श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
और ऐहिक ऐश्वर्यके विषयमें संतोष रखे। यदि कोई ब्राह्मण कहने लगे, कि मुझे जितना ज्ञान प्राप्त हो चुका है, उसीसे मुझे संतोष है, तो वह स्वयं अपना नाश कर बैठेगा। इसी तरह यदि कोई वैश्य या शूद्र, अपने अपने धर्मके अनुसार जितना मिला है उतना पा करही, सदा संतुष्ट बना रहे तो उसकीभी वही दशा होगी। सारांश यह है, कि असंतोष सब भावी उत्कर्षका, प्रयत्नका, ऐश्वर्यका और मोक्षका बीज है। हमें इस बातका सदैव ध्यान रखना चाहिये, कि यदि हम असंतोषका पूर्णतया नाश कर डालेंगे तो, इस लोक और परलोकमेंभी हमारी दुर्गति होगी। श्रीकृष्णका उपदेश सुनते समय जब अर्जुनने कहा, कि "भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्तिमेऽमृतम्" (गीता १०. १८) अर्थात् आपके अमृततुल्य भाषणको सुनकर मेरी तृप्ति होतीही नहीं। इसलिये आप फिरसे अपनी विभूतियोंका वर्णन कीजिये - तब भगवानने फिरसे अपनी विभूतियोंका वर्णन आरंभ किया। उन्होंने ऐसा नहीं कहा, कि तू अपनी इच्छाको वशमें रख। असंतोष या अतृप्ति अच्छी बात नहीं है। इससे सिद्ध होता है, कि योग्य और कल्याणकारक बातोंमें उचित असंतोषका होना भगवानकोभी इष्ट है। भर्तृहरिकाभी इसी आशयका एक श्लोक है। यथा "यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ" अर्थात् रुचि या इच्छा अवश्य होनी चाहिये, परंतु वह यशके लियेही हो। और व्यसनभी होना चाहिये, परंतु वह विद्याका हो, अन्य बातोंका नहीं। काम-क्रोध आदि विकारोंके समान असंतोषकोभी वशसे बाहर नहीं होने देना चाहिये। यदि वह वशमें न रहेगा, तो निःसंदेह हमारे सर्वस्वका नाशकर डालेगा। इसी हेतुसे केवल विषयभोगकी प्रीतिके लिये तृष्णा लादकर और एक आशाके बाद दूसरी आशा रखकर सांसारिक सुखोंके पीछे हमेशा भटकनेवाले पुरुषोंकी संपत्तिको गीताके सोलहवें अध्यायमें 'आसुरी संपत्ति' कहा है। ऐसे रात- दिनके लालचीपनसे मनुष्यके मनकी सात्त्विक वृत्तियोंका नाश हो जाता है - उसकी अधोगति होती है; और तृष्णाकी पूरी तृप्ति होना असंभव होनेके कारण कामोपभोग-वासना नित्य अधिकाधिक बढ़ती जाती है; तथा वह मनुष्य अंतमें उसी दशामें मर जाता है! इसके विपरीत तृष्णा या असंतोषके इस दुष्परिणामसे बचनेके लिये सब प्रकारकी तृष्णाओंके साथ सब कार्योंको एकदम छोड़ देनाभी सात्त्विक मार्ग नहीं है। उपर्युक्त कथनानुसार तृष्णा या असंतोष भावी उत्कर्षका बीज है। इसलिये चोरके डरसे साहकोही मार डालनेका प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिये। युक्तिका मध्यम मार्ग तो यही है, कि हम इस बातका भली भांति विचार किया करें कि किस तृष्णा या किस असंतोषसे हमें दुःख होता है; और जो विशिष्ट आशा, तृष्णा या असंतोष दुःखकारक हो उसे छोड़ दें। उसके लिये समस्त कर्मोंको छोड़ देना उचित नहीं। केवल दुःखकारी आशाओंकोही छोड़ने और स्वधर्मानुसार कर्म करनेकी इस युक्ति या कौशल्यकोही योग अथवा कर्मयोग कहते हैं (गीता २. ५०); और यही गीताका मुख्यतः प्रतिपाद्य विषय है। इसलिये यहाँ