।” यही सिद्धान्त साधु तुकारामने इस प्रकार दिया है :- “सुख देखो तो राईबराबर और दुःख पर्वतके समान है ।” उपनिषत्कारोँकाभी सिद्धान्त ऐसाही है (मैत्र्यु. १. २-४) । गीता (गीता ८. १५ और ९. ३३) मेंभी कहा गया है, कि मनुष्यका जन्म अशाश्वत और ‘दुःखोंका घर’ है, तथा यह संसार अनित्य और ‘सुखरहित’ है। जर्मन पंडित शोपेनहरका ऐसाही मत है, जिसे सिद्ध करनेके लिये उसने एक विचित्र दृष्टान्त दिया है। वह कहता है, कि मनुष्यकी समस्त सुखेच्छाओँमेंसे जितनी सुखेच्छाएँ सफल होती हैं, उसी परिमाणसे हम उसे सुखी समझते हैं, और जब सुखे- च्छाओँकी अपेक्षा सुखोपभोग कम हो जाता है, तब कहा जाता है, कि वह मनुष्य उस परिमाणसे दुःखी है। इस परिमाणको गणित-रीतिसे समझाना हो तो सुखोप- भोगको सुखेच्छासे भाग देना चाहिये और अपूर्णांकके रूपमें सुखेच्छा ऐसा लिखना चाहिये। परंतु यह अपूर्णांक हैभी विलक्षण; क्योंकि इसका हर (अर्थात् सुखेच्छा), अंश (अर्थात् सुखोपभोग) की अपेक्षा, हमेशा अधिकाधिक बढ़ताही रहता है। यदि यह अपूर्णांक पहले १/२ हो, और यदि आगे – उसका अंश १ से ३ हो जाय, तो उसका हर २ से १० हो जायगा – अर्थात् वही अपूर्णांक ३/१० हो जाता है। तात्पर्य यह है, यदि अंश तिगुना बढ़ता है, तो हर पचगुना बढ़ जाता है, जिसका फल यह होता है, कि वह अपूर्णांक पूर्णताकी ओर न जा कर अधिकाधिक अपूर्णताकी ओर चला जाता है। इसका मतलब यही है, कि कोई मनुष्य कितनाही सुखोप- भोग करे, उसकी सुखेच्छा दिनोंदिन बढ़ती ही जाती है; जिससे यह आशा करना व्यर्थ है, कि मनुष्य पूर्ण सुखी हो सकता है। प्राचीन कालमें कितना सुख था, इसका विचार करते समय हम लोग इस अपूर्णांकके अंशका तो पूर्ण ध्यान रखते हैं, परंतु इस बातको भूल जाते हैं, कि अंशकी अपेक्षा हर कितना बढ़ गया है। किंतु जब हमें सुख-दुःखकी मात्राकाही निर्णय करना है, तो हमें किसी ‘काल’का विचार न

