भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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सुखदुःखविवेक १०९ नहीं है और संतोषही परम सुख है। जैन और बौद्ध धर्मोंकी नींवभी इसी तत्त्वपर डाली गयी है; तथा पश्चिमी देशोंमें शोपेनहर* ने अर्वाचीन कालमें इसी मतका प्रतिपादन किया है; परंतु इसके विरुद्ध यह प्रश्न भी किया जा सकता है, कि जिव्हासे कभी कभी गालियाँ वगैरह अपशब्दोंका उच्चारण करना पड़ता है, तो क्या जीभहीको समूल काटकर फेंक देना चाहिये ? या अग्निसे कभी कभी मकान जल जाते हैं, तो क्या लोगोंने अग्निका सर्वथा त्यागही कर दिया है ? और उन्होंने भोजन बनानाही छोड़ दिया है ? अग्निकी बात कौन कहे; जब हम विद्युत्-शक्तिकोभी मर्यादामें रखकर उसको नित्यव्यवहारके उपयोगमें लाते हैं, तो उसी तरह तृष्णा और असंतोषकीभी सुव्यवस्थित मर्यादा बाँधना कुछ असंभव नहीं है। हां, यदि असंतोष सर्वांशमें और सभी समय हानिकारक होता, तो बात दूसरी थी; परंतु विचार करनेसे मालूम होगा कि सचमुच बात ऐसी नहीं है। असंतोष यह अर्थ बिलकुल नहीं, कि किसी चीजको पानेके लिये रात-दिन हाय हाय करते रहें, रोते रहें; (या न मिलनेपर सिर्फ शिकायतही किया करें)। ऐसे असंतोषको शास्त्रकारोंनेभी निंद्य माना है। परंतु उस इच्छाका मूलभूत असंतोष कभी निंदनीय नहीं कहा जा सकता, जो यह कहे, कि तुम अपनी वर्तमान स्थितिमेंही पड़े पड़े सड़ते मत रहो; किंतु उसमें यथाशक्ति शांत और समचित्तसे अधिकाधिक सुधार करते जाओ; तथा शक्तिके अनुसार उसे उत्तम अवस्थामें ले जानेका प्रयत्न करो। जो समाज चार वर्णोंमें विभक्त है, उसके ब्राह्मणोंने ज्ञानकी, क्षत्रियोंने ऐश्वर्यकी और वैश्योंने धन-धान्यकी उन्नति करनेकी इच्छा या वासना छोड़ दी, तो कहना नहीं होगा, कि वह समाज शीघ्रही अधोगतिको पहुँच जायगा। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर व्यासजीने (मभा. शां. २३. ९) युधिष्ठिरसे कहा है, कि "यज्ञो विद्या समुत्थानमंतोषः श्रियं प्रति" - अर्थात् यज्ञ, विद्या, उद्योग और ऐश्वर्यके विषयमें असंतोष (रखना) ये क्षत्रियके गुण हैं। उसी तरह विदुलानेभी अपने पुत्रको उपदेश करते समय (मभा. उ. १३३-३३) कहा है, कि "संतोषो वै श्रियं हन्ति"

  • अर्थात् संतोषसे ऐश्वर्यका नाश होता है; और किसी अन्य अवसरपर एक वाक्य (मभा. सभा. ५५. ११) में यहभी कहा गया है, कि "असंतोषः श्रियो मूलम्" अर्थात् असंतोषही ऐश्वर्यका मूल है।† ब्राह्मणधर्ममें संतोष एक गुण बतलाया गया है सही; परंतु उसका अर्थ केवल यही है, कि वह चातुर्वर्ण्य-धर्मानुसार द्रव्य * Schopenhauer's World as Will and Representation, Vol. II, chap. 46. संसारके दुःखमयत्वका, शोपेनहरकृत वर्णन अत्यंतही सरस है। मूल ग्रंथ जर्मन भाषामें है और उसका भाषांतर अंग्रेजीमेंभी हो चुका है। † Cf. "Unhappiness is the cause of progress." Dr. Paul Caru's, The Ethical Problem, p. 251 (2nd Ed.).