भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

सुखदुःखविवेक १११ थोड़ा-सा इस बातका और विचार कर लेना चाहिये, कि गीतामें किस प्रका- रकी आशाको दुःखकारी कहा है। मनुष्य कानसे सुनता है, त्वचासे स्पर्श करता है, आँखोंसे देखता है, जिह्वासे स्वाद लेता है तथा नाकसे संघता है। इंद्रियोंके ये व्यापार जिस परिमाणसे इंद्रियोंकी वृत्तियोंके अनुकूल या प्रतिकूल होते हैं, उसी परिमाणमें मनुष्यको सुख अथवा दुःख हुआ करता है। सुख-दुःखके वस्तुस्वरूपके लक्षणका यह वर्णन पहले हो चुका है; परंतु सुख-दुःखोंका विचार केवल इसी परिभाषासे पूरा नहीं हो जाता। आधिभौतिक सुख-दुःखोंके उत्पन्न होनेके लिये बाह्य पदार्थोंका संयोग इंद्रियोंके साथ होना यद्यपि प्रथमतः आवश्यक है, तथापि इसका विचार करनेपर

  • कि आगे इन सुख-दुःखोंका अनुभव मनुष्य किस रीतिसे करता है - तो यह मालूम होगा, कि इंद्रियोंके स्वाभाविक व्यापारसे उत्पन्न होनेवाले इन सुख-दुःखोंको जाननेका (अर्थात् इन्हें अपने लिये स्वीकार या अस्वीकार करनेका) काम हरएक मनुष्यको अपने मनके अनुसारही करना पड़ता है। महाभारतमें कहा है, कि "चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा न तु चक्षुषा" (मभा. शां. ३११. १७) - अर्थात् देखनेका काम केवल आँखोंसेही नहीं होता; किंतु उसमें मनकीभी सहायता आवश्यक है। और यदि मन व्याकुल हो, तो आँखोंसे देखनेपरभी अन- देखा-सा हो जाता है। बृहदारण्यकोपनिषद् (बृ. १. ५. ३) मेंभी यह वर्णन पाया जाता है; यथा (अन्यत्रमना अभूव नादर्शम्) "मेरा मन दूसरी ओर लगा था; इसलिये मुझे नहीं दीख पड़ा" और (अन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषम्) "मेरा मन दूसरी ओर था; इसलिये मैं सुन नहीं सका" - इससे यह स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है, कि आधिभौतिक सुखदुःखोंका अनुभव करनेके लिये इंद्रियोंके साथ मनकीभी सहायता होनी चाहिये; और आध्यात्मिक सुख-दुःख तो मानसिक ही होते हैं। सारांश यह है, कि सब प्रकारके सुख-दुःखोंका अनुभव अंतमें हमारे मनपरही अवलंबित रहता है; और यदि यह बात सच है, तो यहभी आप-ही-आप सिद्ध हो जाता है, कि मनोनिग्रहसे सुख-दुःखोंके अनुभवकाभी निग्रह अर्थात् दमन करना कुछ असंभव नहीं है। इसी बातको ध्यान रखते हुए मनुजीने सुख-दुःखोंका लक्षण नैयायिकोंके लक्षणसे भिन्न प्रकार बतलाया है। उनका कथन है, कि :- सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥ अर्थात् "जो दूसरोंकी (बाह्य-वस्तुओंकी) अधीनतामें है, वह सब दुःख है; और जो अपने (मनके) अधिकारमें है, वह सुख है। यही सुख-दुःखका संक्षिप्त लक्षण है" (मनु. ४. १६०) नैयायिकोंके बतलाये हुए लक्षणको 'वेदना' शब्दमें शारीरिक और मानसिक, दोनों वेदनाओंका समावेश होता है; और उससे सुख-दुःखका