१०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र करके सिर्फ यही देखना चाहिये, कि उक्त अपूर्णांकके अंश और हरमें कैसा संबंध है। फिर हमें आप-ही-आप मालूम हो जायगा, कि इस अपूर्णांकका पूर्ण होना असंभव है। “न जातु कामः कामानाम्” इस मनुवचनका (२. ९४) भी यही अर्थ है। संभव है, कि बहुतेरोंको सुख-दुःख नापनेकी गणितकी यह रीति पसंद न हो; क्योंकि यह उष्णतामापक यंत्रके समान कोई निश्चित साधन नहीं है। परंतु इस युक्तिवादसे प्रकट हो जाता है, कि इस बातको सिद्ध करनेके लियेभी कोई निश्चित साधन नहीं, कि “संसारमें सुखही अधिक है।” यह आपत्ति दोनों पक्षोंके लिये समानही है। इसलिये उक्त प्रतिपादनके साधारण सिद्धान्तमें - अर्थात् उस सिद्धान्तमें जो सुखोपभोगकी अपेक्षा सुखेच्छाकी अमर्यादित वृद्धिसे निष्पन्न होता है- यह आपत्ति कुछ बाधा नहीं डाल सकती। धर्म-ग्रंथोंमें तथा संसारके इतिहासमें सिद्धान्तके पोषक अनेक उदाहरण मिलते हैं। किसी जमानेमें स्पेन देशमें मुसलमानोंका राज्य था। वहाँ तीसरा अब्दुल रहमान* नामक एक बहुतही न्यायी और पराक्रमी बादशाह हो गया है। उसने यह देखनेके लिये - कि मेरेदिन कैसे कटते हैं- एक रोजनामचा बनाया था; जिसे देखके अंतमें उसे यह ज्ञात हुआ, कि पचास वर्षके शासन-कालमें उसके केवल चौदह दिन सुखपूर्वक बीते। किसीने हिसाब करके बतलाया है, कि संसारभरके - विशेषतः यूरोपके - प्राचीन और अर्वाचीन सभी तत्त्वज्ञानियोंके मतोंको देखो; तो यही मालूम होगा, कि उनमेंसे प्रायः आधे लोग संसारको दुःखमय कहते हैं, और प्रायः आधे उसे सुखमय कहते हैं। अर्थात् संसारको सुखमय तथा दुःखमय कहनेवालोंकी संख्या प्रायः बराबर है। † यदि इस तुल्य संख्यामें हिंदु तत्त्वज्ञोंके मतोंको जोड़ दें, तो कहना नही होगा, कि संसारको दुःखमय माननेवालोंकी संख्याही अधिक हो जायगी। संसारके सुख-दुःखोंके उक्त विवेचनको सुनकर कोई संन्यासमार्गीय पुरुष कह सकता है; कि यद्यपि तुम इस सिद्धान्तको नहीं मानते कि “सुख कोई सच्चा पदार्थ नहीं है; फलतः सब तृष्णात्मक कर्मोंको छोड़े बिना शांति नहीं मिल सकती।” तथापि तुम्हारेही कथनानुसार यह बात सिद्ध है, कि तृष्णासे असंतोष और असंतोषसे दुःख उत्पन्न होता है। तब ऐसी व्यवस्थामें यह कह देनेमें क्या हर्ज है, कि इस असंतोषको दूर करनेके लिये मनुष्यको अपनी तृष्णाओंका और उन्हींके साथ सब सांसारिक कर्मोंकाभी त्याग करके सदा संतुष्टही रहना चाहिये - फिर तुम्हें इस बातका विचार नहीं करना चाहिये, कि उन कर्मोंको तुम परोपकारके लिये करना चाहते हो या स्वार्थके लिये। महाभारत (महा. वन. २१५. २२) में कहा है, कि “असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम्” अर्थात् असंतोषका अंत

  • Moors in Spain, p. 128 (Story of the Nations Series). † Macmillan's Promotion of Happiness, p. 26.

सुखदुःखविवेक १०९ नहीं है और संतोषही परम सुख है। जैन और बौद्ध धर्मोंकी नींवभी इसी तत्त्वपर डाली गयी है; तथा पश्चिमी देशोंमें शोपेनहर* ने अर्वाचीन कालमें इसी मतका प्रतिपादन किया है; परंतु इसके विरुद्ध यह प्रश्न भी किया जा सकता है, कि जिव्हासे कभी कभी गालियाँ वगैरह अपशब्दोंका उच्चारण करना पड़ता है, तो क्या जीभहीको समूल काटकर फेंक देना चाहिये ? या अग्निसे कभी कभी मकान जल जाते हैं, तो क्या लोगोंने अग्निका सर्वथा त्यागही कर दिया है ? और उन्होंने भोजन बनानाही छोड़ दिया है ? अग्निकी बात कौन कहे; जब हम विद्युत्-शक्तिकोभी मर्यादामें रखकर उसको नित्यव्यवहारके उपयोगमें लाते हैं, तो उसी तरह तृष्णा और असंतोषकीभी सुव्यवस्थित मर्यादा बाँधना कुछ असंभव नहीं है। हां, यदि असंतोष सर्वांशमें और सभी समय हानिकारक होता, तो बात दूसरी थी; परंतु विचार करनेसे मालूम होगा कि सचमुच बात ऐसी नहीं है। असंतोष यह अर्थ बिलकुल नहीं, कि किसी चीजको पानेके लिये रात-दिन हाय हाय करते रहें, रोते रहें; (या न मिलनेपर सिर्फ शिकायतही किया करें)। ऐसे असंतोषको शास्त्रकारोंनेभी निंद्य माना है। परंतु उस इच्छाका मूलभूत असंतोष कभी निंदनीय नहीं कहा जा सकता, जो यह कहे, कि तुम अपनी वर्तमान स्थितिमेंही पड़े पड़े सड़ते मत रहो; किंतु उसमें यथाशक्ति शांत और समचित्तसे अधिकाधिक सुधार करते जाओ; तथा शक्तिके अनुसार उसे उत्तम अवस्थामें ले जानेका प्रयत्न करो। जो समाज चार वर्णोंमें विभक्त है, उसके ब्राह्मणोंने ज्ञानकी, क्षत्रियोंने ऐश्वर्यकी और वैश्योंने धन-धान्यकी उन्नति करनेकी इच्छा या वासना छोड़ दी, तो कहना नहीं होगा, कि वह समाज शीघ्रही अधोगतिको पहुँच जायगा। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर व्यासजीने (मभा. शां. २३. ९) युधिष्ठिरसे कहा है, कि "यज्ञो विद्या समुत्थानमंतोषः श्रियं प्रति" - अर्थात् यज्ञ, विद्या, उद्योग और ऐश्वर्यके विषयमें असंतोष (रखना) ये क्षत्रियके गुण हैं। उसी तरह विदुलानेभी अपने पुत्रको उपदेश करते समय (मभा. उ. १३३-३३) कहा है, कि "संतोषो वै श्रियं हन्ति"

  • अर्थात् संतोषसे ऐश्वर्यका नाश होता है; और किसी अन्य अवसरपर एक वाक्य (मभा. सभा. ५५. ११) में यहभी कहा गया है, कि "असंतोषः श्रियो मूलम्" अर्थात् असंतोषही ऐश्वर्यका मूल है।† ब्राह्मणधर्ममें संतोष एक गुण बतलाया गया है सही; परंतु उसका अर्थ केवल यही है, कि वह चातुर्वर्ण्य-धर्मानुसार द्रव्य * Schopenhauer's World as Will and Representation, Vol. II, chap. 46. संसारके दुःखमयत्वका, शोपेनहरकृत वर्णन अत्यंतही सरस है। मूल ग्रंथ जर्मन भाषामें है और उसका भाषांतर अंग्रेजीमेंभी हो चुका है। † Cf. "Unhappiness is the cause of progress." Dr. Paul Caru's, The Ethical Problem, p. 251 (2nd Ed.).

११० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

और ऐहिक ऐश्वर्यके विषयमें संतोष रखे। यदि कोई ब्राह्मण कहने लगे, कि मुझे जितना ज्ञान प्राप्त हो चुका है, उसीसे मुझे संतोष है, तो वह स्वयं अपना नाश कर बैठेगा। इसी तरह यदि कोई वैश्य या शूद्र, अपने अपने धर्मके अनुसार जितना मिला है उतना पा करही, सदा संतुष्ट बना रहे तो उसकीभी वही दशा होगी। सारांश यह है, कि असंतोष सब भावी उत्कर्षका, प्रयत्नका, ऐश्वर्यका और मोक्षका बीज है। हमें इस बातका सदैव ध्यान रखना चाहिये, कि यदि हम असंतोषका पूर्णतया नाश कर डालेंगे तो, इस लोक और परलोकमेंभी हमारी दुर्गति होगी। श्रीकृष्णका उपदेश सुनते समय जब अर्जुनने कहा, कि "भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्तिमेऽमृतम्" (गीता १०. १८) अर्थात् आपके अमृततुल्य भाषणको सुनकर मेरी तृप्ति होतीही नहीं। इसलिये आप फिरसे अपनी विभूतियोंका वर्णन कीजिये - तब भगवानने फिरसे अपनी विभूतियोंका वर्णन आरंभ किया। उन्होंने ऐसा नहीं कहा, कि तू अपनी इच्छाको वशमें रख। असंतोष या अतृप्ति अच्छी बात नहीं है। इससे सिद्ध होता है, कि योग्य और कल्याणकारक बातोंमें उचित असंतोषका होना भगवानकोभी इष्ट है। भर्तृहरिकाभी इसी आशयका एक श्लोक है। यथा "यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ" अर्थात् रुचि या इच्छा अवश्य होनी चाहिये, परंतु वह यशके लियेही हो। और व्यसनभी होना चाहिये, परंतु वह विद्याका हो, अन्य बातोंका नहीं। काम-क्रोध आदि विकारोंके समान असंतोषकोभी वशसे बाहर नहीं होने देना चाहिये। यदि वह वशमें न रहेगा, तो निःसंदेह हमारे सर्वस्वका नाशकर डालेगा। इसी हेतुसे केवल विषयभोगकी प्रीतिके लिये तृष्णा लादकर और एक आशाके बाद दूसरी आशा रखकर सांसारिक सुखोंके पीछे हमेशा भटकनेवाले पुरुषोंकी संपत्तिको गीताके सोलहवें अध्यायमें 'आसुरी संपत्ति' कहा है। ऐसे रात- दिनके लालचीपनसे मनुष्यके मनकी सात्त्विक वृत्तियोंका नाश हो जाता है - उसकी अधोगति होती है; और तृष्णाकी पूरी तृप्ति होना असंभव होनेके कारण कामोपभोग-वासना नित्य अधिकाधिक बढ़ती जाती है; तथा वह मनुष्य अंतमें उसी दशामें मर जाता है! इसके विपरीत तृष्णा या असंतोषके इस दुष्परिणामसे बचनेके लिये सब प्रकारकी तृष्णाओंके साथ सब कार्योंको एकदम छोड़ देनाभी सात्त्विक मार्ग नहीं है। उपर्युक्त कथनानुसार तृष्णा या असंतोष भावी उत्कर्षका बीज है। इसलिये चोरके डरसे साहकोही मार डालनेका प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिये। युक्तिका मध्यम मार्ग तो यही है, कि हम इस बातका भली भांति विचार किया करें कि किस तृष्णा या किस असंतोषसे हमें दुःख होता है; और जो विशिष्ट आशा, तृष्णा या असंतोष दुःखकारक हो उसे छोड़ दें। उसके लिये समस्त कर्मोंको छोड़ देना उचित नहीं। केवल दुःखकारी आशाओंकोही छोड़ने और स्वधर्मानुसार कर्म करनेकी इस युक्ति या कौशल्यकोही योग अथवा कर्मयोग कहते हैं (गीता २. ५०); और यही गीताका मुख्यतः प्रतिपाद्य विषय है। इसलिये यहाँ

सुखदुःखविवेक १११ थोड़ा-सा इस बातका और विचार कर लेना चाहिये, कि गीतामें किस प्रका- रकी आशाको दुःखकारी कहा है। मनुष्य कानसे सुनता है, त्वचासे स्पर्श करता है, आँखोंसे देखता है, जिह्वासे स्वाद लेता है तथा नाकसे संघता है। इंद्रियोंके ये व्यापार जिस परिमाणसे इंद्रियोंकी वृत्तियोंके अनुकूल या प्रतिकूल होते हैं, उसी परिमाणमें मनुष्यको सुख अथवा दुःख हुआ करता है। सुख-दुःखके वस्तुस्वरूपके लक्षणका यह वर्णन पहले हो चुका है; परंतु सुख-दुःखोंका विचार केवल इसी परिभाषासे पूरा नहीं हो जाता। आधिभौतिक सुख-दुःखोंके उत्पन्न होनेके लिये बाह्य पदार्थोंका संयोग इंद्रियोंके साथ होना यद्यपि प्रथमतः आवश्यक है, तथापि इसका विचार करनेपर

  • कि आगे इन सुख-दुःखोंका अनुभव मनुष्य किस रीतिसे करता है - तो यह मालूम होगा, कि इंद्रियोंके स्वाभाविक व्यापारसे उत्पन्न होनेवाले इन सुख-दुःखोंको जाननेका (अर्थात् इन्हें अपने लिये स्वीकार या अस्वीकार करनेका) काम हरएक मनुष्यको अपने मनके अनुसारही करना पड़ता है। महाभारतमें कहा है, कि "चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा न तु चक्षुषा" (मभा. शां. ३११. १७) - अर्थात् देखनेका काम केवल आँखोंसेही नहीं होता; किंतु उसमें मनकीभी सहायता आवश्यक है। और यदि मन व्याकुल हो, तो आँखोंसे देखनेपरभी अन- देखा-सा हो जाता है। बृहदारण्यकोपनिषद् (बृ. १. ५. ३) मेंभी यह वर्णन पाया जाता है; यथा (अन्यत्रमना अभूव नादर्शम्) "मेरा मन दूसरी ओर लगा था; इसलिये मुझे नहीं दीख पड़ा" और (अन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषम्) "मेरा मन दूसरी ओर था; इसलिये मैं सुन नहीं सका" - इससे यह स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है, कि आधिभौतिक सुखदुःखोंका अनुभव करनेके लिये इंद्रियोंके साथ मनकीभी सहायता होनी चाहिये; और आध्यात्मिक सुख-दुःख तो मानसिक ही होते हैं। सारांश यह है, कि सब प्रकारके सुख-दुःखोंका अनुभव अंतमें हमारे मनपरही अवलंबित रहता है; और यदि यह बात सच है, तो यहभी आप-ही-आप सिद्ध हो जाता है, कि मनोनिग्रहसे सुख-दुःखोंके अनुभवकाभी निग्रह अर्थात् दमन करना कुछ असंभव नहीं है। इसी बातको ध्यान रखते हुए मनुजीने सुख-दुःखोंका लक्षण नैयायिकोंके लक्षणसे भिन्न प्रकार बतलाया है। उनका कथन है, कि :- सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥ अर्थात् "जो दूसरोंकी (बाह्य-वस्तुओंकी) अधीनतामें है, वह सब दुःख है; और जो अपने (मनके) अधिकारमें है, वह सुख है। यही सुख-दुःखका संक्षिप्त लक्षण है" (मनु. ४. १६०) नैयायिकोंके बतलाये हुए लक्षणको 'वेदना' शब्दमें शारीरिक और मानसिक, दोनों वेदनाओंका समावेश होता है; और उससे सुख-दुःखका

११२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बाह्य वस्तुस्वरूपभी मालूम हो जाता है; और मनका विशेष ध्यान सुख-दुःखोंके केवल आंतरिक अनुभवपर है। बस, इस बातको ध्यानमें रखनेसे सुख-दुःखोंके उक्त दोनों लक्षणोंमें कुछ विरोध नहीं पड़ेगा। इस प्रकार जब सुख-दुःखोंके लिये इंद्रियोंका अवलंब अनावश्यक हो गया, तब तो यही कहना चाहिये कि :- भेषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिंतयेत्। "मनसे दुःखोंका चिंतन न करनाही दुःखनिवारणकी अचूक ओषधि है" (महा. शां. २०५. २); और इसी तरह मनको कठोर बनाकर सत्य तथा धर्मके लिये सुखपूर्वक अग्निमें जलकर भस्म हो जानेवालोंके अनेक उदाहरण इतिहासमेंभी मिलते हैं। इसलिये गीताका कथन है, कि हमें जो कुछ करना है, उसे मनोनिग्रहके साथ और उसकी फलाशाको छोड़ कर तथा सुख-दुःखोंमें समभाव रखकर करना चाहिये। ऐसा करनेसे न तो हमें कर्माचरणका त्याग करना पड़ेगा और न हमें उसके दुःखकी बाधाही होगी। फलाशा-त्यागका यह अर्थ नहीं है, कि हमें जो फल मिले उसे छोड़ दें; अथवा ऐसी इच्छा रखें, कि वह फल कभी किसीको न मिले। इसी तरह फलाशामें और कर्म करनेकी केवल इच्छा, आशा, हेतु या फलके लिये किसी बातकी योजना करनेमेंभी बहुत अंतर है। केवल हाथपैर हिलानेकी इच्छा होनेमें और अमुक मनुष्यको पकड़नेके लिये या किसी मनुष्यको लात मारनेके लिये हाथ- पैर हिलानेकी इच्छामें बहुत भेद है। पहली इच्छा केवल कर्म करनेकीही है, उसमें दूसरा कोई हेतु नहीं होता; और यदि यह इच्छा छोड़ दी जाय, तो कर्मका करनाही रुक जायगा। इस इच्छाके अतिरिक्त प्रत्येक मनुष्यको इस बातका ज्ञानभी होना चाहिये, कि हरएक कर्मका कुछ-न-कुछ फल अथवा परिणाम अवश्यही होगा। बल्कि ऐसे ज्ञानके साथ साथ उसे इस बातकी इच्छा अवश्य होनी चाहिये, कि मैं अमुक फलप्राप्तिके लिये अमुक प्रकारकी योजना करकेही अमुक कर्म करना चाहता हूँ। नहीं तो उसके सभी कार्य पागलोंके-से निरर्थक सिद्ध होंगे। ये सब इच्छाएँ, हेतु, योजनाएँ, परिणाममें दुःखकारक नहीं होती; और, गीताका यह कथनभी नहीं है, कि कोई उनको छोड़ दें। परंतु स्मरण रहे, कि उस स्थितिसे बहुत आगे बढ़ कर जब मनुष्यके मनमें यह भाव होता है, कि "मैं जो कर्म करता हूँ, मेरे उस कर्मका अमुक फल मुझे अवश्यही मिलना चाहिये।" अर्थात् जब कर्मफलके विषयमें, कर्ताकी बुद्धिमें ममत्वकी यह आसक्ति, अभिमान, अभिनिवेश, आग्रह या इच्छा उत्पन्न हो जाती है और मन उसीसे ग्रस्त हो जाता है और जब इच्छानुसार फल मिलनेमें बाधा होने लगती है, तभी दुःख-परंपराका प्रारंभ हुआ करता है। यदि यह बाधा अनिवार्य अथवा दैवकृत हो, तो केवल निराशामात्र होती है, परंतु वह कहीं मनुष्यकृत हुई तो फिर क्रोध या द्वेषभी उत्पन्न हो जाता है, जिससे कुकर्म होनेपर मर मिटना पड़ता है। कर्मके परिणामके विषयमें जो यह ममत्वयुक्त आसक्ति